‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा मिलिया सब कोय
जो ‘दल’ खोजा आपना अब बुरा न लगे कोय’

लिखने की रस्म कह रही कि आगे लिखा जाए, कबीरदास से माफी मांगते हुए। पर आज के दौर में कबीरदास होते तो शायद वे ऐसा ही कुछ लिखते। सत्ता पक्ष आंखों में छवि विस्तारक यंत्र लगा कर विपक्ष में जो दुर्गुण खोजता रहता था, धीरे-धीरे उसे वही अच्छा लगने लगा। बिहार के नए मंत्रिमंडल में दीपक प्रकाश शपथ लेते हैं। दीपक प्रकाश ने चुनाव नहीं लड़ा था, न ही उन्हें कोई राजनीतिक अनुभव है। लेकिन रालोमा की वोटों की विरासत उन्हें ही सौंपी गई क्योंकि वे उपेंद्रनाथ कुशवाहा के पुत्र हैं। पूरा देश बिहार की महिला मतदाताओं के सामने नतमस्तक है, लेकिन नई सरकार में किसी महिला को उपमुख्यमंत्री का पद तो छोड़िए, मंत्रिमंडल में उनकी कुल हिस्सेदारी ही दस फीसद है। अगर महिला वोट इतने निर्णायक रहे तो मंत्रिमंडल में 90 फीसद पुरुष क्यों? बिहार विधानसभा चुनाव में जो विमर्श खड़े हुए, उनके विरोधाभासी मंत्रिमंडल पर बेबाक बोल

सत्ता पक्ष ने भ्रष्टाचार और परिवारवाद को चुनावी मुद्दा बनाए रखा। कहते हैं कि आप दूसरे में किसी खास चीज को बहुत ज्यादा खोजते हैं, तो धीरे-धीरे वह आपको अच्छी लगने लगती है। तेजस्वी यादव की शिक्षा पर हमला करने वालों को अब सम्राट चौधरी की शिक्षा से कोई शिकायत नहीं है। 2025 के विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान तत्कालीन उपमुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार, और शैक्षणिक योग्यता को लेकर कई आरोप लगे। इन आरोपों को सामने लाने वाले थे जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर।

तब भाजपा के नेता आरके सिंह ने कहा था कि ये आरोप भाजपा की छवि खराब कर रहे हैं। जद (एकी) ने भी कहा था कि इन आरोपों पर स्पष्टीकरण आना चाहिए। फिलहाल आरके सिंह सत्ता पक्ष का हिस्सा नहीं हैं। प्रशांत किशोर ने आरोप लगाए थे कि 2010 के हलफनामे में सम्राट चौधरी ने खुद को सातवीं पास बताया था तो 2025 के हलफनामे में डी.लिट का दावा कर दिया। प्रशांत किशोर ने चुनाव आयोग से मांग की थी कि सम्राट चौधरी से दसवीं कक्षा का प्रमाणपत्र मांगा जाए।

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भारत का संविधान चुनाव लड़ने के लिए किसी भी शैक्षणिक योग्यता की मांग नहीं करता है। फिर चुनावी हलफनामों में शैक्षणिक योग्यता को लेकर विरोधाभास क्यों? जाहिर सी बात है कि सम्राट चौधरी पर किसी भी मामले में अदालतों में आरोप साबित नहीं हुए हैं। लेकिन डिग्री मामले में सार्वजनिक मंचों पर उन्होंने जिस तरह के बयान दिए, उससे लग रहा था कि उन्होंने शिक्षा का प्रमाणपत्र हासिल करने के दौरान शिक्षित होने पर खास ध्यान नहीं दिया था।

खास कर आरोपों का जवाब देने में वे मैकाले वाली औपनिवेशिक भाषा यानी अंग्रेजी के शब्दों के उच्चारण को इस तरह धता बता रहे थे कि अब सत्ता पक्ष दलील दे सकता है कि सम्राट चौधरी औपनिवेशिक मानसिकता के गुलाम नहीं हैं, जो सामान्य से अंग्रेजी शब्दों का सही उच्चारण कर दें। उनके अंदर राष्ट्रवादी भावना इतनी कूट-कूट कर भरी है कि वे ‘पीएफसी’ (अंदाजा ही लगाया जा सकता है प्री फाउंडेशन कोर्स) को भी समझाने में नाकाम रहे थे। और कितना राष्ट्रवाद चाहिए, बिहार के लोगों को?

उस वक्त अंदाजा लगाया जा रहा था कि इतने आरोपों के बाद और सार्वजनिक मंच पर शैक्षणिक स्तर का प्रदर्शन होने के बाद शायद भाजपा में सम्राट चौधरी की राह मुश्किल हो जाएगी। लेकिन बीच चुनाव में ही उन्हें ‘बड़ा आदमी’ बनाने का एलान कर दिया गया। भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद विपक्ष पर आरोपित एक और चीज सत्ता पक्ष को बहुत भाने लगी। वह है परिवारवाद। सत्ता पक्ष देश-विदेश से लेकर पूरे ब्रह्मांड को यह समझाने में सफल हो गया है कि भारतीय राजनीति में परिवारवाद राहुल गांधी से शुरू होता है और राहुल गांधी पर खत्म हो जाता है। सम्राट चौधरी, चिराग पासवान, इनका परिवारवाद राजनीति को अत्यंत उज्ज्वल कर रहा है।

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अब परिवारवाद इतना अच्छा है कि पद देने के लिए चुनाव लड़ने की जरूरत भी नहीं है। राजग का मानना है कि पिता की जाति का वोट उसके पुत्र को ही हस्तांतरित होगा, इसलिए राजनेता के बेटे को बिना चुनाव लड़े भी मंत्रिपद दे देना चाहिए। बिहार की नई विधानसभा के ऐसे ही मंत्री हैं दीपक प्रकाश। उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक कुशवाहा को लव-कुश वोट यानी ओबीसी कुर्मी व कुशवाहा की आबादी को आकर्षित करने के लिए रखा गया है।

देश में सिर्फ चार जातियां बताने वाला सत्ता पक्ष अब जाति जनगणना में इतना निपुण हो गया है कि जिस नेता ने विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा, उसे भी पिता और जाति के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया गया। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोमा ने विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया। रालोमा को छह सीटें मिली थीं और उसने चार पर जीत दर्ज की। लेकिन, जब रालोमा के कोटे से मंत्रिपद की बात आई तो चुनाव लड़ कर जीतने वाले चार विधायकों में से किसी पर भी भरोसा नहीं किया गया। भरोसा किया गया, पार्टी संस्थापक के उस बेटे पर जो अब तक राजनीति में कहीं भी नहीं थे।

बिहार चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। यहां चुनाव के पहले विपक्ष की ओर से उपमुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार चेहरे का एलान किया गया, और चुनाव के बाद उस पुत्र को मंत्री बनाया गया, जो अचानक से अपने पिता की पार्टी के वोटों के वारिस के रूप में अवतरित हो गया।

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पूरे देश का जनसंचार माध्यम बिहार चुनाव में महिला मतदाताओं के महिमामंडन से भरा पड़ा है। विश्लेषणों से आभास होता है कि बिहार की महिला मतदाताएं किसी ऐसे ग्रह में रहती हैं, जहां राजनीति में जाति-धर्म की कोई भूमिका नहीं होती है। ये महिलाएं सिर्फ विकास, सुशासन और खाते में दस हजार रुपए देखती हैं और आंखें मूंद कर नीतीश कुमार का समर्थन करती हैं। यानी, ये महिलाएं बिहार के पितृसत्तावादी माहौल से एकदम अलग हैं।
अफसोस इस बात का है कि इतनी प्रगतिशील सोच वाली महिलाओं के साथ भी पितृसत्तावादी रवैया ही अख्तियार किया गया है।

क्या महिला मतदाताओं के इतने अहम तबके को देखते हुए एक उपमुख्यमंत्री का पद किसी महिला को नहीं दिया जा सकता था? चलिए कैलिफोर्निया की डिग्री वाले सम्राट चौधरी को तो ‘बड़ा आदमी’ बनाने का एलान पहले ही कर दिया गया, तो वहां कोई समझौता नहीं हो सकता था। अभी भी बेचारे पिछली सत्ता की तरह बराबर में हैं, बड़े नहीं हुए हैं। लेकिन, दूसरी जोड़ी पर तो सोचा जा सकता था, जो मतदान के दिन अपनी ही सरकार के प्रशासन को निकम्मा और कायर बोल रहे थे। चुनाव उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी ने जीता, लेकिन मंत्रिपद उनके बेटे को दिया गया। जाहिर सी बात है इसमें वंशवाद नहीं होगा।

क्या बिहार की महिलाएं सवाल पूछेंगी कि सरकार उनसे बनी है तो नए मंत्रिमंडल में नब्बे फीसद पुरुष क्यों हैं? क्या महिलाओं की कोई जाति नहीं होती? क्या आरोपों के हिसाब से महिला मतदाता वाकई बस ‘दस हजारी’ हैं। आज के दौर में सवाल पूछने की सलाह देना अप्रासंगिक है।

‘चुनाव आयोग को बदनाम कर रहे राहुल गांधी’, जजों-रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स समेत 272 हस्तियों ने लिखा ओपन लेटर

अभी देश में ऐसी हस्तियों की कतार लग गई, जो राहुल गांधी से सवाल पूछ रही हैं कि उन्होंने चुनाव आयोग से सवाल क्यों पूछा। जिन सवालों का जवाब देने के लिए चुनाव आयोग को प्रेस कांफ्रेंस करने के लिए मजबूर होना पड़ा था, और उसके बाद आयोग पर नए सवाल उठ गए, उन पर नाराजगी कौन लोग दिखा रहे हैं? क्या आपको अब सत्ता से कुछ पाना शेष रह गया है? सवाल उठाना संवैधानिक अधिकार है। विपक्ष के संवैधानिक अधिकार पर चाहे जितने हमले कर लें, अब सत्ता के लिए आप जरा भी शेष नहीं हैं। सत्ता के लिए आप सिर्फ अवशेष हैं।

यह लोकतंत्र की फितरत है कि कोई मलबे से भी उठ कर धूल-धूसरित अवस्था में सवाल पूछ लेता है। इतिहास उनका होगा जो मलबे से सवाल पूछ रहा है, आप न शेष रहेंगे, न आपका अवशेष रहेगा। वैसे, आप जिंदा अवशेष बन चुके हैं। नहीं समझ आए तो भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के संरक्षित स्मारकों को देख आइए। इतिहास में घटा सब कुछ इतिहास नहीं बनता। मलबा और स्मारक का फर्क भी इतिहास ही तय करता है।