Dunia mere aage

दुनिया मेरे आगे: बचपन का सौंदर्य

बचपन की हमारी सबसे बड़ी सीख यही है कि बचपन ने हमें विश्वास करना सिखाया है। जिद्दी बन कर अपने लक्ष्य को हासिल करना बचपन की सीख है।

दुनिया मेरे आगे: प्रतिभा का पाठ

अपने भीतर को खोजने और उसे अभिव्यक्त करने का मौका बच्चों के भीतर उस झिझक को दूर करने में मददगार साबित होती है, जो उनकी कमजोर और गरीब सामाजिक पृष्ठभूमि से आई होती है।

दुनिया मेरे आगे: सृजन और चेतना

क्या यह हमारी सामूहिक चेतना को एक खास तरीके से ढालने का सिलसिला है? क्या यह एक ऐसी अदृश्य परियोजना है, जहां हमें सोचने के लिए कुछ खास तरीकों का अभ्यस्त किया जा रहा है और यह अब कुछ-कुछ दृश्य होने लगी है?

दुनिया मेरे आगे: हुनर का कारोबार

हुनरमंद और स्तरीय खिलाड़ी पहले भी थे। लोग अक्सर सवाल करते हैं कि अगर वे आज होते या उस जमाने में ऐसी कारगर मार्केंटिंग होती तो क्या होता! जानकार मानेंगे कि वे भी इतने ही सफल होते, जितने आधुनिक सुपर सितारे हैं। फर्क यही है कि पहले कुछ मानक तय थे। आज सभी आपाधापी में लगे हैं और मानते हैं कि जो धन मिल रहा है, वह तो आंधी में आम की तरह है। क्या पता कल क्या हो! इसलिए बहती गंगा में सभी हाथ धो रहे हैं।

दुनिया मेरे आगे: समानता के सपने

दरअसल पूजा हम अपनी कार्यसिद्धि के लिए करते हैं, वरना स्वार्थ और कुराजनीति से ग्रस्त इस दुनिया में देवताओं से कौन डरता है? शक्ति और धन तो कदापि नहीं। देवता से डर कर नहीं, बल्कि देव समाज के नाम पर आम लोगों को डराया जरूर जाता है।

दुनिया मेरे आगे: चुप्पी का शोर

सूचना तकनीक ने चौबीसों घंटे और बारहों महीने बोलते रहने की व्यवस्था खड़ी कर दी है। इससे सुनने-समझने की सभ्यता के सामने संकट आ गया है। जब कहीं कोई सुनने या समझने को तैयार ही नहीं, तो लोगों ने बोलना ही कम कर दिया।

दुनिया मेरे आगे: भोजन की सुगंध

कोरोना काल में बहुतों के लिए रोटी और मकान एक बड़ा अभाव बन गए। कपड़े भले थोड़े बहुत तन पर रहे हों, भोजन पकने की सुगंध बहुतोंको मीलों चलने के बाद मिली। उसके पकने की सुगंध से जीभ पर एक स्वाद तो आता ही है, जीवनी शक्ति का एक आगमन भी मालूम पड़ता है।

दुनिया मेरे आगे: काम का नया दौर

घर से काम करने के फायदे और नुकसान, दोनों थे। जब लोग तय समय पर काम पर जाते थे तो उनका अपना अनुशासन रोज समय पर तैयार होकर और दफ्तर पहुंचने का था। परिवार के अन्य सदस्य भी उनका पूरा ध्यान रखते थे और सहयोग करते थे। अब घर से काम करने में वह व्यवस्था गड़बड़ा गई। दरअसल, इस प्रणाली के तहत अच्छी तरह काम करने का बुनियादी सोच है कि व्यक्ति खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से काम के लिए तैयार करे।

दुनिया मेरे आगे: कहने का सलीका

न कहने के अपने तर्क हो सकते हैं। पर देखने की बात यह है कि न कैसे और क्यों कहा गया। इसके लिए स्थान विशेष का भी ध्यान रखा जाता है। जिसने स्थान और समय नहीं देखा, सामने वाले का सामाजिक रुतबा नहीं देखा, उसको विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। हम अपने समाज पर लाख गर्व करें, यही निकृष्ट सोच हमारी सामाजिक हकीकत है।

दुनिया मेरे आगे: खुदकुशी की कड़ियां

हमारे यहां संयुक्त परिवार थे। एक-दूसरे से गुंथे-उलझे घर के सदस्य! सुख-दुख में एक साथ! गमी-कमी में एक साथ! सुख-सुविधाओं के अभाव में भी वे भीतरी संपन्नता का जीवन जीते थे! घर में पांच-छह भाई-बहन आपस में खेलते, लड़ते-झगड़ते एक साथ बड़े होते थे! आज वैश्वीकरण की संस्कृति में हमारे यहां भी एकल परिवार हो गए है!

दुनिया मेरे आगे: क्या चल रहा है

सृष्टि का सारा वजूद चलने की प्रक्रिया के कारण कायम है। प्रकृति का संतुलन सौरमंडल की चाल पर निर्भर है। दिनमान, ऋतुचक्र और इंसान- सब इससे बंधे हैं। सांस यानी हृदय की धड़कनों का चलना जीवन की अनिवार्य शर्त है। सांस का चलना बंद होते ही इंसान और जानवर निर्जीव हो जाते हैं। आग और पानी के साथ जीवन के लिए हवा का चलना भी बेहद जरूरी है। हवा का चलना बंद हो जाए तो जीवों का दम घुटने लगे।

दुनिया मेरे आगे: मधुर गूंज की याद

कोयल का कूकना और आम का मौसम, ये एक महज संयोग हैं। यों कोयल का भोजन आम नहीं है। हालांकि अंतर्संबंध की तलाश मानवीय गुण है और इसी गुण की वजह से मनुष्य कई बार कोयल और कौवे के बीच भी अंतर्संबंध ढूंढ़ लेता है। दरअसल, यह एक ऐसा अंतर्संबंध है, जहां कोयल कौवे के घोंसले में अंडे देती है। यह दीगर बात है कि जीव-जगत ऐसी तमाम मिसालों से भरा पड़ा है, जहां एक दूसरे को कुदरती तौर पर पटखनी देते हैं।

दुनिया मेरे आगे: प्रकृति का प्रतिसाद

अगर जीवन के हर एक क्षण को हम कुदरत का प्रसाद मान ले तो सारे तनाव एक क्षण ही में खत्म हो जाते हैं। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारा जीवन भी ‘प्रसादिक’ हो जाता है। इस विशाल ब्रह्मांड के कण-कण में आनंद छिपा हुआ है, लेकिन इंसान स्वार्थी बन कर सारा आनंद अकेले ही अपनी तिजोरी में भर लेना चाहता है।

दुनिया मेरे आगे: रुचियों का पाठ

मैं जिन हालात में जी रहा था, उनमें वे बाल पत्रिकाएं मेरे लिए जीवन का आधार थीं। मैं उनके बिना अपना दिन-रात अधूरा समझता था। स्कूली किताबों के समांतर मैं उन्हीं में खोया रहता था। एक-एक शब्द ऐसे पढ़ता बारंबार, जैसे कोई प्यासा अपनी अतृप्त प्यास बुझा रहा हो।

दुनिया मेरे आगेः कल्पना की उड़ान

मन की सक्रियता ही सार्थक जीवन की नींव होती है। विचारों को भली-भांति पकड़ कर उनका अनुसरण करते हुए खुलेपन से काम करने वाले ही महासागर पार कर पाते हैं, दुर्गम पर्वत बांहें फैलाए उन्हीं का स्वागत करते हैं।

दुनिया मेर आगेः किसका कौन

उनका फोन अक्सर आता रहता है। रिटायरमेंट के बाद मुंबई में वे घर पर अकेले रहते हैं। पत्नी का देहांत कई वर्ष पहले हो गया था। एक बेटा अमेरिका में और दूसरा दुबई में अपने-अपने परिवार के साथ मगन हैं।

दुनिया मेरे आगेः स्वच्छता का समाज

अपने आसपास अगर हमें सबसे ज्यादा किसी चीज की जरूरत होती है, तो वह है साफ-सफाई। लेकिन इसके लिए गंदगी न फैलने देना या उसे साफ करना पहली शर्त है।

दुनिया मेरे आगेः संवेदना की नीधि

जाते-जाते ‘भगवन’ कह गए थे- ‘शाम-शाम लौट आऊंगा, अपने ‘भक्त’ से मिल कर। एकतारा यहीं, तुम्हारे पास छोड़ जाता हूं।’ दोपहर बाद ही निकले थे भगवन, लेकिन शाम क्या, रात हो गई।

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