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दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगे: पूर्वग्रहों के रंग

बाजारवाद ने ही रंगों को अपने हिसाब से स्त्री-पुरुष के आधार पर बांटा हो। शायद इसीलिए कोई लड़की बड़ी होते ही गुलाबी रंग को...

दुनिया मेरे आगे: शिक्षा की दुकानें

दिल्ली के अलावा तमाम छोटे शहरों में भारी तादाद में चल रहे इस तरह के कोचिंग संस्थानों में दावों और नतीजों का हाल एक...

दुनिया मेरे आगे: कूड़े के पहाड़

आज जिस तेजी से शहरों में ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ के फार्मूले का प्रयोग किया जा रहा है, डर है कि यह संक्रमण की...

दुनिया मेरे आगे: सोच-विचार के गलियारे

सजगता की बिल्ली चौकन्नी होकर बैठी रहे तो विचार का चूहा बिल से ही नहीं निकलता।

दुनिया मेरे आगे: शब्द गढ़ते हैं

1937 के दौर में जिस तरह मृणाल का पति उसे बेंत से पीटता है उसके प्रेम संबंध के बारे में जान कर, आज 2018...

दुनिया मेरे आगे: नदी का जीवन

आज के संदर्भ में वह घटना आश्चर्यचकित करने वाली है, जब आपस के सगे-संबंधी तक कई बार एक दूसरे के नहीं होते। उसके बाद...

दुनिया मेरे आगे: संवेदना के धरातल

अब धीरे-धीरे सुदूर ग्रामीण इलाकों में भी संवेदनात्मक बदलाव या ह्रास देखने-महसूस करने को आसानी से मिल जाता है। अब स्पष्ट हो गया है...

दुनिया मेरे आगे: साइकिल की सवारी

आज के समय में जब बच्चों के शौक में वीडियो गेम की दुनिया बचपन से ही उनके अंदर एक तेज रफ्तार मनोभावना को जन्म...

दुनिया मेरा आगेः समता का सपना

सफर के दौरान कभी ट्रेन में तो कभी बस में कई बार यात्रियों की दिलचस्प बातें सुनने को मिल जाती हैं और उनमें हमें...

दुनिया मेरे आगेः फीके रंगों का वैशाख

साल भर में वैशाखी का दिन कभी गांव-कस्बों में खुशियों और उमंगों के मेलों में डूबा हुआ नजर आता था। लेकिन शहरों में गुम...

दुनिया मेरे आगे: असुरक्षा का जाल

हाल ही में दिल्ली के गोविंदपुरी इलाके में भीड़ भरे बाजार में एक महिला से छेड़छाड़ का जब उसके पति और दूसरे लोगों ने...

दुनिया मेरे आगेः संवाद का सिरा

बच्चा घर में हर किसी का प्यारा-दुलारा होता है। वह मां-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी की गोद से उतर कर स्कूल में कदम रखता है, जहां...

दुनिया मेरे आगेः बचपन के बोल

यह कुछ अफसोस की बात है कि आज हम कई बाल-सुलभ चीजें बड़ों में कम पाने लगे हैं। बिस्मिल्ला साहब की हंसी-मुस्कान हो या...

दुनिया मेरे आगे: मशीन बनता मनुष्य

आज की दौड़ती-भागती दुनिया में कहां सुकून है! जिधर देखिए, उधर लोग भाग रहे हैं। कोई कहीं रुकता नहीं। रुकने की जगह पर भी...

दुनिया मेरे आगेः तहजीब की तंगी

पिछले दिनों एक बैंक की शाखा में कुछ काम से जाना हुआ। काउंटर पर एक महिला बैंक खाता खुलवाने के बारे में पूछताछ कर...

दुनिया मेरे आगेः बुजुर्गों के आंसू

सदियों से हमारे यहां मातृशक्ति की पूजा और सम्मान की परंपरा पर गर्व किया जाता रहा है।

दुनिया मेरे आगेः मशीन की संवेदना

आजकल हम सभी के पास फोन है और हम दिन भर उस फोन में व्यस्त रहते हैं। उसे बार-बार देखते हैं कि कहीं कोई...

दुनिया मेरे आगेः एक शहर के चेहरे

उस दिन एक ट्राम सामने से गुजरी, जिसमें सवारियां कम थीं। हम उसे संग्रहालय की किसी प्राचीन वस्तु की तरह निहार रहे थे, जिसका...