पेड़ों को ईश्वर मानने की परंपरा न जाने कब से चलती आ रही है। महात्मा बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे…
जिस दौर में हर तरफ जिंदगी की भूख में लोग उम्मीद के सहारे सुबह-शाम गुजार रहे हैं, उसमें पिछले दिनों…
मनुष्य ने अपने अस्तित्व के आरंभ से आज तक जो भी संचित किया है, उसमें अन्य चीजों के साथ कुछ…
कुछ समय पहले परिवार के ही करीबी एक बुजुर्ग ने सुबह फोन किया। किसी वजह से फोन नहीं उठा पाया…
जब हम अपने मन से एक छोटा-सा संदेश लिख कर किसी को भेजते हैं, तब वे मौलिक शब्द हमारी सोच…
तकनीक ने खूब रफ्तार विकसित की है जिसके सहारे पल भर में ‘इसका धन’, ‘उसका धन’ हो जाता है।
लोकगीतों की सबसे खास बात यह रही है कि ये भारतीय समाज का आईना होने के साथ स्त्री या पुरुष…
इन दिनों दुनिया सिकुड़ गई है। आभासी दुनिया का एक नया जीवन कोलाज अब जीने का एक अभिन्न तरीका बन…
समाज संवाद से जिंदा रहता है। लेकिन क्या अब इस समाज को संवाद की जरूरत महसूस हो पा रही है?…
लोग यानी खालिस मनुष्य। लोग यानी जिनकी विशिष्ट या अलग पहचान नहीं। लोग भीड़ नहीं, जीवन की पहचान होते हैं।
कहां तो बाहर जाकर तरह-तरह की जगहें देखने, झरने, नदियों, पहाड़ों, पार्कों, फूलों, नाचते मोरों, गुहार लगते पंछियों से बातें…
गणित के शिक्षक की जिंदगी कभी-कभार किसी जटिल विषय से भी बदतर होती है।