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सुविधा की दुविधा

तकनीक ने खूब रफ्तार विकसित की है जिसके सहारे पल भर में ‘इसका धन’, ‘उसका धन’ हो जाता है।

सांकेतिक फोटो।

प्रभात कुमार

तकनीक ने खूब रफ्तार विकसित की है जिसके सहारे पल भर में ‘इसका धन’, ‘उसका धन’ हो जाता है। सामाजिक इंजीनियरिंग का यह नया अवतार है कि आकर्षक नाम से लुभाने वाली ई-मेल आती है और भेजे गए किसी लिंक पर क्लिक करने के बाद जो होता है, उसके बाद होश आता है। उससे पहले तक जिंदगी खुश होकर सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हो जाती है। भला इनाम, नृत्य और उत्सव किसे अच्छे नहीं लगते। लालच, विश्वास और अति आत्मविश्वास इंसान को लुटवाने को उकसाते हैं और वह लुट जाता है। डिजिटल दुनिया के मेले में अगवा होने के बाद बात समझ आती है।

दरअसल, डिजिटल होती जिंदगी के सामाजिक और सांस्कृतिक मंच पर बैंकिंग ने खूब तरक्की की है। शातिर दिमाग वालों ने इस विकास का गलत इस्तेमाल किया है और पिछले कई सालों से नित नए तरीके इजाद कर लोगों के खातों से पैसे ऐंठे जा रहे हैं। जो लोग हेराफेरी करने वालों के तरीकों से नावाकिफ और बदलते बैंकिंग परिवेश से अनजान हैं, धोखेबाजों के चक्रव्यूह में फंस कर अनजाने लिंक पर मात्र एक क्लिक करने भर से अपने खाते से पैसे निकालने की स्वीकृति दे बैठते हैं। रोजाना ऐसे कितने ही मामले सुरक्षा एजेंसियों के पास ठगी के मामलों की भीड़ में शामिल होते रहते हैं।

एक ओर आॅनलाइन शिकारी निरंतर नए-नए जाल बनाते जा रहे हैं। दूसरी ओर, बैंक वाले अपनी कार्य प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाने और ग्राहकों के खातों को सेंध से बचाने के लिए नए बेहतर सुरक्षा कवच बनाते रहते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक अक्सर यह कहते हुए खबरदार करता रहता है कि ‘जानकार बनिए, सतर्क रहिए’। अखबारों और अन्य संचार माध्यमों से भी पता चलता रहता है कि धोखेबाजों से कैसे बच कर रहें, लेकिन यह सचमुच हैरानी की बात है कि कुछ सहृदय लोग अपना खाता नंबर, मोबाइल नंबर, आधार नंबर या अन्य विवरण अनजान स्रोतों को कैसे बता देते हैं।

ऐसे में गुजरे जमाने की बैंकिंग याद आती है, जिसे पुराने गानों की तरह नई धुन के शोर मचाऊ पंख लगा कर उड़ाया जा रहा है। मुझे याद है उन दिनों बुजुर्ग लोग बैंक में पैसे निकलवाने आते थे। कैशियर उन्हें उनके सामने गिन कर नोट देता था, चाय भी पिलवाता था और वे बुजुर्ग कहते थे- ‘बेटा मुझे तो वही नोट वापस कर दो जो मैं उस दिन जमा करवा कर गया था’। बहुत प्रयास कर उन्हें समझाया जाता था कि इन नोटों की कीमत भी उतनी ही है। भुगतान सही व्यक्ति को जाए, इसलिए बैंक से अपरिचित व्यक्तियों की पहचान स्थापित करवाने के लिए एक व्यक्ति ने चैक के पीछे लिखा- ‘मैं राम प्रसाद को जानता हूं और इसके पिता कृष्ण लाल को भी बचपन से जानता हूं’। इन घटनाओं को हम उस जमाने के हिसाब से सुरक्षित बैंकिंग का उच्चतम स्तर कह सकते हैं।

बरसों पहले जब एटीएम लगाए गए तो उनमें पैसे जमा करवाने की सुविधा भी थी। शुरू में कुछ समय ठीक रहा, फिर हमारे ‘भार्ई’ लोगों ने फटे-पुराने, टुकड़े-टुकड़े या फिर नकली नोट भी रखने शुरू कर दिए तो सुविधा बंद करनी पड़ी। ‘कार्ड डालो पैसा निकालो’ की व्यवस्था से शुरू में डर-सा लगा रहता। लोग एटीएम कार्ड बनवाने में हिचकिचाते थे। अब तो कार्ड क्लोन करना पुरानी बात हो गई है। पहले कई लोग पासवर्ड भूल जाते, किसी को दरवाजा खोलना नहीं आता तो अंदर बंद हो जाते। उन्हें बाहर निकालने जाना पड़ता। नोट उठाने में देर होती तो नोट वापस मशीन में चले जाते।

कोई व्यक्ति पैसे निकालने गया तो नकद खत्म था। मशीन से एक छोटी पर्ची निकली कि ‘माफ कीजिए, आपका यह काम नहीं हो पाएगा।’ बाहर किसी ने समझाया तो कहने लगा कि कुछ ले-दे के करा ले यार! अभी बस पकड़नी है और जेब में किराया भी नहीं है। लोगों को एटीएम अच्छा लगने लगा। ‘हर वक्त जादू’ यानी एक दोस्त हमेशा हाजिर। बैंक वाले एटीएम में कभी नकद खत्म होने की नौबत न आने देते। एक बार बहुत ज्यादा प्रयोग के कारण एटीएम के दरवाजे पर लगा ताला लॉक खराब हो गया और कई दिन तक ठीक न हो पाया तो कई दूसरी समस्याएं खड़ी हो गई। लालची लोग पहले औजारों से तोड़फोड़ कर पैसे लूटने की कोशिश करते थे, अब तो स्वचालित टेलर मशीन ही उखाड़ कर ले जाने की खबरें आने लगी हैं।

वर्तमान हालात यह है कि शातिर लोगों द्वारा नए-नए तरीके ईजाद करने के कारण आॅनलाइन फजीर्वाड़े की संख्या बढ़ती जा रही है। सच यह है कि इंसान के लिए सुविधाएं बढ़ाते रहा जाए तो उनमें कुछ शातिर लोग नई दुविधाएं उगाते रहते हैं। बनावटी या कृत्रिम बुद्धि के युग में बैंकिग को ज्यादा सुविधामय बनाते हुए उसके जोखिम बढ़ने भी स्वाभाविक हैं। हम जीवन में जितना बैंकिंग और आॅनलाइन बैंकिंग बढ़ाते हैं, उतना ही संबंधित जरूरी नियम और निर्देश जानने का प्रयास करना चाहिए और सतर्क रहना चाहिए। धोखे के नए-नए अंदाज देख कर दिमाग में यह सवाल जरूर आता है कि क्या हमारा समाज इतनी ज्यादा सुविधाओं के अनुकूल हो पाया है!

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