राज्यों की विधानसभा में पारित विधेयकों को लेकर राज्यपाल और राष्ट्रपति की स्वीकृति के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था दी है, उसे देश के संघीय ढांचे में शक्ति संतुलन के लिए राह निकालने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। इसे लेकर काफी समय से स्पष्टता की जरूरत महसूस की जा रही थी कि अगर विधानसभा में किसी विधेयक को पारित कर दिया गया है तो राज्यपाल उसे मंजूरी देने को लेकर कितना समय ले सकते हैं।
तमिलनाडु में यह मुद्दा ज्यादा मुखर रूप में सामने आया, जहां राज्य की द्रमुक सरकार और राज्यपाल नीतिगत मामलों को लेकर आमने-सामने देखे गए। इसी संदर्भ में स्पष्टता के लिए राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांगी थी। अब शीर्ष अदालत ने कहा है कि वह राज्य विधानसभाओं से पारित विधेयकों को मंजूरी देने के मामले में राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय नहीं कर सकती।
मगर अदालत ने यह भी कहा कि राज्यपाल विधानसभा से पारित हुए विधेयकों को अनंतकाल तक अपने पास लटकाए नहीं रख सकते। लंबे समय तक देरी या बिना वजह बताए रोके रखने के मामलों में अदालतें राज्यपाल के विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए सीमित निर्देश जारी कर सकती हैं।
जाहिर है, अदालत ने समयसीमा निर्धारित करने के सवाल पर राज्यपाल और राष्ट्रपति के अधिकारों के मामले में एक तरह से शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को ध्यान में रखा है, लेकिन साथ ही संघीय ढांचे की अहमियत को दर्ज करते हुए स्थिति स्पष्ट की है कि राज्यपाल पारित विधेयकों को अनिश्चितकाल तक रोके रखने की छूट नहीं ले सकते। इस तरह देखें तो कहा जा सकता है कि राज्य में निर्वाचित सरकार ही मुख्य भूमिका में होगी और सत्ता के दो केंद्र नहीं हो सकते।
दरअसल, अनेक मौकों पर ऐसे विवाद सामने आते रहे हैं कि जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वहां विधानसभा में पारित होने के बावजूद विधेयकों को मंजूरी देने के मामले में राज्यपाल नाहक देरी करते हैं या फिर बिना वजह बताए पारित विधेयकों को रोके रखते हैं। तमिलनाडु में इस विवाद ने तूल पकड़ लिया था। इसके अलावा, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में भी कम से कम तैंतीस विधेयकों के विधानसभा से पारित होने की खबरें आई हैं, जो राज्यपाल या राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित हैं।
इसमें कोई दोराय नहीं है कि अगर किसी राज्य में विधानसभा ने एक विधेयक को उचित प्रावधानों का पालन करते हुए पारित किया है तो जनहित के मद्देनजर उस पर राज्यपाल की स्वीकृति मिलनी चाहिए। अगर नियमों की कसौटी या अन्य आधार पर विधेयक में कोई तकनीकी त्रुटि है, तो उसकी वजह बता कर उसे वापस करना या प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का विकल्प अपनाना चाहिए।
मगर बिना किसी मजबूत आधार या स्पष्टता के किसी विधेयक को जरूरत से ज्यादा वक्त तक लंबित रखा जाता है तो उसकी अहमियत कम भी हो सकती है। इससे राज्य और संघ के बीच नाहक टकराव की स्थिति भी बन सकती है, क्योंकि कई बार राज्यपाल पर केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप लगता रहा है।
इसलिए एक मजबूत संघीय ढांचे में भी हर हाल में लोकतंत्र के जीवन के लिए शक्तियों और उसकी सीमा को लेकर स्पष्टता बनी रहनी चाहिए। साथ ही संवैधानिक पदों पर बैठे लोग अगर संविधान की मर्यादा का खयाल रखें, तो इससे लोकतंत्र को भी मजबूती मिलेगी।
