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बेबाक बोलः दुर्योधन का द्वंद्व

पौराणिक आख्यानों के स्याह चरित्रों ने इतिहास और संस्कृति को अपनी तरह से प्रभावित किया है। महाभारत की विशेषता है कि इसमें खलनायक के खांचे में खड़े व्यक्ति को भी इतना जटिल रूप दिया गया है कि हम उसमें नायकत्व खोजने लगते हैं। दुर्योधन जैसे खलनायक में भी वीरता और दोस्ती के लिए किसी भी हद तक जाने के गुण दर्शाए गए हैं। दुर्योधन का किरदार मुखर होकर दावा करता है कि वह राजा का बेटा के राजा होने के कुदरती अधिकार के लिए लड़ रहा है। दुर्योधन का अंत छल से होने के साथ ही उसके नायकत्व की ऐसी शुरुआत होती है कि कई विमर्शों में उसके नाम को सुयोधन कहने की सिफारिश होती है। कृष्ण के इशारे पर भीम द्वारा छल से मारा गया दुर्योधन एक ऐसी सहानुभूति बटोर ले जाता है कि आज भी हम सब उसी के होने जैसा तर्क ढूंढने लगते हैं। बेबाक बोल में दुर्योधन के द्वंद्व पर बात।

बेबाक बोलः अभि हूं मैं

आज के समय में महाभारत के किरदारों से संवाद करते हुए जब हम अभिमन्यु से टकराते हैं तो उसकी हत्या हमें उद्वेलित करती है। अभिमन्यु के छोटे किरदार के पास इतिहास का बड़ा सबक है। सत्यवती ने उस संतति के उत्तराधिकार की मांग की जो इस दुनिया में आई ही नहीं थी। इस एक मांग से पूरा भरत वंश राष्ट्र के बजाय संतति और उत्तरदायित्व के बजाय उत्तराधिकार के युद्ध में उलझा रहा। शांतनु और सत्यवती के वर्तमान को सुखद बनाने के लिए ली गई भीष्म प्रतिज्ञा ने इतिहास को ऐसे कुरूप मोड़ पर ले जाकर खड़ा किया कि अभिमन्यु जैसा ओजस्वी युवा भरत वंश के श्रेष्ठों और कुलगुरुओं की कुनीति के चक्रव्यूह में मारा गया। समय के चक्र में आज भी अभिमन्यु की आवाज गूंज रही है कि मां के गर्भ में विद्या सीखी जा सकती है कुनीति और छल नहीं। बेबाक बोल में अभिमन्यु।

बेबाक बोलः नायकार्जुन

अर्जुन महाभारत के आधिकारिक नायक हैं। कृष्ण गीता का उपदेश देने के लिए उन्हें ही चुनते हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन की मनुष्यता, देवता से टकराती है। देवता उनके मनुष्य रूप की कमियों, सीमाओं, संभावनाओं को जगाते हैं ताकि धर्म की रक्षा हो सके। महाभारत को धर्मयुद्ध की तरह देखा जा रहा था तो अर्जुन धर्म की रक्षा के लिए हाथ जोड़ कर सारी बात मानने के बजाए हथियार रख कर प्रतिरोध भी करते हैं। अपनी तरफ से वो हमेशा धर्म की ओर खड़े होते हैं। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर पौराणिक इतिहास के उन चुनिंदा नायकों में हैं जिसने पुरुषत्व के साथ नपुंसकत्व की भी भूमिका चुनी, जहां वे नृत्य कला और साहित्य के मर्मज्ञ के रूप में मनुष्यता का कोमल और सबल पक्ष रखते हैं। सत्ता की ताकत के साथ धैर्य और विवेक को धारण करने वाले ही नायक का दर्जा पाते हैं। बेबाक बोल में अर्जुन।

बेबाक बोलः प्रण और रण

महाभारत काल के समाज में कई तरह के प्रयोग हो रहे थे। इन्हीं प्रयोगों का परिणाम है द्रौपदी का असाधारण किरदार। पौरांिंणक आख्यानों में जन्म के स्वरूप का अपना महत्व है जो व्यक्ति का ध्येय भी तय करता है। याज्ञसेनी यानी हवन कुंड से पैदा हुई द्रौपदी का जीवन, प्राण लेने के प्रण और उसके लिए हुए रण में बीत जाता है। जातिवादी और कुलवादी अभिमान के संवाद बोलते हुए अस्मिता के अतिरेक पर पहुंची द्रौपदी सामंती न्याय का प्रतीक बन जाती है। जीवन-हरण जैसा तुरंता न्याय ही उसके मान को तुष्ट करता है। नए भारत के लिए महाभारत में द्रौपदी के किरदार का प्रयोग समाज में आदर्श नहीं बन सका। मानव कल्याण के ऊपर निजी प्रतिशोध का आख्यान होने के कारण आज भी आम धार्मिक घरों में न तो रखी जाती है महाभारत और न कन्याओं को दिया जाता है द्रौपदी का नाम। बेबाक बोल में महाभारत की एक और किरदार।

बेबाक बोलः कोरोना में कर्ण

आज जो सबसे बड़ा संकट मनुष्यता के सामने खड़ा है वह है पहचान का संकट। इस खंडित दौर में खुद को पहचानने का संकट। महाभारत के रचयिता ने कर्ण के जरिए एक नायक गढ़ने की कोशिश की लेकिन एक झूठ के साथ उसे पहचान के चक्रव्यूह में घेर दिया। कोरोना के इस काल में विराट मनुष्य की अपार शक्ति का अहसास भी जब महाशक्तियों को हिला दे तब एक विषाणु के तेज विस्तार के आगे खुद को पहचानने का संकट सहज है। कर्ण उसी संकट से ग्रसित एक विराट चरित्र है जो बजरिए दूरदर्शन एक बार फिर खलनायक के खांचे में खड़ा किया जा रहा है द्रौपदी को वेश्या कहने के कारण, वो भी तब जब छोटे परदे पर राजकुल का हर किरदार उसे उसकी जाति के लिए अपमानित कर रहा हो। स्त्री का ऊंचा कुल एक नायक के नीचे कुल पर भारी पड़ता है। कोरोना काल में पुनर्पाठ के क्रम में कर्ण के किरदार पर एक नजर।

बेबाक बोलः संक्रमण काल

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में कोरोना विषाणु ने दुनिया के नियम बदल दिए। हमारे यहां दंतकथा की तरह सुनाया जाता था कि विदेशों में इधर-उधर थूकने पर जुर्माना लगता है। कोरोना का खौफ है कि विदेश का यह मिथक भारत में सच साबित हो गया है और अब इधर-उधर थूकना अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है। घर से बाहर निकलने के लिए मुंह को ढकना अनिवार्य शर्त है। कोरोना के बाद का पाठ है कि जो जितना सीमित है वो उतना स्वस्थ है। मजबूत तबका अपना दायरा सीमित कर लेगा। वर्गीय भेद की नई परिभाषा यह होगी कि कौन घर से निकले बिना आराम से अपनी जरूरतें पूरी कर ले रहा है। बाहर निकलना गरीबों की मजबूरी होगी। कोरोना ने घर और बाहर के शक्ति समीकरण को जिस तरह बदला है, उस सिकुड़ी और सहमी हुई दुनिया पर बेबाक बोल।

बेबाक बोलः कुनैन कथा

कोरोना विषाणु ने जब दवा और दुुआ दोनों को अशक्त साबित कर दिया, धर्म और विज्ञान के पास भी सामाजिक अलगाव के सिवाय कोई हल नहीं था तब भी अमेरिका को यही चिंता थी कि उसके मुनाफे में कोई कमी नहीं आए और वैश्विक संबंधों पर उसकी धौंस कायम रहे। पहले तो कोरोना विषाणु के संक्रमण पर घोर लापरवाही बरती और बाद में हालात बेकाबू हो जाने के बाद दूसरे देशों के वेंटिलेटर से लेकर मास्क तक पर कब्जे की बदनीयती दिखाई। मलेरिया की दवा पर भारत के दोस्ताने रुख के बावजूद अमेरिका के अगुआ ने पहले जिस आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया, वह नई नहीं है। कोरोना पर ट्रंप की भाषा से लगता है कि मानो अमेरिका को बचाने की जिम्मेदारी पूरी दुनिया की है। एकध्रुवीय वैश्विक संबंध पर एक बार फिर सवाल उठाता बेबाक बोल।

बेबाक बोलः कुछ को’रोना

कुछ समय पहले एक समाचार प्रस्तोता ने आंखों के आंसू पर काबू पाते हुए अपने पति की मौत की खबर पढ़ी और हम सब उसके जज्बे को सलाम करते हुए रो पड़े थे। काम और कर्तव्य सबसे पहले और आपदा की हालत में घर से बाहर निकल सरफरोशी की तमन्ना रखने वाले लोगों के जीवनमूल्य को अचानक से एक विषाणु बदल देता है। ‘शो मस्ट गो आॅन’ का संवाद थम जाओ के सन्नाटे में खामोश है। डॉक्टरों, विमान कर्मचारियों से लेकर सफाई कर्मचारियों तक को उनके पड़ोसी घृणा की नजर से देख रहे क्योंकि वो जरूरी सेवाओं के दायरे में बीमारी से लड़ने के लिए घर से बाहर निकल रहे हैं। कामगार राजमार्ग से पैदल दूर अपने गांव लौट रहे क्योंकि मौत के खौफ में जी रहे शहर को उनकी जरूरत नहीं। कोरोना के कहर की कड़ी तोड़ने के लिए बंद किए बाजार में मांग और आपूर्ति की कड़ी टूटने से आगे क्या हालात हो सकते हैं? मौत के खौफ में ठहरी जिंदगी के द्वंद्व को उकेरता बेबाक बोल।

बेबाक बोलः संकल्प सिद्धि

न कहीं गोली चली न कहीं विस्फोट हुआ और अनुच्छेद 370 को इतिहास बना दिया गया। यह काम वहीं से हुआ जहां से होना चाहिए था, और वह है संसद। जनता के प्रतिनिधियों ने मिलकर पूरे देश को जश्न के माहौल में डुबो दिया। किसी के लिए होली थी, किसी के लिए दिवाली, किसी के लिए गुरुपर्व तो किसी के लिए ईद।