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दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगे: संस्कृति बनाम बच्चे

दरअसल, पश्चिमी देशों में बच्चों के अधिकारों और उनकी निजता को लेकर अतिवादी समझ काम करती दिखती है।

दुनिया मेरे आगे: विकल्प के रास्ते

अखिल भारतीय प्लास्टिक विनिर्माता संघ के अनुसार करोड़ों के प्लास्टिक व्यवसाय में करोड़ों लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।

दुनिया मेरे आगे: विज्ञान की चेतना

औपचारिक स्कूली शिक्षा का मुख्य उद्देश्य एक बेहतर वांछित समाज का निर्माण करना है।

दुनिया मेरे आगे: सिकुड़ती दुनिया

इन सब चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार या दूसरों की राह देखने के साथ-साथ अगर हम खुद ही पहल करें तो किसी साधन...

दुनिया मेरे आगे: सोने-जागने का संघर्ष

पार्क से बाहर निकला तो तेज हॉर्न बजाते वाहनों का अनावश्यक ध्वनि-प्रदूषण, कबाड़ी वालों का गला फाड़ चिल्लाना, रेहड़ी-फेरी वालों का वस्तु बिक्री गान...

दुनिया मेरे आगे: राह का कनेर

कोई जरूरी नहीं कि सबको व्यवस्थित जगह ही मिले। होना तो यह चाहिए कि जो जगह मिल गई है, कोई वहीं पर मगन हो...

दुनिया मेरे आगे: झूठ का परदा

मनोविश्लेषकों का कहना कि इस तरह के लोग दूसरों को प्रभावित करने के आशय से अपने और अपने काम, अपनी उपलब्धियों के बारे में...

दुनिया मेरे आगेः स्मृतियों में गांव

गांव मुझे बहुत पसंद हैं। हालांकि वहां रहने की अपनी बड़ी समस्याएं भी हैं, लेकिन इसके बावजूद गांव मुझे आकर्षित करता है। अब तो...

दुनिया मेरे आगेः आस्था और विश्वास

मैं भी शुरू से ही धार्मिक प्रवृत्ति होने के नाते धार्मिक स्थानों पर जाता रहता हूं। मुझे परीक्षा के दौरान बच्चे को छोड़ने के...

दुनिया मेरे आगेः कसौटी पर इंसानियत

काम करने की जगह ऐसी हो, जहां उसकी क्षमताओं में वृद्धि हो; जो उसे एक खुले मैदान जैसी लगे, न कि चारदिवारी की कैद...

दुनिया मेरे आगेः स्मृतियों के कोने में

मुझे उस पुराने भोंपू वाले ग्रामोफोन का ध्यान आया, जिसे पत्नी ने चमका कर बैठक में सजावटी धरोहर के तौर पर रख दिया था।...

दुनिया मेरे आगे: परंपरा का आईना

आम भारतीय जनमानस में बसे दो ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में भी घटनाओं की तार्किकता पूर्वजन्म के प्रारब्ध और संचित कर्म व वर्तमान के...

दुनिया मेरे आगे: हरी घास पर कुछ देर

महानगर में रहने वालों को यह हरी घास न मिले तो जरा सोचिए उनका क्या हाल होगा! हरी घास का एक टुकड़ा ही सही,...

दुनिया मेरे आगे: हम छत पर हैं

रिश्तों की दुनिया में आधे से ज्यादा दिक्कतों की वजह एक ही है कि मन को खोलते तो सब हैं, लेकिन मन की किताब...

दुनिया मेरे आगे: झूठ और बहाना

सभी जानते हैं कि मूंछ कटाना कोई खेल नहीं है। कल वे घंटे भर तक इधर-उधर की बातें करते रहे।

दुनिया मेरे आगे: इंसानियत के हक में

संत के रूप में प्रचारित बाबाओं के आश्रम हैं। आम जन भटक कर शांति की तलाश में इन आश्रमों में आ जाता है।

दुनिया मेरे आगे: समांतर संघर्ष

बापू का जीवन, उनके जीवन के द्वंद्व, तनाव, संघर्ष- सभी कुछ को ‘बा’ ने संभाला।

दुनिया मेरे आगे: आधा-आधा कुआं

दरअसल, यह कुआं दो परिवारों की जमीन में आधा-आधा पड़ता है तो आधा-आधा बंट गया।