राजनीतिक नजरिए से अगर गए साल को देखा जाए, तो क्या दिखता है? मैंने अपने आप से जब यह सवाल पूछा, तो राहुल गांधी का चेहरा सामने आया इसलिए कि 2025 में उन्होंने साबित करके दिखाया कि नेता प्रतिपक्ष की भूमिका उनसे संभाली नहीं जा रही है। इस पद को संभालने का अवसर उनको मिला मुश्किल से। दो लोकसभा चुनावों में उनके नेतृत्व में कांग्रेस को इतनी कम सीटें मिलीं कि नेता प्रतिपक्ष बनने का अधिकार नहीं मिल सका उन्हें। तीसरे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कम से कम इतनी सीटें दिलवाईं कि इस पद को हासिल कर सके, लेकिन नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद उन्होंने पूरी तरह साबित किया कि नरेंद्र मोदी को हराना उनके बस की बात नहीं है।

हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में चुनाव हुए हैं लोकसभा चुनाव के बाद और इन चुनावों में जीत हुई है भारतीय जनता पार्टी की। नतीजा यह कि गए साल के अंतिम दिनों में दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा यही रही कि जब तक नरेंद्र मोदी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी रहेंगे, तब तक मोदी को हराना मुश्किल नहीं, नामुमकिन है। चर्चा यह भी होने लगी कि कांग्रेस अगर अपना अस्तित्व गंवाना नहीं चाहती है, तो राहुल की जगह प्रियंका को देनी चाहिए, लेकिन यह असंभव है, क्योंकि सोनिया गांधी ऐसा होने नहीं देंगी।

आंकड़ों में कहानी: पीएम मोदी या राहुल गांधी… 2025 में ज्यादा विदेश यात्राएं किसने की?

सवाल यह है कि राहुल गांधी इतने कमजोर नेता प्रतिपक्ष क्यों हैं? इसका जवाब है कि इतने चुनावों को हारने के बाद भी उन्होंने कभी ईमानदारी से हारने के कारणों को जानने की कोशिश नहीं की है। इसके बदले उन्होंने दोष डाला है चुनाव आयोग पर। पहले तो ईवीएम में ‘गड़बड़’ होने का आरोप लगाया, यह भूल कर कि जब कांग्रेस जीतती है, तो आरोप लगाना भूल जाते हैं। फिर शिकायत थी उनको एसआइआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) से। ‘वोट चोरी’ का नारा उठाया। कहने लगे कि हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस की जीत तय थी, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव आयोग की सहायता से जीत चुराई। बिहार की बारी जब आई 2025 के आखिरी महीनों में, तो मतदान से पहले ही हल्ला मचाने लगे कि वोट चोरी होने वाली है। यात्रा निकाली इस मुद्दे को लेकर और हर आमसभा में लोगों से ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ का नारा बुलंद करवाते रहे। ऐसा करने के बाद निकल गए एक बार फिर किसी विदेश यात्रा पर।

मैंने उनकी 2025 में विदेशी यात्राओं का जब हिसाब लगाया, तो मालूम यह हुआ। वर्ष के शुरू होते ही निकल गए थे वियतनाम, फिर दुबई और कतर गए, उसके बाद मलेशिया, फिर दक्षिण अमेरिका गए जहां ब्राजील, कोलंबिया, पेरू और चिली में दिखे। साल के अंतिम दिनों में जर्मनी की यात्रा की। जहां गए वहां अक्सर उनकी मुलाकातें हुईं प्रवासी भारतीयों से जिनको उन्होंने बताया कि भारत में लोकतंत्र तकरीबन समाप्त कर दिया है नरेंद्र मोदी ने। हर भाषण में कहा कि भारत में सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को बर्बाद किया है मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने। सवाल यह है कि जब देश का इतना बुरा हाल है, तो नेता प्रतिपक्ष को विदेश में घूमना चाहिए या देश में रह कर समाधान ढूंढ़ने चाहिए?

क्या सचमुच राहुल गांधी अहम चुनावों से पहले चले जाते हैं विदेश?

देश की समस्या यह है कि जब तक मजबूत विपक्ष नहीं होता है, तब तक लोकतंत्र वास्तव में खतरे में रहता है। बिहार जीतने के बाद नरेंद्र मोदी में वही पुरानी ऊर्जा दिखने लगी है जो लोकसभा चुनावों के बाद काफी महीनों तक नहीं दिखी थी, क्योंकि पहली बार प्रधानमंत्री बने थे बिना पूर्ण बहुमत हासिल किए। अब फिर से अपनी उपलब्धियां गिनवाने लगे हैं जैसे कि भारत को विकसित करवाने का पूरा श्रेय उनको निजी तौर पर मिलना चाहिए। ऐसा शायद ही कोई दिन गुजरता है जब अखबारों में उनकी तस्वीरें न दिखती हों और टीवी पर उनका कोई भाषण सुनने को न मिलता हो।

ऐसा नहीं है कि भारत वास्तव में विकसित होने का सपना साकार करने वाला है। सड़कें, हवाईअड्डे, और बंदरगाह बेशक तीव्र गति से बनते हैं मोदी के राज में, लेकिन बेरोजगारी का काला साया नौजवानों के जीवन पर अभी भी मंडरा रहा है। पर्यावरण की समस्याएं इतनी गंभीर हो गई हैं कि शहरों में सांस लेना मुश्किल हो गया है। अरावली पहाड़ियों को बर्बाद करने की साजिश अगर फिलहाल रुक गई है, तो सिर्फ इसलिए कि ‘गोदी मीडिया’ वालों ने भी इतना हल्ला मचाया कि सर्वोच्च न्यायालय को अपना फैसला बदलना पड़ा है।

देहातों में गरीबी की समस्या इतनी गंभीर अभी भी है कि राजनीतिक पंडित मानते हैं कि बिहार में अगर महिलाओं को दस हजार रुपए देने की योजना न बनी होती ऐन चुनावों से पहले, तो शायद भारतीय जनता पार्टी और नीतीश कुमार की जीत नहीं होती। महिलाओं में चुनावों से पहले पैसे बांटने की योजनाएं बनी हैं मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों के बाद और इस में कोई शक नहीं है कि इस ‘चुनावी घूस’ की वजह से चुनावों की हवा बदलती है, लेकिन इस मुद्दे को कांग्रेस पार्टी उठा नहीं सकती है इसलिए कि राहुल गांधी ने बार-बार वादा किया है कि उनकी सरकार बनने के बाद महिलाओं के बैंक खातों में कई हजार रुपए आने वाले हैं ‘खटाखट-खटाखट’।

सरकार राहुलजी तब बनेगी, जब आप चुनाव जीत कर दिखाएंगे। चुनाव कैसे जीतेंगे जब आपका ध्यान विदेशों में घूमने पर ज्यादा रहता है। इन यात्राओं को लेकर 2025 के आखिरी दिनों में मजाक हो रहा था सोशल मीडिया पर कि इस साल नेता प्रतिपक्ष भारत आए हैं पांच बार। सुनने में आया है कि इन दिनों राहुल गांधी एक बार फिर वियतनाम जाने की तैयारी में लगे हुए हैं!