दुनिया मेरे आगे

जिंदगी का सादा पाठ

स्वर और व्यंजनों के मेल से वर्णमाला बनती है। प्राथमिक विद्यालय में ही इस परिभाषा से परिचित हो चुके थे।

मखौल का मानस

मेरे एक करीबी रिश्तेदार हैं। वे अपनी उम्र की प्रौढ़ावस्था में पहुंच चुके हैं और अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं।

स्वीकार का साहस

कुदरती तौर पर हम अलग-अलग बने हुए हैं, इसलिए हरेक मनुष्य के सोचने-समझने और बोलने का ढंग अलग-अलग है।

विषमता का पाठ

ऑनलाइन शिक्षा के लिए सिर्फ एक स्मार्टफोन की जरूरत नहीं रहती है। उसके लिए हर महीने कम से कम ढाई सौ, तीन सौ या...

किताबों का खाली कोना

पिछले दिनों मुझे बीते और वर्तमान समय में निकलने वाली विभिन्न पत्रिकाओं को एकत्रित करने की जरूरत पड़ी।

भाषण की खुराक

शब्दों को पकड़ना और फिर परोसना भी एक कला है।

प्रकृति से दूर

भूल गया था पुरानी उबड-खाबड़ सड़क को। पहली बार लंबी-चौड़ी चमचमाती सड़क पर स्कूटर दौड़ रहा था।

भरोसे के पायदान

वर्षों से मनुष्य ने हथियारों की होड़ को भय की बुनियाद माना है।

काम के हक पर रियायत भारी

देश के नव-निर्माण के लिए मेहनत का कोई अर्थ नहीं रह गया है। यह बात पिछले दिनों कुछ इस प्रकार स्पष्ट हो गई कि...

एकांत बनाम अकेलापन

पेड़ों को ईश्वर मानने की परंपरा न जाने कब से चलती आ रही है। महात्मा बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई।...

चौथेपन की जिजीविषा

जिस दौर में हर तरफ जिंदगी की भूख में लोग उम्मीद के सहारे सुबह-शाम गुजार रहे हैं, उसमें पिछले दिनों महज नई साड़ी पहनने...

वंचना के घेरे

मनुष्य ने अपने अस्तित्व के आरंभ से आज तक जो भी संचित किया है, उसमें अन्य चीजों के साथ कुछ मिथक और धारणाएं भी...

सिकुड़ती जिंदगी के दायरे

कुछ समय पहले परिवार के ही करीबी एक बुजुर्ग ने सुबह फोन किया। किसी वजह से फोन नहीं उठा पाया तो तुरंत ही उन्होंने...

शब्दों का इंद्रधनुष

जब हम अपने मन से एक छोटा-सा संदेश लिख कर किसी को भेजते हैं, तब वे मौलिक शब्द हमारी सोच और कल्पना में चार...

सुविधा की दुविधा

तकनीक ने खूब रफ्तार विकसित की है जिसके सहारे पल भर में ‘इसका धन’, ‘उसका धन’ हो जाता है।

लोक के गीत

लोकगीतों की सबसे खास बात यह रही है कि ये भारतीय समाज का आईना होने के साथ स्त्री या पुरुष के दुख को बहुत...

देशांतर अंतर्दृष्टि

इन दिनों दुनिया सिकुड़ गई है। आभासी दुनिया का एक नया जीवन कोलाज अब जीने का एक अभिन्न तरीका बन गया है।

संवाद के बिखरते सूत्र

समाज संवाद से जिंदा रहता है। लेकिन क्या अब इस समाज को संवाद की जरूरत महसूस हो पा रही है? उम्र के आखिरी दशक...

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