पिछले दो वर्षों में भारत में मोटापे (Obesity) के इलाज के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति देखने को मिली है। पहली बार ऐसे वज़न घटाने वाले प्रभावी इंजेक्शन और दवाएं बड़े पैमाने पर उपलब्ध हुई हैं, जिनसे लोगों को 15–20 फीसदी तक वजन कम करने में मदद मिली है। सेमाग्लूटाइड (Semaglutide) और हाल ही में आई टिरज़ेपाटाइड (Tirzepatide) जैसी दवाओं ने ऐसे नतीजे दिए हैं, जो पहले केवल बैरिएट्रिक सर्जरी से ही संभव माने जाते थे।
फोर्टिस सीडीओसी हॉस्पिटल फॉर डायबिटीज एंड एलाइड साइंसेज, नई दिल्ली के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. मिश्रा के मुताबिक वजन घटाने के लिए इन मैजिक पिल्स और इंजेक्शन का चलन तेजी से बढ़ा है। लोग बिना पसीना बहाए कई किलो वजन कम तो कर लेते हैं, लेकिन असली कहानी दवा बंद करने के बाद शुरू होती है। क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप इन दवाओं का सहारा लेना छोड़ देंगे, तो आपके मेटाबॉलिज्म और भूख का क्या होगा? रिसर्च बताती है कि अधिकतर मामलों में दवा छोड़ते ही वजन वापस उसी रफ्तार से लौटने लगता है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘वेट रिबाउंड’ (Weight Rebound) कहा जाता है। आज हम वैज्ञानिक रिसर्च के आधार पर डिकोड करेंगे कि वेट लॉस दवाएं छोड़ने के बाद आपके शरीर के अंदर असल में क्या बदलाव होता है।
मोटापा कम करने वाली दवाओं का असर
मोटापा एक क्रॉनिक यानी लंबे समय तक रहने वाली और बार-बार लौटने वाली बीमारी है, जो शरीर की जैविक प्रक्रिया, व्यवहार और पर्यावरण के जटिल मेल से पैदा होती है। जब कोई व्यक्ति किसी भी तरीके से वजन कम करता है चाहे वो डाइट हो, एक्सरसाइज, दवाएं या सर्जरी हो तो शरीर खुद को बचाने के लिए प्रतिक्रिया करता है। भूख बढ़ाने वाले हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं, पेट भरे होने का संकेत देने वाले हार्मोन कम हो जाते हैं और शरीर की ऊर्जा खपत घट जाती है। आसान शब्दों में कहें तो शरीर वजन वापस बढ़ाने की कोशिश करता है।
वजन घटाने वाली दवाएं भूख को दबाकर, पेट भरे होने का एहसास बढ़ाकर और गट-ब्रेन सिग्नलिंग को बदलकर काम करती हैं। जब तक दवा चलती है, तब तक वजन कम होता रहता है। लेकिन जैसे ही दवा बंद होती है, शरीर की ये जैविक प्रक्रियाएं फिर से सक्रिय हो जाती हैं।
स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (BMJ) में प्रकाशित एक बड़ी और भरोसेमंद स्टडी में इस सवाल का साफ जवाब मिला है। इस सिस्टमैटिक रिव्यू और मेटा-एनालिसिस में 37 अध्ययनों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिनमें 9,000 से ज्यादा वयस्क शामिल थे। ये सभी लोग वजन घटाने की दवाएं लेने के बाद इलाज बंद कर चुके थे।
स्टडी के मुताबिक, दवा बंद करने के बाद लोग औसतन हर महीने करीब 0.4 किलो वजन दोबारा बढ़ा लेते हैं। सेमाग्लूटाइड और टिरज़ेपाटाइड जैसी नई और ज्यादा प्रभावी दवाओं के मामले में यह दर और तेज थी, करीब 0.8 किलो प्रति माह। इस रफ्तार से देखा जाए तो करीब 1.7 साल में वजन दोबारा वहीं पहुंच जाता है, जहां से इलाज शुरू हुआ था।
इतना ही नहीं, वजन के साथ-साथ मेटाबॉलिक हेल्थ भी बिगड़ने लगती है। इलाज के दौरान जो फायदे मिले थे जैसे ब्लड शुगर कंट्रोल, कोलेस्ट्रॉल में सुधार और ब्लड प्रेशर कम होना वे धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं। स्टडी के अनुसार दवा बंद करने के 1 से 1.5 साल के भीतर ये सभी फायदे लगभग पहले जैसे हो जाते हैं।
लाइफस्टाइल प्रोग्राम से अलग क्यों हैं दवाएं
एक अहम और थोड़ा चौंकाने वाला निष्कर्ष यह भी रहा कि दवा बंद करने के बाद वजन बढ़ने की रफ्तार, डाइट और एक्सरसाइज जैसे लाइफस्टाइल प्रोग्राम बंद करने की तुलना में ज्यादा तेज थी। इसका मतलब ये नहीं कि डाइट और एक्सरसाइज से ज्यादा वजन घटता है, बल्कि फर्क यह है कि व्यवहार में बदलाव से कुछ अच्छी आदतें बन जाती हैं, जो वजन को पूरी तरह वापस बढ़ने से रोक सकती हैं। वहीं, दवाएं तभी तक असर करती हैं, जब तक उन्हें लिया जा रहा हो।
लंबे इलाज की जरूरत
एक्सपर्ट्स का मानना है कि मोटापे को हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज की तरह देखना चाहिए। जैसे ब्लड प्रेशर की दवा बंद करने पर दबाव फिर बढ़ जाता है, वैसे ही वजन घटाने की दवा छोड़ने पर वजन वापस बढ़ जाता है। गंभीर मोटापा, डायबिटीज, फैटी लिवर या दिल की बीमारियों के जोखिम वाले मरीजों के लिए ये दवाएं जीवन बदलने वाली हो सकती हैं, लेकिन अक्सर इन्हें लंबे समय तक लेने की जरूरत पड़ती है।
दवा बंद करनी हो तो क्या विकल्प हैं
इन दवाओं की कीमत ज्यादा होने और लंबे समय तक खर्च उठाने की चुनौती को देखते हुए कुछ व्यावहारिक उपाय अपनाना जरूरी हैं। कुछ मरीजों के लिए कम से कम प्रभावी डोज पर लंबे समय तक दवा जारी रखना जरूरी हो सकता है। अचानक दवा बंद करने के बजाय धीरे-धीरे डोज कम करना वजन दोबारा बढ़ने की रफ्तार को धीमा कर सकता है, हालांकि इस पर अभी सीमित रिसर्च है।
एक और नया विचार यह है कि दवाओं का इंटरमिटेंट इस्तेमाल किया जाए कुछ समय दवा, कुछ समय बिना दवा और इस दौरान करीबी निगरानी रखी जाए। इससे खर्च और साइड इफेक्ट कम हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए भी और अध्ययन जरूरी हैं। कुछ मामलों में मजबूत दवा से वजन घटाने के बाद हल्की और सस्ती दवाओं पर शिफ्ट किया जा सकता है।
लाइफस्टाइल की भूमिका सबसे अहम
वजन घटने के बाद एक्सरसाइज बढ़ाना बेहद जरूरी माना गया है। कम वजन पर शारीरिक गतिविधि करना आसान होता है और यह वजन को दोबारा बढ़ने से बचाने में मदद करता है। इसके साथ ही हाई-प्रोटीन डाइट, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से दूरी और जरूरत पड़ने पर मील रिप्लेसमेंट प्लान वजन को स्थिर रखने में सहायक हो सकते हैं।
नतीजा
दवा बंद करने के बाद वजन बढ़ना किसी की कमजोरी या अनुशासन की कमी नहीं है। ये शरीर की जैविक प्रतिक्रिया है। नीति-निर्माताओं और डॉक्टरों के लिए चुनौती यह है कि इन दवाओं को शॉर्ट टर्म इलाज की तरह न देखें, बल्कि मोटापे की लंबी और समग्र देखभाल का हिस्सा बनाएं। खासकर भारत जैसे देश में, जहां संसाधन सीमित हैं, वहां सही मरीजों को प्राथमिकता देना, किफायती रणनीतियां बनाना और मजबूत लाइफस्टाइल सपोर्ट सिस्टम तैयार करना बेहद जरूरी होगा।
डिस्क्लेमर
यह स्टोरी सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार की गई है। किसी भी तरह के स्वास्थ्य संबंधी बदलाव या डाइट में परिवर्तन करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
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