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द लास्‍ट कोच: अति सुधो सनेह को मारग है

मैं प्लेटफार्म नंबर तीन के अंतिम छोर पर पहुंच गया हूं। यहां एक युगल ने बरबस ध्यान खींच लिया है। वे इस तरह सट कर खड़े हैं जैसे कोई दो फूल एक दूसरे से गुंथे हों। युवक के सीने में दुबकी घुंघराले बालों वाली इस लड़की का चेहरा नहीं दिख रहा। नाक तक झुक आए युवक के चश्मे को सरकाते हुए उसने जैसे कुछ कहा है उससे। तभी उसके ललाट को मित्र ने चूम लिया है।

चौपालः अपने-अपने महापुरुष

आखिर महापुरुष कैसे किसी एक के हो सकते हैं या नहीं हो सकते हैं? चाहे नेहरू हों या और कोई नेता, अगर देश के प्रति उनका योगदान है तो क्यों न उनके प्रति कृतज्ञ हुआ जाए?

संपादकीयः प्रशिक्षण के बजाय

शिक्षा की गुणवत्ता में बेहतरी के लिए शिक्षकों को समय-समय पर नए प्रयोगों से परिचित कराना या प्रशिक्षण देना शिक्षा-पद्धति का एक जरूरी हिस्सा है।

दुनिया मेर आगेः किसका कौन

उनका फोन अक्सर आता रहता है। रिटायरमेंट के बाद मुंबई में वे घर पर अकेले रहते हैं। पत्नी का देहांत कई वर्ष पहले हो गया था। एक बेटा अमेरिका में और दूसरा दुबई में अपने-अपने परिवार के साथ मगन हैं।

संपादकीयः रोजगार का आधार

पूंजीगत सामान की खपत को अमूमन नए निवेश का सूचक माना जाता है। राजग सरकार के दो साल में कई बार औद्योगिक उत्पादन में ठहराव के आंकड़े आए, वही हाल पूंजीगत सामान की खपत का भी रहा।

दुनिया मेरे आगेः असल जीवन का अक्स

अपने स्कूली जीवन के दौरान देखी हुई एक फिल्म याद आती है जिसमें अभिनेत्री रेखा पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं और अपराधियों से लोहा लेती हैं।

राजनीतिः आसान नहीं शराबबंदी की राह

परिवार की आमदनी बढ़ने पर दूध की खपत बढ़ जाती थी, लेकिन आज आमदनी बढ़ने के साथ शराब की खपत बढ़ रही है। इसके लिए किसी एक कारण को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। जैसा सामाजिक बदलाव आया है उसमें शराब को पहले जितना बुरा नहीं माना जाता। फिर, शराब की दुकानें सरकारों के लिए कमाऊ पूत बन चुकी हैं।

चौपालः संभावना के शत्रु

एक बच्चे में न जाने कितनी संभावनाएं होती हैं पर हमारा समाज धीरे-धीरे उन संभावनाओं को खत्म कर देता है। उसे एक वस्तु की तरह पहले से तय नियम-कायदे के अनुरूप जीने को मजबूर कर देता है।

दुनिया मेरे आगेः सफर की दिशा

आज भी भारत के अतीत को याद करते हुए सबसे ज्यादा मानवीय मूल्यों और चरित्र का ही संदर्भ आता है। ऐसी बातें भी आमतौर पर सुनी जा सकती हैं कि जब धन गया तो कुछ नहीं गया, जब सेहत गई तो बहुत कुछ गया और जब चरित्र गया तो सब कुछ गया।

राजनीतिः बोतलबंद पानी का विकल्प

बोतलबंद पानी प्लास्टिक कचरे के रूप में पर्यावरण को और पेयजल के रूप में व्यक्ति के स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है। ऐसे में एक अहम सवाल यह उठता है कि सरकार अगर बोतलबंद पानी पर प्रतिबंध लगा देती है तो क्या उसके स्थान पर सरकार के पास कोई हर तरह से सुरक्षित विकल्प है? बिल्कुल है और कहीं बेहतर विकल्प है।

संपादकीयः कोचिंग का इलाज

किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थानों की भूमिका आज किसी से छिपी नहीं है। आज हालत यह है कि शिक्षा जगत के दायरे में इसे कोचिंग उद्योग के नाम से जाना जाने लगा है।

चौपालः प्लेटफार्म की बोली

पिछले दिनों मैं रेलगाड़ी में आरा से बनारस आ रही थी। मेरे पास टिकट तो था पर आरक्षण नहीं था। जबकि इस तरह आज कोई यात्रा नहीं करना चाहता, मैं भी नहीं।

राजनीतिः क्यों गुम होते हैं बच्चे

पुलिस का यह मानना रहता है कि कमजोर तबकों के गायब हुए बच्चे या तो कहीं भाग गए हैं या भटक गए हैं और कुछ समय बाद खुद लौट आएंगे। पर हकीकत कुछ और है, क्योंकि विभिन्न शोध, मानवाधिकार आयोग और गैर-सरकारी संगठनों के अध्ययन बताते हैं कि लापता हुए ज्यादातर मासूम तस्करी के शिकार हो जाते हैं।

दुनिया मेरे आगेः ज्ञान और पढ़ाई

मनुष्य होने का एक सबसे प्रतीकात्मक लक्षण चिंतनशील होना है। बाकी तो जीवन, भूख, आत्मा, काम और कर्म पशुओं में भी होते हैं। चिंतनशील होना कर्म की गुणवत्ता और उसकी दिशा पर आत्मविश्लेषण करने का एक रास्ता है।

राजनीतिः फैसले का संदेश

कीनन सैंटोस और रूबेन फर्नांडीज की हत्या के चर्चित मामले में मुंबई के सत्र न्यायालय के फैसले ने एक न्यायिक तकाजे को तो पूरा किया ही है, समाज को एक जरूरी संदेश भी दिया है।

राजनीतिः सम-विषम का दम

दिल्ली में आॅड-ईवन यानी सम-विषम के दूसरे चरण के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसकी सफलता के लिए यहां के नागरिकों को धन्यवाद जरूर दिया, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि यह योजना वायु प्रदूषण का कोई दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकती।

राजनीतिः हाशिये पर जाते सरकारी स्कूल

सरकारी स्कूल में अपने बच्चे को भेजने से अभिभावक को लगता है कि वह अपने बच्चे को एक उपेक्षित जगह पर भेज रहा है। अगर आर्थिक सामर्थ्य हो तो वह अपने बच्चे को कहीं और पढ़ाए। पहले ऐसी धारणा नहीं थी। क्या सरकारी स्कूलों के प्रति अभिभावकों का यह नजरिया निराधार है, या इसके पीछे
कुछ गहरे तथ्य भी हैं?

राजपाठः पैंतरा नीकू का

एक पुरानी देहाती कहावत है कि नाराजगी के बावजूद डरने वाले कुम्हार की अपनी पत्नी पर तो कोई पार बरसी नहीं पर उसने गधे के कान जरूर ऐंठ दिए।