ये लोग नौकरीपेशा हैं और चाहते हैं
सिवाय इश्क इन्हें और कोई काम न हो
अब्बास ताबिश की इन पंक्तियों से हरियाणा के नतीजों पर बात की शुरुआत का मकसद कांग्रेस व भाजपा की राजनीतिक शैली के अंतर को बताना है। हरियाणा में कांग्रेस की हार को अप्रत्याशित बताया जा रहा है क्योंकि चुनाव पूर्व के सारे जमीनी सर्वेक्षण जनता की भावना को भाजपा के खिलाफ बता रहे थे। भाजपा के अपने सर्वेक्षणों का भी यही मानना था। कांग्रेस ने इन सर्वेक्षणों के बाद सोच लिया कि अब सत्ता हासिल करने के सिवा उसे कोई काम ही नहीं है।
हुड्डा गुट ने तो अपनी समांतर सरकार भी बना ली थी
राहुल गांधी की मोहब्बत की दुकान वाली यानी ‘इंडिया’ गठबंधन को जारी रखने की सलाह को ठुकरा हुड्डा गुट ने तो अपनी समांतर सरकार भी बना ली थी। वहीं हार वाले सर्वेक्षणों को देखते ही भाजपा काम में जुट गई। हरियाणा में सर्वेक्षण पूरी तरह सही थे। हरियाणा में अगर कुछ अप्रत्याशित था तो वह भाजपा की मेहनत। हार को जीत बनाने वाली इस मेहनत पर बेबाक बोल।
हरियाणा के जरिए कांग्रेस ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह जीती बाजी को हारने में हुनरमंद हो गई है। वह एक ऐसी प्रयोगशाला की तरह हो गई है जहां परखनली में जीतने लायक सारे तत्त्वों का मिश्रण कर दिया जाए तो उत्पाद के रूप में भाजपा के लिए जीत निकल जाती है।
कांग्रेस की प्रयोगशाला में आखिर गलती कहां पर हुई?
हरियाणा में कांग्रेस की प्रयोगशाला में आखिर गलती कहां पर हुई? पहली गलती यही कि परखनली में सत्ता विरोधी रूझानों को देखते हुए कांग्रेस उसी ‘अभय मुद्रा’ में चली गई, जिसकी तस्वीर राहुल गांधी ने लोकसभा में कैमरों को चकमा दे दिखा ही दी थी। हरियाणा में कांग्रेस के रणनीतिकार मानो कह रहे थे कि अब भाजपा से डरो मत, जीत कांग्रेस की मुट्ठी में है। ‘अभय’ कांग्रेस को कोई इस बात का भय नहीं दिखा सका कि सामने खड़ी शक्ति की शैली को जरा परख लो।
इसी के बरक्स भाजपा ने ज्यों ही अपनी परखनली में सत्ता विरोधी रूझान देखा तो खतरे की घंटी बजा दी। त्वरित प्रभाव में हार से डर जाओ और हालात सुधारने में जुट जाओ का संदेश आलाकमान की ओर से था। दोनों दलों में अंतर यही रहा कि भाजपा प्रयोगशाला से निकले नतीजों को गंभीरता से लेकर स्थिति को सुधारने में जुट गई।
सबसे पहले तो क्रूरता से मनोहरलाल खट्टर को हटाकर उनकी जगह नायब सिंह सैनी को लाया गया। पार्टी अनुशासन के प्रचंड रूप खट्टर परिदृश्य से यूं गायब हुए मानो कभी मुख्यमंत्री थे ही नहीं। जनता को याद भी नहीं रहा कि उसे खट्टर की छवि मनोहर नहीं लग रही थी। नायब सिंह सैनी तेजी से अपनी पहचान बनाने के लिए मैदान में जुट गए। खट्टर के विरोध की तस्वीरें सैनी के स्वागत की तस्वीरों के नीचे दब कर रह गईं। नायब सैनी की बातों का लब्बोलुआब यही था कि उन्होंने आते ही इतने काम कर दिए जो कांग्रेस दस साल में नहीं कर पाई। यानी खट्टर के भी साढ़े नौ साल वैसे ही खारिज जैसे वे खुद खारिज हुए।
भाजपा में जो भी असंतोष था वह सार्वजनिक मंच पर नहीं आ रहा था। पार्टी ने विरोध के स्वर को घरेलू स्तर पर ही संभाल लिया। भाजपा के इस अनुशासन के बरक्स कांग्रेस में हुड्डा गुट अपनी समांतर सरकार बना चुका था। हरियाणा की जनता में सीधा संदेश गया कि हुड्डा गुट पर आलाकमान का कोई नियंत्रण नहीं है। कांग्रेस का कद्दावर चेहरा रहीं कुमारी सैलजा कोप-भवन में चली गईं। सैलजा मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर इतनी मुखर हुईं, इतना असंतोष दिखाया कि जनता ने लगातार तीसरी बार भाजपा से ही संतोष कर लिया।
कांग्रेस के दरख्त में गुटबाजी दीमक की तरह लगी हुई है। कांग्रेस को दीमक से संक्रमित क्षेत्र की बार-बार पहचान कराई गई है। लेकिन, गुटबाजी की दीमक पर कीटनाशक छिड़कने के बजाय कांग्रेस तुष्टीकरण व अनदेखी की नमी से समस्या को और विकराल कर रही है।
हरियाणा में सबसे बड़ा सवाल है कि 36 बिरादरियों के नाम पर चुनाव में उतरा राज्य भाजपा को अब तक उसका सर्वश्रेष्ठ कैसे दे बैठा? जिसे रूठ कर बिखरा हुआ मान गया था वह भाजपा को लेकर ध्रुवीकृत क्यों हो गया?
इसका सबसे बड़ा कारण है, राहुल गांधी का जाति जनगणना के मुद्दे पर जनता का ध्रुवीकरण करने की कोशिश करना। जाति जनगणना सीधे-सीधे आरक्षण से जुड़ा मामला है और इसके साथ ही बात आई आरक्षण की सीमा को तोड़ने की। आरक्षण की सीमा एक संवैधानिक मसला है और कांग्रेस इस पर बिना पूरी समझ बनाए इसे लेकर मैदान में कूद गई।
जाति जनगणना जैसे अति संवेदनशील और उलझाऊ मुद्दे पर भाजपा चुप रही। उसने न तो खुल कर जाति गणना को नकारा और न स्वीकारा। इसके समांतर भाजपा सूबे में एक-एक जाति की गणना कर रही थी कि कौन हमसे नाराज है और सारा अहंकार छोड़ घर-घर जाकर मान-मनौव्वल की कोशिश कर रही थी। खास जाति समूह का नेता चाहे वह दस लोगों को ही प्रभावित करता हो उससे कह रही थी, भूल-चूक माफ करो।
जमीन पर यह देश जितना भी जातियों में बंटा हो। सैद्धांतिक तौर पर जनता राष्ट्रीय नेता से जात-पात के खिलाफ ही सुनना चाहती है। राहुल गांधी जैसे मशीनी तरीके से पत्रकारों से लेकर अधिकारियों की जाति तक पूछने लगे थे उससे लोगों में ऊब हो रही थी। खास बात यह है कि इसे लेकर राहुल गांधी भी खुद सहज नहीं दिखते थे। साफ लग रहा था कि यह रणनीति उन पर थोपी गई है। राहुल गांधी ने हर जगह इतना ‘ओबीसी-ओबीसी’ किया कि जनता ने ही अपनी ओर से जाति-गणना कर ली कि भाजपा कितने ओबीसी नेताओं को भाव दे रही है। जनता की यह जाति-गणना भाजपा के पक्ष में ही गई। वहीं लोकसभा में भाजपा से थोड़ा छिटका सवर्ण तबका जाति-जाति की बात सुन कर अपने जातिगत भाव के साथ भाजपा से ही जुड़ गया। खास कर शहरी इलाकों में युवाओं का एक बड़ा तबका जाति जनगणना के मुद्दे से नाराज हो उठा। उसे लगता है कि उसकी रोजी-रोटी की जरूरतों को जाति की गिनती नहीं पूरा कर सकती।
इसके साथ ही कांग्रेस समर्थकों का एक बड़ा तबका जिसने नब्बे के दशक के बाद जाति की पहचान से मुक्त होने की कोशिश की थी वह सबसे ज्यादा परेशान हो उठा। जाति जनगणना को मुख्य मुद्दा बना दिए जाने से वे भी भाजपा की ओर आकर्षित हुए। जाति जनगणना पर भाजपा की चुप्पी का फायदा उसे वोटों की गणना में मिला।
उत्तर प्रदेश में रार और हार के बाद पार्टी और संगठन दोनों ने सबक ले लिया। कहते हैं, ‘पूत कपूत सुने हैं, जग में माता सुनी न कुमाता।’ सारी टकराहटों को भुला कर हरियाणा में भाजपा के लिए संघ ने फिर मातृ-संस्था की तरह काम करते हुए उस पर ममत्व लुटाया। संघ के सह-सरकार्यवाह अरुण कुमार ने भाजपा से असंतुष्ट सूबे की संघ के कार्यकर्ताओं से ऐसी घेरेबंदी की कि सत्तारूढ़ पार्टी से 36 का आंकड़ा दिखाने वाली सभी 36 बिरादरी भाजपा के संग आ गई। अरुण कुमार ने जाट हृदयस्थली को भी भाजपा के पक्ष में हृदय परिवर्तन करने के लिए मजबूर कर दिया। संघ किसानों को यह समझाने में कामयाब हुआ कि कांग्रेस के साथ जाने में उनके किसी भी तरह के हित नहीं सधेंगे।
किसान, जवान और पहलवान नाराज बताए जा रहे थे। नरेंद्र मोदी के चेहरे को भी केंद्र में नहीं रखा गया। जमीनी हालात खिलाफ थे। इन सबका भावार्थ यही है कि भाजपा यह चुनाव जीती नहीं है। उसने कांग्रेस के ‘पंजे’ से जीत को छीना है। कांग्रेस ने वही किया जो उसका बुनियादी स्वभाव है। जीत को अपनी मान उसने जीतने का मिजाज ही नहीं दिखाया। वहीं हार के हर निशान से परेशान भाजपा ने जीतने में जान लगा दी।
2014 के बाद भाजपा की एक शैली रही है कि उसने क्षेत्रीय क्षत्रप की अवधारणा को पूरी तरह नकारा है। इसके उलट उसने दोहरे इंजन की अवधारणा बनाई। मुख्य इंजन तो आलाकमान और केंद्रीय चेहरा ही। क्षेत्र में गाड़ी बेपटरी होते दिखते ही भाजपा इंजन बदलने में देर नहीं करती है। इसी रणनीति का फायदा हुआ कि कांग्रेस के निशान की ओर जाती हुई जनता की गाड़ी भाजपा के खेमे में पहुंच गई। कांग्रेस में क्षेत्रीय क्षत्रप यानी हुड्डा गुट इतना हावी था कि उसने राहुल गांधी की इस सलाह को भी नहीं माना कि हालात को देखते हुए हरियाणा में ‘इंडिया’ गठबंधन को जारी रखना चाहिए। हुड्डा गुट के अहंकार ने आम आदमी पार्टी के साथ अन्य छोटे खिलाड़ियों को भी नाराज कर दिया।
हरियाणा का नतीजा पार्टी सर्वेक्षण, या किसी अन्य अनुमान एजंसियों की नाकामी के तौर पर भी देखा जा रहा है। असल में यह नतीजा सर्वेक्षणों की नाकामी नहीं है। भाजपा ने इन्हीं सर्वेक्षणों को अपने लिए काम का बनाया। यह भाजपा की कामयाबी है कि मरीज की हालत खराब है वाली रपट को, अब आप पूरी तरह स्वस्थ हैं, घर जा सकते हैं वाली रपट बनाने में कामयाब हुई।
