पिछले दिनों थोक महंगाई के आंकड़े तनिक राहत की रंगत लेकर आए। थोक महंगाई की दर फरवरी में 2.48 फीसद थी, जो कि तनिक घट कर मार्च में 2.47 फीसद रह गई। लेकिन इस मामूली-सी राहत पर पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों ने सवालिया निशान लगा दिया है। पेट्रोल की कीमत चौहत्तर रुपए से ज्यादा हो गई है और इसी के साथ यह चार साल के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई है। डीजल की कीमत भी पैंसठ रुपए से अधिक होकर रिकार्ड स्तर पर आ गई है। पिछले दस महीनों में पेट्रोल नौ रुपए से ज्यादा और डीजल लगभग बारह रुपए महंगा हो चुका है। इस स्थिति ने जहां उपभोक्ताओं के लिए परेशानी खड़ी कर दी है, वहीं सरकार के माथे पर भी चिंता की लकीरें दिख रही हैं। आगामी विधानसभा चुनावों और अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्यवृद्धि के राजनीतिक फलितार्थ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत अपनी जरूरत या खपत का करीब अस्सी फीसद तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो इसका भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ता है।

यह असर दो तरह से होता है। एक तो यह कि आयात का खर्च काफी बढ़ जाता है और इसके फलस्वरूप देश के व्यापार घाटे में इजाफा होता है। दूसरे, पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने से परिवहन तथा ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है और इसका नतीजा बहुत सारी चीजों की मूल्यवृद्धि के रूप में आता है। इसलिए हाल में महंगाई की दर में जो राहत दिखी है वह काफूर हो सकती है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के रुझान के पीछे वजह यह है कि तेल उत्पादक देशों के संगठन यानी ओपेक ने उत्पादन में कटौती की रणनीति अख्तियार की है। माना जाता है कि इसमें रूस की भी दिलचस्पी है। इसी के मद्देनजर हाल में दिल्ली में हुए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा मंच के सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृत्रिम तरीके से तेल की कीमतें बढ़ाए जाने के प्रति आगाह किया। लेकिन इससे शायद ही कोई फर्क पड़े, क्योंकि ऐसी चीजें दुनियादारी और कारोबारी स्वार्थों से तय होती हैं। फिर, भारत के पास चारा क्या बचता है?

गौरतलब है कि दक्षिण एशियाई देशों में भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सर्वाधिक हैं। इसलिए कि देश में पेट्रोल-डीजल की विपणन दरों में आधी हिस्सेदारी करों की है। इन करों में कटौती क्यों नहीं की जा सकती? जब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त किया गया, तो यह तर्क दिया गया कि अंतत: इससे उपभोक्ताओं को लाभ ही होगा; अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरेगी, तो पेट्रोल-डीजल का खुदरा मूल्य उन्हें कम चुकाना होगा। लेकिन हाल के कुछ महीनों को छोड़ दें, तो पिछले साढ़े तीन साल में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत नीचे थी। पर उसका लाभ उपभोक्ताओं को नहीं मिल पाया, क्योंकि कर बढ़ा दिए गए। नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच उत्पाद शुल्क में नौ बार बढ़ोतरी की गई। उत्पाद शुल्क में महज एक बार पिछले साल अक्तूबर में दो रुपए प्रति लीटर की कटौती की गई थी। एक बार फिर करों में कटौती की मांग हो रही है। लेकिन तेल पर निर्भरता घटाने और ऊर्जा के दूसरे संसाधनों के विकास पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।