दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगे: लालच की क्रूरता

हाल के दिनों में मानव निर्मित पर्यावरण के चलते छोटे जीवों का अस्तित्व खतरे में आ पड़ा है।

दुनिया मेरे आगे: नफरत के दौर में

इस पाक रिश्ते की गहराई इतनी अधिक थी कि उन्हें हिंदू या मुसलमान होने के गुमान का कभी अहसास तक नहीं हुआ।

दुनिया मेरे आगे: दावानल में जलता जीवन

गहन विचार का मुद्दा है कि हम उन्नत तकनीकियों से लैस होकर भी लाचार जीवों की कोई सहायता नहीं कर पाते।

दुनिया मेरे आगे: सच पर परदा

सच यह है कि सहमति से हुए सेक्स के बावजूद यौन शोषण की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

दुनिया मेरे आगे: वन्यजीवों के बीच

लगभग तीन घंटे की सफारी में दो सौ बयासी वर्ग किलोमीटर के वृहद् अभयारण्य में बीसों किलोमीटर घूम कर भी सौभाग्यशाली सैलानी ही कोई...

दुनिया मेरे आगे: बिछुड़ने की पीड़ा

उस प्रसंग को याद कर आज भी आंखें भर आती हैं। हृदय में एक हूक-सी उठती है। लेकिन सच से कितना मुंह चुराया जा...

दुनिया मेरे आगे: पितृसत्ता का संजाल

हिना पंवार पिछले दिनों महिलाओं के खिलाफ हुई कुछ घटनाओं ने मुझे भीतर से झकझोर दिया। हिंसा की ये त्रासद अपराध की घटनाएं तेजी...

दुनिया मेरे आगे: गायब होते गांव

गांव की तस्वीर एकदम बदरंग और दयनीय दिखाई पड़ रही है। गांव के धूल-धूसरित जीवन से सब मुक्ति चाहते हैं, लेकिन मैं गांव और...

दुनिया मेरे आगे: अंधविश्वास का कारोबार

कुछ समय पहले पुणे से भी एक मामला सामने आया था, जहां आइसीयू में बीमारी का इलाज करा रही एक महिला के लिए किसी...

दुनिया मेरे आगे: सितारे जमीन पर

प्रसंगवश, सड़कों पर निकले जुलूस में ‘हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है’, और ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत...

दुनिया मेरे आगेः पंक्षी ऐसे आते हैं

मेरे बचपन का हिस्सा कुछ कोलकता में बीता, कुछ उत्तर प्रदेश में पुरखों के गांव में। वहां की उन दिनों की चिड़ियों की गुंजार...

दुनिया मेरे आगे: अपना भरोसा

स्टीफन हाकिंग्स इतनी आधी-अधूरी देह के बाद भी संसार के लिए मिसाल बन गए।

दुनिया मेरे आगे: बातों का अलाव

बचपन के दिन याद आते हैं जब जाड़ों में हम सारे भाई-बहन अलाव के पास बैठे रहते थे और अम्मा हमें देसी घी डाल...

दुनिया मेरे आगे: दो पल के जीवन में

जिस तरह किसी क्षेत्र में नई शुरुआत करने के लिए कोई खास मुहूर्त तय नहीं होता, वैसे ही प्रेम घटित होने के लिए भी...

दुनिया मेरे आगे: बच्चे आखिर बच्चे हैं

अब ढिशुम-ढिशुम के साथ खलनायक को नहीं मारा जाता, बल्कि ‘भड़ाम’ की आवाज के साथ किसी गांव को बम से उड़ा दिया जाता है।

दुनिया मेरे आगे: जड़ता का समाज

आज हम जिस दौर में पहुंच चुके हैं, वह आत्मिक और मानवीय संबंधों की दृष्टि से बेहद संवेदनहीन है।

दुनिया मेरे आगेः संकल्पों की लौ

अक्सर यह ध्यान में आया है कि जब नया साल शुरू होता है, तब हम तरह-तरह के संकल्प लेते हैं, मसलन, कोई शराब-सिगरेट-तम्बाकू छोड़ने...

दुनिया मेरे आगेः जड़ पर चोट

राम ने नीतिगत युद्ध में जिन-जिन समूहों का सहयोग लिया, उन्हें प्रतीकात्मक रूप से कभी वानर तो कभी भालू के रूप में देखा गया,...

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