दोस्त खिड़कियां

कहां तो बाहर जाकर तरह-तरह की जगहें देखने, झरने, नदियों, पहाड़ों, पार्कों, फूलों, नाचते मोरों, गुहार लगते पंछियों से बातें करते थे और कहां पिछले लगभग डेढ़ साल से घर से बाहर कदम रखने पर भी दस तरह के शक और हजार तरह के डर।

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सांकेतिक फोटो।

कहां तो बाहर जाकर तरह-तरह की जगहें देखने, झरने, नदियों, पहाड़ों, पार्कों, फूलों, नाचते मोरों, गुहार लगते पंछियों से बातें करते थे और कहां पिछले लगभग डेढ़ साल से घर से बाहर कदम रखने पर भी दस तरह के शक और हजार तरह के डर। ऐसा लगता है जैसे महामारी जबड़े में दबोचने के लिए दरवाजे के बाहर ही खड़ा हो। कई बार सोचती हूं कि यह स्थिति कब तक रहेगी!

चारों तरफ पसरे डर और चुनौती के बीच दुनिया चारदिवारी में कैद हो चुकी लगती है। इस मुश्किल वक्त में दरवाजे से बाहर निकलना तो आसान नहीं रह गया है, अब बाहर की दुनिया की सूचना लेने के लिए खिड़कियों से झांकना पड़ता है और उन्हीं से गलियों-सड़कों की खबरें मिल पा रह रही हैं। बल्कि यों कहूं कि वे ही असली दोस्त भी साबित हुई हैं। सवेरे कपड़े सुखाते या सफाई करते वक्त कई लोग मास्क लगाए तेज-तेज घूमते दिखाई देते हैं तो महसूस होता है कि वे घूम रहे हैं, तो हम भी घूम सकते हैं। कोई कूरियर वाला, कोई कपड़े पर इस्तरी करने वाला, पार्क में काम करता माली, काम और रोजी-रोटी के लिए बाहर निकलते लोग बताते हैं कि डर फैलाने वाले दिन धीरे-धीरे ही सही, जा रहे हैं। डर को अलविदा कहने वाले दिन आने वाले हैं। यों भी डर की परिभाषा और विस्तार में उतरा जाए तो उसकी परतें बताती हैं कि जब तक हम उसका सामना नहीं करते, तब तक वह हमारे इर्द-गिर्द अपना घेरा बनाए रखता है।

बहरहाल, खिड़की से बाहर बहुत से कपड़े सूखते दिखते हैं। कुछ दिन पहले एक महिला का बच्चा उसके पास ही खेल रहा था। वह बड़ी तन्मयता से कच्चे आमों को काट रही थी। शायद यह बताने के लिए कि महामारी हो न हो, मगर अगर कच्चे आम हैं, तो उनका अचार भी है। आम के पने और ‘मैंगो शेक’ वाले दिन भी। सोसाइटी के जामुन के पेड़ पर भी कितने जामुन लगे हैं! पेड़ बहुत ऊंचा है, इसलिए जामुन तोड़ें भी तो कैसे। गांव का हर बच्चा पेड़ पर चढ़ना जानता है, मगर शहराती पीढ़ी पेड़ पर चढ़ना भूल चुकी है। लेकिन ध्यान आता है कि शहराती बच्चों ने पेड़ पर चढ़ना सीखा ही कब! वे तो वीडियो गेम की आभासी दुनिया में दौड़ते-भागते और उड़ते हैं, लेकिन वास्तव में वे कहां और क्या सीख पा रहे हैं!

मगरमच्छ और बंदर की जामुन से जुड़ी कहानी कइयों को याद होगी। एक बंदर नदी में रहने वाले मगरमच्छ को रोज जामुन खाने को देता था। मगरमच्छ को लगा कि यह रोज इतने मीठे जामुन खाता है, तो इसका कलेजा कितना मीठा होगा। एक दिन वह बंदर को पीठ पर बैठा कर नदी के बीचोंबीच ले गया और उसका कलेजा खाने की बातें करने लगा। तब बंदर ने उससे कहा कि अपना कलेजा तो वह जामुन के पेड़ पर टांग के रखता है। मगरमच्छ उसे वापस लाया। और बंदर एक छलांग में जान बचा कर जामुन के पेड़ पर चढ़ गया। सोसाइटी में इन दिनों कई बंदर दिखाई देते हैं। वे जामुन के पेड़ पर भी चढ़ते हैं। उन्हें देख कर यही कहानी याद आ जाती है। सोसाइटी में तीन चार-आम के पेड़ भी हैं। उन पर खूब आम भी लगते हैं। पता नहीं इस बार लगे होंगे कि नहीं, क्योंकि मेरे फ्लैट की खिड़की से वे दिखाई नहीं देते। काश कि खिड़कियां भी चल सकतीं और वे दृश्य दिखा सकतीं, जो हम देखना चाहते हैं।

अपने गांवों में भी तो यही हो रहा होगा। आम, जामुन के कद्दावर पेड़ों पर बहार आ गई होगी। खरबूज, तरबूज, ककड़ी, खीरा, भिंडी चारों ओर दिख रही होंगी। इनमें से कुछ के मौसम आए और चले भी गए। प्रकृति ने अपने हर वक्त का सामना करने के लिए न जाने कितना कुछ दिया है। सभी वक्त पर आते हैं, हमारा साथ देने के लिए। हम भी शायद बहुत कुछ के साथ होते होंगे! बेशक गांव गए न जाने कितने साल हो गए, मगर स्मृतियों में तो वह बसा ही है। बचपन हमें कभी नहीं छोड़ता। वह लगातार हमारा पीछा करता है। खासतौर पर ऐसे वक्त में वह बहुत याद आता है, जब अपने सामने बच्चों का बचपन कई-कई रास्तों से छिनते देखा जा सकता है। अफसोस कि बच्चों को तो दूर, मां-पिता को भी यह अंदाजा नहीं हो पाता है कि जिसे वे सहजता मान कर स्वीकार कर रहे हैं, उससे बचपन का जीवन किन-किन परतों में छिनता जा रहा है।

सवेरे के जो तीन-चार घंटे रसोई में बिताती हूं, उस वक्त रसोई की खिड़की मेरी सच्ची दोस्त साबित होती है। बेलपत्र के पेड़ पर ढेरों पीले बेल लगे हैं। इन दिनों डर की वजह से उन्हें तोड़ने वाला भी कोई नहीं। बच्चों के झूले खाली ही दिखाई देते हैं। पहले छुट्टियों के इन दिनों में ये बच्चों के कलरव से भरे रहते थे। जब से यह बात चली है कि विषाणु बच्चों पर भी आक्रमण कर सकता है, तब से माता-पिता में अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता है। इसीलिए खिड़कियों से इन दिनों पार्कों में एक-दो बच्चे ही दिखाई देते हैं।

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