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दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगे: यथार्थ के पर्दे में

नब्बे के दशक का सिनेमा रोमांस और मारधाड़ से भरी फिल्मों के बीच कहीं अपनी राह तलाश रहा था। ऐसे में फूलन पर बनी...

दुनिया मेरे आगेः प्रकृति की गोद में

जब एक व्यक्ति घर से बाहर निकलता है और प्रकृति की शरण में अकेला ध्यानमग्न होता है तो वह साधारण नहीं होता। वह प्रकृति...

दुनिया मेरे आगेः बदलाव के ठौर

शहर के उतार-चढ़ाव के बीच भीड़ के बरक्स समाज में पसरे एकाकीपन को देखते-समझते वक्त गुजरता गया। लेकिन वह सहेली जब भी मिलती तो...

दुनिया मेरे आगेः जिंदगी के रंग

उम्र के साथ आदमी बदलता और उलझता जाता है। खुशियों की तलाश में सुविधाएं जुटाता है, पैसे इकट्ठा करता है, लग्जरी गाड़ियों में घूमता...

दुनिया मेरे आगेः सहजता का मार्ग

सरकार द्वारा दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में ‘हैप्पीनेस पाठ्यचर्या’ की शुरुआत इस दिशा में एक सार्थक पहल हो सकती है। इसके अंतर्गत रोजाना एक...

दुनिया मेरे आगे: जिजीविषा की जंग

हमारे समाज में ज्यादातर लोग स्त्री को लेकर आज भी एक कुत्सित मानसिकता का शिकार हैं। जबकि स्त्री की हैसियत से एक समाज की...

दुनिया मेरे आगे: सहेजनी होंगी बेचैनियां

वे स्त्रियां जो हर पुरुष से जुड़ी हैं, मां, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेमिका और दोस्त बन कर। वे स्त्रियां जो जिंदगी से तो जुड़ी...

दुनिया मेरे आगे: वर्चस्व के विद्रूप

सबसे पहले और आखिरकार मानसिक स्तर पर दी गई स्वीकृति ही मनुष्य को व्यावहारिक स्वीकृति के लिए प्रेरित करती है। लेकिन अगर महिलाओं के...

दुनिया मेरे आगे: खेल बनाम काम

जिन बच्चों के अवलोकन को मैंने इस लेख का आधार बनाया है उनके खेल में समस्या समाधान, जोड़-तोड़ और सूझ आदि को देखा गया।...

दुनिया मेरे आगे: आधुनिकता की किरचें

हम मेट्रो ट्रेन में सवार हैं और अब बुलेट ट्रेन में सवार होने को लालायित हैं। फिर ये सफाई के औजारों के रूप में...

दुनिया मेरे आगे: सुबह के फूल

सुबह के फूलों की ओर निहारिये तो वे अपने रंग-रूप के सौंदर्य के साथ-साथ एक ताजगी का अहसास कराते हैं। सो, बहुतेरे लोग उनकी...

दुनिया मेरे आगे: एकांत का अंत

एकाकीपन की सजा के बारे में सोचते ही मन की गहराइयों में छिपा एक धुंधला चित्र सजीव होकर मेरी आंखों को नम करने लगता...

दुनिया मेरे आगे: पूर्वाग्रह की परतें

कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश की एक घटना ने मेरी तरह शायद किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर दिया होगा, जिसमें एक बारह साल...

दुनिया मेरे आगेः सूखती धरती

गांव का अपना तालाब हमारे बाबा मिट्टी से भरवा रहे हैं। वे अब यहां पर मकान बनवाएंगे और उसे किराए पर लगाएंगे। उन्हें इससे...

दुनिया मेरे आगे: सुनने की संवेदना

कई साल हो गए स्कूल छोड़े। जब पीछे मुड़ कर देखती हूं तो आज भी स्कूल का वह पहला दिन याद हो आता है...

दुनिया मेरे आगेः संस्कृति की राह

शोरशराबे, चकाचौंध, दंभ और पाखंड ने धर्म की अवधारणा को बिगाड़ कर रख दिया है। यह समझना मुश्किल है कि जो लोग जिस तरह...

दुनिया मेरे आगेः कहने की कला

यहां जब हम कहानी की बात कर रहे हैं तो वह एक अकादमिक कथाकार और उपन्यासकार की कहानी से हट कर अन्य कहानियों की...

दुनिया मेरे आगे: रुचियों का पाठ

स्कूल या कक्षा में जब तक पहला हक शिक्षक का होगा, तब तक बच्चे स्कूल आने को एक बोझ की तरह ही निभाएंगे। जब...