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मेहनत बनाम लगन

गणित के शिक्षक की जिंदगी कभी-कभार किसी जटिल विषय से भी बदतर होती है।

सांकेतिक फोटो।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

गणित के शिक्षक की जिंदगी कभी-कभार किसी जटिल विषय से भी बदतर होती है। आंखें मानो शून्य सी, कान तीन-तीन की तिकड़ियों-सी और नाक हर समय नथुनों की ऐंठन से छह की तरह लगती है। कुल मिला कर चेहरे पर हमेशा बारह बजे रहते हैं। आंकड़ों के फेर में पड़ कर सारी अकड़ न जाने कब फितूर हो जाती है, पता ही नहीं लगता। कभी-कभी तो लगता है कि सिरपकाऊ सम्मेलनों, भाषणों के आपदाग्रस्त श्रोताओं के बाद यही वह वर्ग है जो सबसे ज्यादा सिरदर्द की गोली पर जिंदा रहता है। दूसरे शब्दों में सिरदर्द की सारी दवा कंपनी इन्हीं वर्गों से अपनी रॉयल्टी कमाती हैं।

एक दिन एक गणित मास्टर ने किसी छात्र से पूछ लिया कि चार गुणा पांच कितना होता है। सामान्य गणित करने वाले भी इस प्रश्न का उत्तर दे सकते थे। लेकिन छात्र था कि उत्तर मालूम होने के बावजूद ना-नुकूर करता रहा। न जाने उस पर किसने क्या जादू कर दिया कि लाख पूछने पर भी न हिला, न डुला। एकदम बेफिक्र की तरह अपने स्थान पर खड़ा रहा। शिक्षक की थोड़ी बहुत डांट-डपट का कोटा अपने बदन से झाड़ कर वह बैठ गया। हंसमुख, चुलबुले स्वभाव वाले उस छात्र को उस दिन के बाद न जाने क्या हो गया कि वह गुमसुम-सा उखड़ा-उखड़ा रहने लगा। कुछ दिनों बाद उसने पाठशाला छोड़ दी।

इस घटना को पंद्रह वर्ष बीत गए। अब शिक्षक बूढ़े हो चले थे। घर की माली हालत बड़ी तंग थी। पाठशाला ने उन्हें बुढ़ापे का हवाला देकर ‘इस्तेमाल करो और फेकों’ की तरह टरका दिया। इकलौता बेटा काफी पढ़ा-लिखा होने के बावजूद शिक्षक के सीने पर मूंग दल रहा था। उनका मन करता था कि घर की जिम्मेदारियों की गठरी बना लें और सिर पर धर कर बिना किसी को बताए अपने रास्ते निकल लें। यह तो निश्चित है कि ऐसा करने पर भी जल्दी से कोई नौकरी मिलने वाली है नहीं। बूढ़े जो थे! लेकिन हाथ पर हाथ धरे बैठना ठीक भी नहीं है।

माना कि अपना आशियाना अपना होता है। जान से भी प्यारा होता है। यह तब तक अपना और प्यारा लगता है जब तक पेट में भूख की मरोड़ न हो। आंखों में बिलखते-तड़पते आंसू न हों। उन्हें उम्मीद है कि कहीं न कहीं फाइव-जी नेटवर्क, आधुनिक तकनीक साधन, अधुनातन वैज्ञानिक प्रगति से पहले गरीब के हित की बात, राजनीति से पहले भूख मिटाने की बात, अगली सदी से पहले अभी की बात, मृत मूर्तियों से पहले जीवित चेहरों की बात, आभासी चुनाव प्रचारों से पहले जीते-जागते इंसानों की बात और माधव के मंदिर बनाने से पहले मानव जीवन बचाने की बात होती होगी।

संयोगवश एक दिन शिक्षक जी को पेपर में अपने बेटे और खुद के लायक किसी नौकरी का विज्ञापन दिख गया। लड़का इतने साक्षात्कार दे चुका था कि अब उसे सारे विज्ञापन सौंदर्य साधनों से लगने लगे। इसलिए लड़के का विज्ञापनों में विश्वास न रहा। जैसे-तैसे पिता ने उसे मनाया और दोनों साक्षात्कार के लिए चल पड़े। कंपनी का मालिक बारी-बारी से सबसे सवाल-जवाब तलब कर रहा था। न जाने शिक्षक को देख कर उसे क्या हुआ कि उसने तुरंत उन्हें बुलाया। मालूम करने पर पता चला कि वे लड़के के साथ-साथ खुद भी नौकरी करना चाहते हैं। मालिक ने उन्हें नौकरी पर रखने से मना कर दिया और उनके लड़के को दुगनी तनख्वाह पर नौकरी में रख लिया।

नैतिकता के पतझड़ में मास्टर जी कब के सूख कर पीले पड़ गए थे। लेकिन आज उनकी आंखों में कृतज्ञता के आंसू छलक पड़े। वे कुछ कहना चाहते थे। तभी मालिक बोल उठा- ‘आपको याद है कि आप पाठशाला में गणित पढ़ाते थे? एक दिन आपने किसी लड़के से चार गुणा पांच पूछा था? वह लड़का कोई और नहीं, मैं ही हूं। मास्टर जी, आप और मैं उस शिक्षा के पाट में पीस कर रह गए जहां सोचने वाले नहीं, रट्टा मारने वाले और जिंदगी की चुनौतियों से डर कर भागने वाले यंत्र बनाए जाते हैं। चार गुणा पांच कितना होता है, बताने के लिए कैलकुलेटर तब भी था और अब भी है। मैं तो कैलकुलेटर बनाने के पीछे लगने वाला गणित सीखना चाहता था। दुर्भाग्य से ऐसी शिक्षा हमारी पाठशाला में नहीं दी जाती। बस चले तो आज की शिक्षा व्यवस्था मां के गर्भ से बच्चे को छीन कर आइएएस, आइपीएस, मेडिकल की कोचिंग देना शुरू कर दे। मेहनत करने से शिक्षा प्राप्त नहीं होती, वह तो लगन से प्राप्त होती है।

मास्टर जी यह सुन कर अपने जीवन भर के गणित का अवलोकन करने लगे। उन्होंने जीवन भर बच्चों को गणित का जीवन सिखाया, जबकि उन्हें जीवन का गणित सिखाना चाहिए था। दुर्भाग्य से हमारी किताबें, पाठ्यक्रम, मास्टर इन सबसे बेखबर रैंकों की अंधाधुंध होड़ में विद्यार्थियों की जगह घोड़ों की दौड़ करा रहे हैं। और घोड़े हैं कि भेड़चाल की संस्कृति में एक-दूसरे के आगे-पीछे लगे हुए हैं। जानवर बनाने वाली शिक्षा से इंसान बनाने की अपेक्षा करना, बोया पेड़ बबूल का आम कहां से होए, जैसा होगा।

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