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दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगे: भाषा बनाम बोली

भाषाएं बोलियों से बनीं हैं। इसलिए भाषा और बोली के बीच गहरा संबंध है। इसके बावजूद दोनों अलग-अलग चीजें हैं। ध्वनि प्रकृति में उपलब्ध...

दुनिया मेरे आगे: वंचना की व्यवस्था

अगले दिन उन खेतों की ओर जाने का मैंने निश्चय किया। भाषा की कठिनाई की वजह से मैंने एक बच्चे को साथ ले लिया।...

दुनिया मेरे आगे: सर्दी में बेघर

ये बेखौफ और निर्भीक निर्धन लोग ठंड का पूरे जोर-शोर से मुकाबला करते हैं, लेकिन प्रकृति के निर्दय तांडव के आगे इनके हौसले मात...

दुनिया मेरे आगे: मोर की बोली

हमारे शास्त्रीय नृत्यों में उसकी चाल को स्थान भी मिला है। वह कविताओं में है। ‘दादुर मोर, पपीहे बोले’! वर्षा ऋतु का वर्णन उसके...

दुनिया मेरे आगे: संस्कृति के चेहरे

देखने की बात यह है कि भारतीय संस्कृति में जिस मां को भगवान से भी बड़ा माना जाता है, वहां इसी संस्कृति में लोगों...

दुनिया मेरे आगे: इंसाफ की नजीर

एक ओर इस तरह के लोमहर्षक उदाहरणों का अंबार है, जिनमें जनसंहारों को अंजाम देने वाले या उसमें हिस्सा लेने वाले लोगों ने कभी...

दुनिया मेरे आगे: बदलाव की रफ्तार

अमूमन मैं ही दादी के साथ मंदिर जाता था। तंग गलियों, खुली नालियों, कूड़े वाले रास्तों के बीच से। एक दिन मैंने दादी से...

दुनिया मेरे आगे: सुनो कहानी

दरअसल, कहानियां दुनिया के बारे में हमारा नजरिया बनती हैं। ये हमें अलग-अलग जगहों, स्थितियों और पात्रों के जीवन के बारे में जानने का...

दुनिया मेरे आगे: कठपुतली बनते हम

विडंबना है कि न चाहते हुए भी हम अक्सर कठपुतली बन जाते हैं या बना दिए जाते हैं। निश्चित ही इसका कारण हममें विवेकशीलता...

दुनिया मेरे आगे: बदलती सूरत

देहरादून के कई सरकारी प्राथमिक स्कूलों की चारदिवारी, कमरों की दीवारों को देखने और वहां के बच्चों से मिलने, उनसे बातें करने के बाद...

दुनिया मेरे आगे: बोझ तले मासूम

इस सबके बीच मनुष्य की सबसे बड़ी इच्छा रही है कि वह अमर हो जाए, लेकिन सामान्य ज्ञान वाला व्यक्ति भी जानता है कि...

दुनिया मेरे आगे: समाज का शिक्षण

आजकल अपने आपको प्रगतिशील मानने वाले हम लोग सोचते हैं कि बच्चों को अपने हिसाब से जीने दिया जाए। उसके जीवन में कोई हस्तक्षेप...

दुनिया मेरे आगे: काम के नाम पर

हो सके तो काम करते हुए भी हर रोज थोड़ी देर के लिए सही, कुछ किए बगैर रहना चाहिए। खालीपन की मासूमियत के साथ...

दुनिया मेरे आगे: वंचना का पाठ

जब राखी, दिवाली, होली, मकर संक्रांति या ग्रीष्मकाल की छुट्टियां होतीं तो कुछ बच्चे अपने घर जाने में दिलचस्पी दिखाते। ऐसे ही कुछ बच्चों...

दुनिया मेरे आगे: अपने हिस्से में से

अगर हम विचार करें कि ऐसे प्रकृति-प्रिय जीव, जिनका न कोई बैंक खाता है, न कल के अनाज का भंडारण और न कोई स्थायी...

दुनिया मेरे आगे: उत्सवधर्मिता की तलाश में

व्यष्टि की जगह समष्टि चिंतन का विचार आज लगभग बेमानी हो चुका है। यह शुद्ध बाजारी ताकतों का प्रभाव है। बाजार आज हमारे शयन...

दुनिया मेरे आगे: खेल बनाम सियासत

पंजाब में राजनीति भी बड़े शौक से खेली जाती है। अगर क्रिकेट संयोग है तो राजनीति मौके का। पर क्रिकेट की तरह राजनीति में...

दुनिया मेरे आगे: वक्त रुकता है कहां

शहर हों या देहात, आप घूम कर देख लीजिए। हरेक उत्सव में अतीत मुस्कराता हुआ आता है। वह मांगता कुछ नहीं, मगर हमसे सब...