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वंचना के घेरे

मनुष्य ने अपने अस्तित्व के आरंभ से आज तक जो भी संचित किया है, उसमें अन्य चीजों के साथ कुछ मिथक और धारणाएं भी पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते हुए संचित और संरक्षित होते गए

सांकेतिक फोटो।

बिभा त्रिपाठी

मनुष्य ने अपने अस्तित्व के आरंभ से आज तक जो भी संचित किया है, उसमें अन्य चीजों के साथ कुछ मिथक और धारणाएं भी पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते हुए संचित और संरक्षित होते गए। उन्हीं में से एक धारणा यह है कि महिलाओं के साथ होने वाला कोई भी विभेद या दुर्व्यवहार या तो घर के बाहर होता है या फिर उनके ससुराल वालों के द्वारा। दरअसल, ज्यादातर लड़कियां इसी विचार के साथ पलती-बढ़ती हैं और जब उनका विवाह उनके माता-पिता द्वारा तय किया जाता है, तब भी अनेक धारणाओं को साथ लेकर वे घर की दहलीज लांघती हैं। फिर धारणाओं का यह चक्रव्यूह उन्हें इतना मजबूर और लाचार कर देता है कि वे घुटती, सुबकती रहती हैं, पर अपनी पीड़ा किसी से नहीं कह पाती हैं।

कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर एक बच्ची का बेहतरीन क्रिकेट खेलते हुए वीडियो साझा किया गया था, जिसमें उस लड़की के बारे में यह लिखा गया था कि उसने अपने पिता से कहा कि उसे क्यों नहीं उसी प्रकार की शिक्षा दी जा रही है, जैसी उसके भाई को दी जाती है। उसका यह प्रश्न सबको निरुत्तर करने वाला था। लेकिन कई लोग ऐसे भी थे जिन्होंने यह महसूस किया कि बिना अपनी बात रखे, बिना अपना हक मांगे अपने ही माता-पिता से विभेदकारी व्यवहार भी झेलना पड़ सकता है।

सच यह है कि इस विभेद की समझ कुछ लड़कियों में होती ही नहीं है, क्योंकि उन्हें जन्म लेने के बाद यही बताया जाता है कि तुम्हें तो गर्भ में ही खत्म कर देने की योजना थी, पर ‘भाग्य भरोसे’ तुम पैदा हो गई और अब किसी प्रकार जीवन चलाओ। ऐसा मानने-समझने वाली लड़कियां कैसे अपने हक की लड़ाई लड़ सकती हैं? कानून के बारे में सबसे प्रसिद्ध अवधारणा है कि कानून कुछ नहीं, बस सामान्य ज्ञान है। यानी कोई भी साधारण व्यक्ति सही-गलत, उचित-अनुचित, समानता-समानता, विरोध-समर्थन, प्रोत्साहन-हतोत्साह जैसे भावों और व्यवहारों को बड़ी आसानी से समझ सकता है। समझने के बाद उस पर प्रतिक्रिया कैसी होती है, यह दीगर बात है।

अगर सकारात्मक दृष्टिकोण से स्थितियों को देखा और परखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि कानून की पढ़ाई के बिना भी हम भी विधिसम्मत व्यवहार कर सकते हैं और दूसरों से ऐसे ही व्यवहार की अपेक्षा कर सकते हैं। अपने हित संरक्षण को समझ सकते हैं, जरूरत पड़ने पर मांग कर सकते हैं, क्योंकि असमानता और विभेद का जो पाठ जिंदगी पढ़ा देती है, वह स्त्रीवादी किताबों की खाक छानने के बाद भी इतनी संजीदगी से समझ नहीं आती।
सच्चाई यह है कि अगर लड़की ने अपने माता-पिता की पहली संतान के रूप में जन्म लिया, तब तो उसे अपेक्षया कम तकलीफें उठानी पड़ती हैं। तब तक, जब तक कि उसका छोटा भाई इस संसार में नहीं आ जाता।

उसके आते ही सब कुछ बदल जाता है। प्राथमिकताएं, अवसर और संसाधन भी। इसके उलट अगर लड़की अपने भाई की छोटी बहन के रूप में जन्म लेती है, तब उसके साथ विभेद की गुंजाइश बढ़ जाती है। मसलन भाई को मिलने वाली प्राथमिकता और अवसर उससे भिन्न और अच्छी किस्म के हो सकते हैं। जब लड़की इस विभेद को समझ कर आवाज उठाती है, तब उस पर तेज-तर्रार और लड़ाका आदि होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। बल्कि उसकी आगे की जिंदगी के लिए भी घोषणाएं हो जाती हैं। लड़ते-झगड़ते, अवसरों को खींचते, जूझते-उलझते हुए जब वह सफल हो जाती है, तब उसके पर काटने की कोशिशें शुरू होती हैं और फिर सिर से बोझ उतारने और घर की बला टालने के लिए उसका विवाह कर दिया जाता है। वह लड़की जो अपने पिता के घर में तमाम उलाहने सहती रही, नकारात्मक छवि के साथ ससुराल में भी दोहरे तनाव में रहती है। ऐसा सिर्फ इसलिए होता है कि उसने अपने हक के लिए आवाज उठाई होती है।

निश्चित रूप से किसी भी लड़की को और खासतौर पर जिस माता-पिता ने बड़ी मुश्किल से अपनी लड़की को पढ़ा-लिखा कर काबिल बनाया है, उसे ससुराल वालों के द्वारा प्रताड़ित नहीं करना चाहिए। बल्कि इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि विवाह के वक्त एक लड़की उस पौधे के समान होती है, जिसे अपने जन्म स्थान से हटा कर रोपित करना होता है। वहां उसके संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक है कि उसे पर्याप्त देखरेख और संरक्षण मिले, ताकि वह फले-फूले और जीवन अपने नैसर्गिक लय में चल सके।

जब तक स्त्रियों के जीवन से जुड़ी पारंपरिक धारणाओं को तोड़ा नहीं जाएगा, तब तक कानून अपनी परिभाषाओं की चारदिवारी में लिपटा रहेगा, समाज अपनी संकुचित सोच के साथ कुछ नए मिथक गढ़ता रहेगा और जाने कितनी पीढ़ियों तक लड़कियां इन मिथकों को सच मान कर जीवन बिताती रहेंगी। जरूरत इस बात की है कि घर से बाहर और ससुराल में स्त्रियों के विरुद्ध पारंपरिक मानदंडों से मुक्ति के साथ-साथ व्यवस्थागत रूप से अनुकूलित अपने माता-पिता से होने वाले भेदभाव पर भी गौर किया जाए और चेतना के स्तर पर उनसे भी लड़ कर आजाद हुआ जाए।

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