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दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगेः विज्ञान का लोकतंत्र

अपने यहां के विद्यालयों में एक अघोषित और सर्वमान्य-सा नियम है कि दसवीं में अच्छे अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी विज्ञान विषय लेकर आगे...

दुनिया मेरे आगेः काम की कड़वाहट

साल की शुरुआत हुई और नए साल के मौके पर होने वाला उत्सव गुजर गया।

दुनिया मेरे आगेः बदलाव की बयार

दादी अक्सर बताती हैं कि पहली बार टेलीविजन सेट आया था तो पूरे गांव के लोग उसे देखने आ गए थे। उस समय टीवी...

दुनिया मेरे आगेः संवेदनहीनता की कड़ियां

पिछले दिनों दिल दहला देने वाले कुछ ऐसे वाकये हुए, जिन्होंने मानवता को शर्मसार तो किया ही, यह सोचने पर भी बाध्य कर दिया...

दुनिया मेरे आगेः सामाजिक दायित्व के बहाने

हाल ही में एक मशहूर कॉरपोरेट कंपनी ने दिव्यांगों के लिए ‘सीएसआर’ यानी अपने सामाजिक दायित्व से संबंधित कार्यक्रम का आयोजन किया।

दुनिया मेरे आगे- परदे के पीछे

हमारा समाज जिस मानस में जीता है उसमें बहुत सारे लोगों के ताकझांक करने को स्वाभाविक मानवीय कमजोरी माना जा सकता है।

दुनिया मेरे आगेः सुविधा की बातें

एक बच्चा तब झूठ बोलता है, जब वह अपने बड़ों को झूठ बोलते देखता है। मजे की बात है कि यही बड़े अपने बच्चों...

दुनिया मेरे आगेः ठगी के चेहरे

करीब दो महीने पहले की बात है। दोपहर का समय था। मैं पति के साथ बैठी थी। उनके पास एक फोन आया, जिसमें उधर...

दुनिया मेरे आगेः पढ़ाई की मुश्किल

विद्यालय वह प्राथमिक इकाई है जहां हमारे बच्चे दिन का अधिकांश वक्त गुजारते हैं। आज अन्य क्षेत्रों की तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी...

दुनिया मेरे आगेः नेपथ्य पर पर्दा

उच्च शिक्षा में अध्ययन-अध्यापन को लगभग दस साल होने को आए। अपना अनुभव यही कहता है कि भारत में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के केंद्र के...

दुनिया मेरे आगे- गांव आखिर गांव

यह सच है कि अब शहर और गांव के रहन-सहन में अंतर लगभग खत्म होता जा रहा है।

दुनिया मेरे आगेः सुबह की सैर

भोपाल से तबादले के बाद इंदौर आने पर मैं वरिष्ठ नागरिकों के एक समूह में शामिल हो गया। सुबह की सैर की आदत पहले...

दुनिया मेरे आगेः सिनेमा का समाज

अब सिनेमा हमारे लिए दिवास्वप्न ही होता जा रहा है। भारतीय और खासकर हिंदी सिनेमा के बारे में यह बात बहुत वास्तविकता के साथ...

दुनिया मेरे आगेः उदास नदियां

यह संभव है कि एक दिन हम गहरी नींद से जागेंगे और पाएंगे कि हमारे घर के बर्तन फर्श पर पड़े औंधे मुंह धूल...

दुनिया मेरे आगेः रिश्तों की संवेदना

बिहार में पदस्थापित एक अधिकारी से फोन पर बातचीत के क्रम में मैंने यह जानना चाहा कि क्या आपके मां-पिता भी आपके साथ ही...

दुनिया मेरे आगेः भरोसे की कला

नाटक के लिए कहा जाता है कि यह विश्वास दिलाने की कला है। दरअसल, कला का हर माध्यम यकीन दिलाने की कला ही है।

दुनिया मेरे आगेः भोज के बरक्स

गांव से किसी के देहांत की खबर आई थी। परिजन के जाने से मन दुखी था, लेकिन दुख का एक और कारण भी था...

दुनिया मेरे आगेः मुक्त गगन

अपनी-अपनी धुरी पर भागते मनुष्य की इस दुनिया में नित नए मूल्य और संस्कार टूटते हैं, बनते हैं और परिवर्तित होते समय में फिर...