सिकुड़ती जिंदगी के दायरे

कुछ समय पहले परिवार के ही करीबी एक बुजुर्ग ने सुबह फोन किया। किसी वजह से फोन नहीं उठा पाया तो तुरंत ही उन्होंने दोबारा किया।

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सांकेतिक फोटो।

चंदन कुमार चौधरी

कुछ समय पहले परिवार के ही करीबी एक बुजुर्ग ने सुबह फोन किया। किसी वजह से फोन नहीं उठा पाया तो तुरंत ही उन्होंने दोबारा किया। वे आमतौर पर मुझे कभी फोन नहीं करते थे, मैं ही अक्सर उनकी खोज-खबर लेता रहता हूं। ऐसे में थोड़ा आश्चर्य हुआ। फोन उठाया तो कहने लगे, ‘फिर सब कुछ बंद होने वाला है। तुम्हारे मां-पापा पास वाले शहर में फंस जा सकते हैं। समय ठीक नहीं है। ऐसे में उन्हें यहां हमारे घर मत भेजो। तत्काल कोई व्यवस्था करो और उन लोगों को वापस घर ले जाओ।’ अनजान शहर गए बुजुर्ग मां-पापा को लेकर मैं पहले से ही चिंतित था। लेकिन परेशान नहीं हुआ और किसी तरह मां-पापा को अपने पास लाने में सफल रहा।

बाद में मां से जो बात सुनने को मिली, उससे लोगों की संवेदनाएं शून्य होने का साफ आभास हुआ। दरअसल, मां ने बहुत उम्मीद से उन बुजुर्ग के परिवार में एक महिला को फोन करके कहा था कि ‘लगता है सब कुछ बंदी होने वाला है… हम यहां आपके पास वाले शहर में ही हैं। डर है कि घर वापस जाने के रास्ते में कहीं फंस न जाऊं। बेटा का घर बहुत छोटा है और आपका बहुत बड़ा। कई कमरे बंद पड़े रहते हैं। ऐसे में चाहती हूं कि आपके पास आ जाऊं। स्थिति ठीक होते ही अपने घर चली जाऊंगी।’ महिला रिश्तेदार ने उन्हें कई सारी परेशानियां गिना दीं। मतलब साफ था कि आप यहां मत आइए। अन्यथा आप लोगों को दिक्कत होगी। इसलिए तुरंत सीधे घर चले जाइए। इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने घर के बुजुर्ग से भी फोन करवाया था।

यह छोटा-सा अनुभव और वाकया निजी हो सकता है। लेकिन ज्यादातर लोग अगर अपने आसपास गौर करें, तो उन्हें कहीं न कहीं संवेदनाओं के छीजने और खुद में सिमटते जाने की प्रवृत्ति में तेज बढ़ोतरी होती दिख सकती है। दिमाग में बस यही घूमता है कि इस दुनिया को क्या हो गया है। आखिर संकट के दौर में लोग इतने संवदेनहीन क्यों होते जा रहे हैं। बेहद करीब के रिश्ते भी संवेदनाओं की डोर को कमजोर होने से नहीं रोक पा रहे हैं। मुसीबत में कोई अपना ही अपनों के काम आता है। बल्कि मुसीबत के समय अनजान और दूसरे लोगों की भी भरपूर मदद करनी चाहिए। लेकिन हालात अब तेजी से बदल रहे हैं और साथ ही लोग भी।

समाज में आजकल ऐसी घटनाएं और कहानियां अक्सर सुनने को मिल जाएंगी, जिसमें हम संवेदना की जगह नहीं पा रहे हैं। जिसे देखा जाए, उसे सिर्फ अपने से मतलब है। उसके स्वार्थ के रास्ते में जो आता है, वह उसका दुश्मन हो जाता है। ज्यादातर लोगों को ‘अपने’ की परिभाषा धीरे-धीरे तेजी से सिमटती जा रही है। दायरा बहुत छोटा होता जा रहा है। कभी-कभी सोचता हूं कि लोगों का यह सिमटना कहां जाकर रुकेगा! हाल ही में मैं एक परिचित के यहां गया था। उनके यहां कुछ लोग आए थे। सभी बातचीत में इतनी मिठास घोल रहे थे कि लग रहा था वे उनके सबसे बड़े हितैषी हैं। लेकिन उन लोगों के जाते ही बुराइयों का पिटारा जो खुला, वह बंद ही नहीं हो रहा था। जाहिर है कि आमने-सामने बैठ कर की गई बातों की मिठास सिर्फ दिखावे के लिए थी। अब इस दौर में तो लोगों का मिलना-जुलना भी बंद हो गया है तो पता नहीं मिठास की अभिव्यक्ति के लिए कौन-सा रास्ता निकाला जा रहा होगा!

आजकल यही भाव कमोबेश समाज में ज्यादातर लोगों में देखने को मिल रहा है। लगता है कि लोगों को दूसरों के दुखों से कोई मतलब नहीं रह गया है। ज्यादा दिन पहले की बात नहीं है जब लोग दूसरे के दुख से दुखी और सुख में सुखी होने को अपने भीतर के इंसानियत के तौर पर देखते थे। अब लगता है कि अपना सुख कैसे हासिल हो जाए, बाकी को क्या मिलता है, क्या नहीं, इससे कोई मतलब नहीं। अफसोस यह है कि ऐसे लोगों के साथ जब कोई दुखद घटना होती है, तब उन्हें पता चलता है कि एक दूसरे के दुख में काम आने की क्या अहमियत होती है। कायदे से कहें तो हमारा इंसान होना तभी तक सार्थक है जब तक हमारे भीतर इंसानी संवेदनाएं जीवित हैं। अगर किसी वजह से या किसी बहाने से हम अपनी मजबूरी जता कर अपनी संवेदनाओं से समझौता करके खुद को एक दायरे में कैद कर लेते हैं तो यह न केवल तात्कालिक रूप से सामाजिक मूल्यों को कमजोर करेगा, बल्कि इसका खमियाजा खुद हमें भी भुगतना पड़ेगा।

संकट के सामना साहस के साथ ही किया जा सकता है। साहस बचा रहेगा, तब मनुष्यता भी बचाई जा सकेगी। जबकि संकट में भय के हावी हो जाने के स्थिति में न केवल पराए कहे जाने वाले लोगों से विमुख हो जाते हैं, बल्कि अपने प्रियजनों और आखिर में खुद के प्रति भी संवेदनहीन हो जाते हैं। यह कहीं से भी हमारे इंसान होने का सूचक नहीं है। जबकि हमारा जन्म इंसान के रूप में होता है तब उसमें यह अपेक्षा घुली होती है कि हम वक्त के साथ इंसानी मूल्यों को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाएंगे।

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