सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर नफरती भाषणों पर नकेल कसने को लेकर सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी रेखांकित की है। अदालत ने कहा है कि ऐसे भाषणों और अपराधों पर नजर रखने के लिए एक तंत्र बनाया जाए। अदालत ने कहा कि नफरत आधारित अपराध और नफरती बयान पूरी तरह अस्वीकार्य हैं। करीब वर्ष भर पहले भी सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को नफरती भाषणों पर रोक लगाने का निर्देश देते हुए पुलिस की जिम्मेदारी तय की थी।
नूंह में फैली हिंसा पर कोर्ट ने की टिप्पणी
अभी हरियाणा के नूंह और फिर अन्य क्षेत्रों में फैली हिंसा और नफरती बयानों तथा भाषणों के संदर्भ में दायर अपील पर उसने ताजा टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि पुलिस महानिदेशकों को निर्देश दिया जाएगा कि वे एक ऐसी समिति बनाएं, जो अलग-अलग इलाकों के थाना प्रभारियों से प्राप्त नफरती बयान संबंधी शिकायतों पर गौर करके उनकी सामग्री की जांच करें और पुलिस अधिकारियों को निर्देश जारी करें।
हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस को इस संबंध में चौकस रहने को कहा है। दिल्ली दंगों, विधानसभा चुनावों के दौरान और फिर उत्तराखंड तथा देश के अन्य हिस्सों में आयोजित धर्म संसदों में जब नफरती भाषणों को लेकर गुहार लगाई गई थी, तब भी न्यायालय ने पुलिस की जिम्मेदारी याद दिलाई थी।
नफरत भरे भाषणों से बने हिंसा के माहौल
पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह समुदाय विशेष के प्रति नफरत भरे भाषण देकर लोगों में उत्तेजना पैदा करने की कोशिशें तेज हुई हैं और इसके चलते अनेक जगहों पर हिंसा का माहौल बना है, उससे धार्मिक और सामाजिक सौहार्द काफी बिगड़ा है। जबकि संवैधानिक तकाजा है कि किसी भी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर चोट नहीं की जा सकती, मगर पुलिस ज्यादातर मामलों में हाथ पर हाथ धरे देखी गई है। इसकी बड़ी वजह तो यह है कि ऐसे नफरती भाषण देने वालों में खुद सत्तापक्ष के लोग संलिप्त रहे हैं। स्वाभाविक ही, इससे पुलिस को सख्ती बरतने में हिचक महसूस होती रही है।
जिन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस को सख्त निर्देश दिए, उनमें भी जांच और कार्रवाइयों आदि को लेकर उसका व्यवहार शिथिल ही देखा गया है। ऐसे में कहना मुश्किल है कि न्यायालय के ताजा निर्देश पर पुलिस कितनी निष्पक्षता और सख्ती बरत पाएगी। नूंह की जिस हिंसा के संदर्भ में अपील की गई थी, उसमें सामने आए चित्रों से स्पष्ट है कि पुलिस एक तरह से मूकदर्शक ही बनी रही।
पुलिस की शिथिलता और सख्ती से बचने के प्रयास की वजहें स्पष्ट हैं। सरकारों ने उसके हाथ बांध रखे हैं। फिर जहां खुद सत्तापक्ष के नेता भड़काऊ और नफरती बोल बोलते देखे जाते हैं, वहां छुटभैये नेताओं और कार्यकर्ताओं से भला कितने अनुशासन की अपेक्षा की जा सकती है? अब यह भी छिपी बात नहीं है कि राजनीतिक दल अपना जनाधार बढ़ाने के मकसद से उपद्रवी तत्त्वों को उकसाते हैं।
यह संकीर्णता केवल किसी समुदाय विशेष के प्रति विष वमन तक सीमित नहीं है। जो दल जाति की राजनीति करते हैं, वे भी किसी न किसी रूप में नफरती भाषणों का सहारा लेते देखे जाते हैं। हालांकि समाज का प्रबुद्ध तबका राजनीतिक दलों की इन चालबाजियों को समझता है, मगर उसके प्रयास इतने कमजोर साबित होते हैं कि उपद्रवी तत्त्व अपनी योजनाओं में कामयाब हो जाते हैं। ऐसे में नजर आखिरकार पुलिस पर जाकर टिकती है, जिसकी जिम्मेदारी सामाजिक विद्वेष पैदा करने की कोशिशों पर अंकुश लगाने और नफरत का माहौल खत्म करने की है।
