Dunia mere aage

‘दुनिया मेरे आगे’ जनसत्ता का एक नियमित स्तम्भ है जिसमें आम पाठक अपने विचारों को साझा करते हैं।
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दुनिया मेरे आगे: विज्ञान हमें जीवन जीने के साधन देता है, पर कला हमें जीवन जीने का कारण देती है

कला केवल व्यक्तिगत रुचि नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता भी है। भारतीय संस्कृति में कला को ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम…

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दुनिया मेरे आगे: दूरदर्शिता की राह, मूलभूत आदर्शों और मूल्यों पर टिकी होती है मजबूत समाज की नींव

हर अनुभव के साथ हमारा व्यक्तित्व परिष्कृत, मजबूत और सुदृढ़ बनने लगता है। न्यायपूर्ण और स्पष्ट निर्णय लेना धीरे-धीरे हमारे…

स्कूल यूनिफॉर्म पहने बच्चे विद्यालय की ओर जाते हुए और एक कक्षा में पढ़ाई करते छात्र-छात्राएं। पृष्ठभूमि में भारत का नक्शा और शिक्षा व विकास का प्रतीकात्मक ग्राफ दिखाई दे रहा है, जो सभी बच्चों को शिक्षा से जोड़ने और स्कूल ड्रॉपआउट रोकने के संदेश को दर्शाता है। (सांकेतिक तस्वीर)
नीति आयोग की रिपोर्ट: झारखंड में प्राथमिक स्कूलों का ड्रॉपआउट शून्य, देश के लिए बना मॉडल | दुनिया मेरे आगे

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014-15 में झारखंड में प्राथमिक स्तर पर ‘ड्रॉपआउट’ दर 6.41 फीसद थी, जो वर्ष 2024-25 में…

पहाड़ की चोटी की ओर बढ़ते एक व्यक्ति का प्रतीकात्मक दृश्य, जो भय पर विजय, साहस और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का संदेश देता है।
डर से नहीं, अपने ही संदेह से हारता है इंसान; सपनों की सबसे बड़ी बाधा है अपना भय | दुनिया मेरे आगे

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें ममता कुशवाहा के विचार।

मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त लोगों की भीड़ के बीच अकेला खड़ा एक व्यक्ति, जो डिजिटल युग में बढ़ते अकेलेपन और मानवीय संबंधों की घटती आत्मीयता का प्रतीक है।
स्क्रीन के इस पार भीड़, उस पार अकेला इंसान, सिकुड़ रही हैं हमारी संवेदनाएं | दुनिया मेरे आगे

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें श्याम यादव के विचार।

Life Lessons, Positive Thinking, Happiness, Live in Present
क्या सब कुछ ठीक होने का इंतजार कर रहे हैं? यही सोच छीन लेती है जिंदगी की असली खुशी | दुनिया मेरे आगे

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें रेखा शाह आरबी के विचार।

आलोचना और विरोध, Criticism vs Opposition, आत्मचिंतन
आलोचना विरोध नहीं, सुधार का साहस है; लोकतंत्र की असली कसौटी यही है | दुनिया मेरे आगे

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें प्रथमेश मणि तिवारी के विचार।

जीवन का अर्थ, आत्मस्वीकृति, जीवन दर्शन, उम्र और अनुभव
जीवन का सबसे बड़ा पड़ाव: जब खुद को साबित करने की जरूरत खत्म हो जाती है | दुनिया मेरे आगे

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें राजेंद्र मोहन शर्मा के विचार।

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पछतावे से नहीं विश्वास से आगे बढ़ें, हर छूटा अवसर हार नहीं होता | दुनिया मेरे आगे

हम सोचते हैं कि काश हम थोड़े और साहसी, सक्षम या आत्मविश्वासी होते। मगर समय का चक्र दोनों तरफ से…

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