कोरोना वायरस की वजह से देश में जारी लॉकडाउन से वैसे तो हर किसी को परेशानी हो रही है लेकिन दिहाड़ी प्रवासी मजदूरों की जिंदगी बद से बी बदतर हो गई है। हालात ऐसे हैं कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रवासी मजदूरों को श्मसान घाट के पास फेंके गए सड़े-गले केले खाकर पेट भरना पड़ रहा है। एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के निगमबोध घाट पर यमुना किनारे फेंके गए सड़े केलों में दईजनभर प्रवासी मजदूर अपना निवाला ढूंढ़ रहे हैं और उनमें मिले कुछ आधे-अधूरे केलों से वो अपना पेट भरने को मजबूर हैं।
कंधे में एक बैग थामे शख्स ने कहा, “यह केला है। आमतौर पर यह सड़ता नहीं। अगर हम इनमें से कुछ छांट लेंगे तो हमारी भूख मिट जाएगी।” यूपी के अलीगढ़ से रोजी-रोटी कमाने दिल्ली आए एक शख्स ने कहा, “हमलोगों को रोजाना खाना नहीं मिल रहा है, इसलिए यहां केला चुनने चले आए हैं।” ऐसा नहीं है कि दिल्ली में सिर्फ निगमबोध घाट की ही ऐसी तस्वीर है। इसके अलावा मजनूं का टीला इलाके में भी यमुना किनारे प्रवासी मजदूरों की ऐसा ही कहानी है। वहां सड़क किनारे खुले में रहने को ये मजबूर हैं। लॉकडाउन के ऐलान के बाद लोग बड़े-बड़े शहरों से बड़ी संख्या में अपने गांव-कस्बों की तरफ पैदल ही निकल पड़े थे।
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देश भर के लाखों मजदूरों की तरह इनकी भी रोजी-रोटी लॉकडाउन में चौपट हो चुकी है। ये लोग अंतरराज्यीय बस अड्डे पर माल ढोने से लेकर नजदीक के बाजारों में दिहाड़ी मजदूरी करते थे लेकिन लॉकडाउन की वजह से बाजार, दुकानें, बस अड्डे सभी बंद पड़े हैं। ऐसे में इनके सामने भूख की समस्या खड़ी है। हालांकि, सरकार ने जगह-जगह इन मजदूरों के खाने-पीने के इंतजाम किए हैं लेकिन वो नाकाफी हैं।
एक शेल्टर होम के प्रभारी ने बताया कि निर्धारित संख्या से ज्यादा मजदूर शेल्टर होम में आ रहे हैं। इससे दिक्कतें आ रही हैं। बता दें कि लॉकडाउन का ऐलान होने के बाद बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने-अपने घरों को जाने के लिए दिल्ली से पैदल ही सड़कों के रास्ते निकल पड़े थे। यह सिलसिला तीन-चार दिनों तक चलता रहा। बाद में सरकार ने उन सभी को सरकारी स्कूलों में रोककर उनके खाने-पीने और रहने के इंतजाम किए मगर वो नाकाफी लग रहे हैं।
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