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दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगेः कौशल के साथ कला

किसी भी व्यक्ति के भीतर मौजूद यही कलाकार एक तरह से उसकी एक ऐसी पूरक ऊर्जा है जो उसे हर तरह की परिस्थिति में...

दुनिया मेरे आगेः बस्ते का बोझ

केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की 2005 की रिपोर्ट के मुताबिक निजी स्कूलों में किताबों का चयन स्कूलों के हिसाब से होता है, जो नियमानुसार...

दुनिया मेरे आगेः बाजार की मांग

करीब बीस या पच्चीस वर्ष पहले एक प्रकाशक ने अपने प्रकाशन का नाम बदल दिया था। सत्र की शुरुआत में एक सहायक के साथ...

दुनिया मेरे आगेः बिखरते-बचते पल

करीब तीन घंटे तक यह गेम चला, जिसमें सभी ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। कई लोगों की ऐसी छिपी प्रतिभा अन्य लोगों के सामने...

दुनिया मेरे आगे: वर्चस्व की संस्कृति

इस समाज में ऐसी संरचनाओं को तोड़ने की जरूरत है, जिनमें दूसरे लोगों पर नियंत्रण और वर्चस्व का भाव निहित होता है। इसकी शुरुआत...

दुनिया मेरे आगे: प्यास का पैमाना

संभवत पूरे देश में ही कोशिश नहीं हुई और हम बहते पानी के शोधन और संरक्षण को लेकर नाकाम रहे। कई जगहों पर नलकों...

दुनिया मेरे आगेः सांध्य बेला में

ग्रामीण इलाकों के समाज में हमने अक्सर देखा है कि माता-पिता आम, कटहल, लीची, जामुन और अमरूद जैसे फलदार पेड़ अपनी भावी पीढ़ी, यानी...

दुनिया मेरे आगेः वे कोरा कागज नहीं

मगर बच्चे अक्सर इस प्रचलित समझ से परे अपनी समृद्ध उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वे अपनी गतिविधियों, बातचीत और सहज मेधा से यह सिद्ध...

दुनिया मेरे आगे: अंकों का मायाजाल

यह खबर ज्यादातर लोगों को याद होगी कि एक युवती पर पढ़ाई का बहुत बोझ डाला गया और उसकी रुचि के अनुसार विषय नहीं...

दुनिया मेरे आगे: मानवीय तकाजा

एक स्त्री, जिसका बच्चा अभी उसी के दूध पर आश्रित है, उसके लिए सार्वजनिक जगह पर कोई ऐसा इंतजाम नहीं है, जहां वह...

विश्वास के संकेतक

स्कूल समाज का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है। विद्यालयी पाठ्यचर्या की राष्ट्रीय रूपरेखा 2005 में यह कहा गया है कि गांव में स्कूल नहीं...

दुनिया मेरे आगे: सूखती संवेदनाएं

बुजुर्ग दादा-दादी, माता-पिता को साथ रखना भी लोगों को बोझ लग रहा है। यह बेवजह नहीं है कि आज वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ती जा...

दुनिया मेरे आगे: समांतर सिनेमा की राह

1972 में निर्मल वर्मा की कहानी ‘माया दर्पण’ पर इसी नाम से फिल्म बना कर हिंदी सिनेमा में ‘फॉर्म’ के प्रति एकनिष्ठता को लेकर...

दुनिया मेरे आगे: सफर की छवियां

एक युवती ने रेलगाड़ी की यात्रा के बारे में फुर्सत और विस्तार से बताया जो काठगोदाम से लखनऊ तक की तकरीबन साठ-पैंसठ रेल यात्राएं...

दुनिया मेरे आगे: छवि के बरक्स

आंकड़ों को देखें तो वित्तीय वर्ष 2017-18 की नीति आयोग की उस रिपोर्ट को भी देखना पड़ेगा, जिसमें कहा गया है कि बिहार सरकार...

दुनिया मेरे आगे: मुक्ति की चाह

कभी ढाई साल की तो कभी सात साल की मासूम बच्चियां, सभी कमजोर तबकों की, जिनकी हत्या या बलात्कार के वक्त कुछ भी सोचना...

जोड़ने से तोड़ने तक

आजकल सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि मुद्दे सोशल मीडिया के विषय बन गए है और सोशल मीडिया का सबसे बड़ा हथियार मोबाइल ही है। भाई,...

दुनिया मेरे आगे: वंचना की मार

दिल्ली के एक पॉश माने जाने वाले इलाके के चौराहे पर अक्सर मैं कुछ छोटी लड़कियों को देखता हूं, जिनके हाथों में गुलाब के...