काफी मुश्किल से मणिपुर में हालात थोड़े काबू में आते दिखने लगे थे और इसी वजह से उम्मीद की जाने लगी थी कि वहां जटिल हो चुकी समस्या का अब शायद कोई समाधान निकल सके। मगर राज्य में बीते कुछ दिनों के भीतर जिस तरह हिंसा की एक नई लहर देखी जा रही है, उससे एक बार फिर स्थिति बिगड़ने की आशंका खड़ी हो गई है।
गौरतलब है कि मणिपुर के कांगपोकपी जिले के सोंगलुंग गांव में सोमवार को उग्रवादियों ने कई घरों और फार्म हाउसों में आग लगी दी। यह इलाका कुकी-जो बहुल है और पहले भी कुछ उग्रवादी संगठनों के निशाने पर रहा है। हालांकि आगजनी और हमले में किसी की जान नहीं गई, लेकिन यह साफ है कि इस वारदात का मकसद जातीय तनाव की आग को भड़काना और राज्य को फिर से अराजकता की आग में झोंकना था।
इसके संकेत भी सामने आए जब कांगपोकपी जिले के एक कुकी संगठन ने सरकार से चौबीस घंटे के भीतर अपराधियों को गिरफ्तार करने की मांग की और ऐसा न होने पर कार्रवाई करने की चेतावनी दी। संगठन ने यह भी कहा कि जिले के कुकी बहुल इलाकों के गांवों को जानबूझ कर निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे में अगर हालात बिगड़ते हैं तो उसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
अफसोस की बात यह है कि हिंसा की आग से उपजी व्यापक त्रासदी के बावजूद अब भी कोई ऐसा हल सामने नहीं आ सका है, जिससे विवाद और टकराव में शामिल सभी समुदाय सहमत हों और शांति की राह निकल सके। इसके उलट अब ऐसे मुद्दों पर भी हिंसक गतिविधियां सामने आती दिखने लगी हैं, जो दो समुदायों के बीच दूरी को पाटने की एक कड़ी बन सकती थी। हाल ही में एक कुकी युवती से विवाह करने वाले मैतेई युवक की संदिग्ध उग्रवादियों ने हत्या कर दी।
दूसरी ओर, खबरों के मुताबिक, सोंगलुंग गांव में ताजा हमला करने वाले उग्रवादी संगठन का कहना है कि जिस इलाके में घरों और फार्महाउसों को जलाया गया, वहां अफीम की अवैध खेती होती थी। जबकि कुकी-जो संगठनों का कहना है कि सोंगलुंग गांव में कभी अफीम की खेती नहीं हुई और अस्थायी फार्महाउसों के बजाय आवासीय मकानों को जला दिया गया। सवाल है कि अगर कहीं कोई अवैध गतिविधि चल रही है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई करने की जिम्मेदारी प्रशासन की है या उग्रवादी संगठन की?
यह छिपा नहीं है कि मई, 2023 से मणिपुर में जारी हिंसा की आग का सबसे बड़ा कारण अलग-अलग स्थानीय समुदायों के बीच कई मसलों पर सीधा टकराव रहा है। हिंसा और अराजकता में अब तक वहां ढाई सौ से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग बेघर हो गए।
मगर अफसोस की बात है कि मैतेई समुदाय को जनजातीय दर्जा देने के सवाल पर उपजे विरोध के बाद जारी हिंसा और अराजकता का हल आज तक नहीं निकल सका है, जबकि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय विवाद में शामिल जातीय संगठनों के बीच कई स्तर पर बातचीत हुई। हैरानी की बात है कि देश के किसी भी इलाके में हिंसा और अराजकता जैसे हालात पर काबू पाने के मकसद से गठित सुरक्षा बलों का तंत्र भी वहां नाकाम दिखता है।
दरअसल, जिन सवालों पर वहां विभिन्न समुदायों के बीच टकराव खड़ा हुआ, सबसे पहले उसका समाधान निकालने की जरूरत है। मगर इसके लिए ईमानदार इच्छाशक्ति की जरूरत है, जिसका फिलहाल राज्य और शासन से लेकर हर स्तर पर अभाव दिखता है।
