दीपक कुमार त्यागी
हाल के कुछ वर्षों में देश में किशोरों द्वारा घटित कुछ ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं, जिनसे स्पष्ट है कि अब कुछ बच्चे बचपन में ही गंभीर अपराधों को अंजाम देने लगे हैं, जो बेहद चिंताजनक है। जिस तरह किशोर आए दिन आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, उससे बार-बार सवाल उठते हैं कि क्या इन घटनाओं के लिए वास्तव में बच्चे जिम्मेदार हैं या कहीं न कहीं हमारे लालन-पालन और सामाजिक माहौल में व्याप्त कोई कमी जिम्मेदार है। किशोर उम्र में अपराध करने के लिए बच्चों को कौन से हालात उकसा रहे हैं, इसके लिए बच्चों में प्रेरणा कहां से मिल रही है। क्या इसका कारण परिवार के सदस्यों, पारिवारिक मित्रों, शिक्षकों के बच्चों के साथ व्यवहार में कोई कमी तो नहीं, जिसके चलते कुछ बच्चे गलत राह पर निकल जाते हैं।
यों हमारे देश में बच्चों को भगवान का रूप माना जाता है और कुछ धर्मों में तो बच्चों की पूजा तक की जाती है। वैसे भी बच्चे देश का भविष्य और अनमोल राष्ट्रीय संपत्ति होते हैं और आने वाले समय में उनके मजबूत कंधों पर देश और परिवार के भविष्य की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। इसलिए सरकार, समाज, माता-पिता, अभिभावक के रूप में हम सभी का एक नैतिक कर्तव्य है कि हम बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए उन्हें स्वस्थ्य सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण में बड़ा होने का अवसर प्रदान करें। ताकि वे बड़े होकर देश के जिम्मेदार नागरिक के रूप में शरीर से हृष्ट-पुष्ट, मानसिक रूप से विद्वान और नैतिक रूप से सदाचारी बन कर अपनी जिम्मेदारी का सही ढंग से निर्वाह कर सकें। माता-पिता और सरकार का कर्तव्य है कि वे बच्चों के विकास के लिए समान अच्छे अवसर प्रदान करें। इसके साथ ही सरकार का दायित्व है कि समाज में व्याप्त असमानता को कम करने के लिए सभी बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। हमारे देश में बच्चों से आज्ञाकारी बनने, बड़ों का आदर-सम्मान करने वाला और अपने अंदर अच्छे गुणों को धारण करने वाले होने की अपेक्षा की जाती है और अधिकतर बच्चे इस पर अमल भी करते हैं। ग्यारह से सोलह वर्ष की किशोरावस्था की उम्र बेहद महत्त्वपूर्ण होती है। उसी दौरान उनके व्यक्तित्व निर्माण और सर्वांगीण विकास की ठोस नींव रखी जाती है। ऐसे में उनका किशोर उम्र में विशेष ध्यान देना बेहद जरूरी हो जाता है। क्योंकि यही वह समय है, जब बच्चे के गलत रास्ते पर चलने की आशंका सबसे अधिक होती है। अधिकतर बच्चे अपने परिवार, समाज और सरकार के बनाए नियमों को मानते हैं, लेकिन कुछ बच्चे अनुशासन और नियमों को नहीं मानते हैं। इनमें से ही कुछ बच्चे धीरे-धीरे आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं, जिसके चलते उन्हें समाज में बाल अपराधी या किशोर अपराधी के रूप में जाना जाता है।
आज भारतीय समाज में बाल अपराध की दर दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, साथ ही इसकी प्रकृति भी जटिल होती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि वर्तमान समय में बहुत तेजी से हो रहे नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की प्रक्रिया ने एक ऐसे वातावरण का सृजन कर दिया है, जिसमें अधिकतर परिवार अपने ही बच्चों पर नियंत्रण रखने और उन्हें संस्कारवान बनाने में विफल सिद्ध हो रहे हैं। सभी पैसे कमाने की दौड़ में इतने व्यस्त हो गए हैं कि भोले-भाले बचपन को ठीक से समय नहीं दे पा रहे हैं। इसके चलते आज बच्चों की वैयक्तिक स्वंतत्रता में अत्यधिक वृद्धि होने के कारण कुछ बच्चों में नैतिक मूल्यों का बहुत तेजी से क्षरण होने लगा है। इसके साथ ही अत्यधिक प्रतिस्पर्धा ने किशोरों में तनाव को पैदा किया है। आज जिस आसानी से बच्चों को मोबाइल फोन, कम्प्यूटर और इंटरनेट उपलब्ध है, उसने इन्हें परिवार और समाज से अलग कर अकेलेपन में जीना सिखा दिया है। इसके चलते आज देश में बहुत तेजी से बच्चे तनाव और अवसाद के शिकार होकर अपराध में लिप्त हो रहे हैं। आज देश में बहुत सारे किशोर कई खतरनाक अपराधों में लिप्त पाए जाने लगे हैं जैसे कि चोरी, लूट, झपटमारी, लड़ाई-झगड़े, हत्या, सामूहिक दुष्कर्म आदि। यह माता-पिता के साथ-साथ परिवार, समाज और सरकार के लिए भी बहुत बड़ी चिंता का विषय है। क्योंकि बच्चों के द्वारा किए जाने वाले आपराधिक कृत्य माता-पिता, परिवार और समाज को झकझोर के रख देते हैं और देश के लिए बहुत नुकसानदेह होते हैं। समाजशास्त्रीय दृष्ट्रिोण से किशोर अपराध के लिए अब उम्र को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता, क्योंकि किसी भी व्यक्ति की मानसिक और सामाजिक परिपक्वता सदा ही आयु से प्रभावित नहीं होती है। इसलिए कुछ विद्वान किशोरों द्वारा प्रकट रोजमर्रा के व्यवहार को किशोर अपराध के लिए मुख्य आधार मानते हैं। वे मानते हैं कि अगर बच्चा आवारागर्दी करेगा, स्कूल में अनुपस्थित रहेगा, माता-पिता और परिजनों की आज्ञा नहीं मानेगा, अश्लील भाषा का प्रयोग करेगा, चरित्रहीन व्यक्तियों से संपर्क रखेगा, तो उसके बिगड़ने की संभावना बहुत अधिक होती है। इसी के चलते बच्चा आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने लगता है।

व्यवहार में बदलाव
हर माता-पिता का दायित्व है कि वह बच्चों का अच्छे ढंग से ध्यान रखें और उनके व्यवहार में आ रहे बदलाव को जान कर उसकी जड़ तक पहुंचे जैसे कि अगर बच्चा स्कूल जाने से आनाकानी करने लगे, स्कूल से रोजाना अलग-अलग तरह की शिकायतें आने लगे, साथी बच्चों को गाली देना, गलत संगत में बैठना, किसी एक काम पर ध्यान न लगा पाना, आवारागर्दी करना, हर समय मोबाइल और इंटरनेट पर चिपके रहना आदि। ये सभी लक्षण दिखने पर समझ जाना चाहिए कि बच्चे के व्यवहार में बदलाव आने लगा है और अब उस पर बहुत अधिक ध्यान देने का समय है। ऐसे हालात में बच्चों को वक्त देना बहुत जरूरी हो जाता है, उसे बाहर घुमाने ले जाना चाहिए, उसके साथ अलग-अलग खेल खेलने चाहिए, बातें करके उसकी समस्या जान कर उसका समाधान करना चाहिए, बच्चों का मन बहुत कोमल होता है इसलिए उसको जरूरत से बहुत ज्यादा नहीं समझाना चाहिए, बात-बात में उसकी गलतियां नहीं निकालनी चाहिए।
कानूनी पहलू, किशोर कौन है
किशोर एक ऐसे व्यक्ति को कहा जाता है, जो बहुत युवा, बालक या वयस्क न हो। दूसरे शब्दों में, किशोर का अर्थ है कि जो बच्चा अभी वयस्कों की आयु तक न पहुंचा हो, जिसका तात्पर्य उसके अब भी बालपन और अपरिपक्व होने से है। कभी-कभी बच्चा शब्द किशोर के स्थान पर भी प्रयोग होता है। कानूनी रूप से कहा जाए, तो एक किशोर को उस बच्चे के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसने अभी कानूनी रूप से निश्चित वयस्क आयु प्राप्त न की हो और देश के कानून के तहत उसे अपने किए हुए अपराधों के लिए वयस्क की तरह जिम्मेदार न ठहराया जा सके। कानून के शब्दों में, एक किशोर वह व्यक्ति होता है, जिसकी आयु अठारह वर्ष से कम हो। यह कानूनी महत्त्व रखता है। किशोर न्याय (देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम, 2000 के अनुसार एक किशोर, अगर वह किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल है, तो कानूनी सुनवाई और सजा के लिए उसके साथ एक वयस्क की तरह व्यवहार नहीं किया जाएगा।
किशोर अपराध क्या है
जब किसी बच्चे द्वारा कोई कानून-विरोधी या समाज-विरोधी कार्य किया जाता है तो उसे किशोर अपराध या बाल अपराध कहते हैं। कानूनी दृष्टि से किशोर अपराध सोलह वर्ष से कम आयु के बालक द्वारा किया गया कानून-विरोधी कार्य है, जिसे कानूनी कार्यवाही के लिए बाल न्यायालय के समक्ष उपस्थित किया जाता है। भारत में बाल न्याय अधिनियम 1986 (संशोधित 2000) के अनुसार सोलह वर्ष तक की आयु के लड़कों और अठारह वर्ष तक की आयु की लड़कियों के अपराध करने पर किशोर अपराधी की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है। किशोर उम्र के बालक द्वारा किया गया कानून-विरोधी कार्य किशोर अपराध है। केवल आयु किशोर अपराध को निर्धारित नहीं करती, बल्कि इसमें अपराध की गंभीरता भी एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। सोलह वर्ष का लड़का तथा अठारह वर्ष की लड़की द्वारा कोई भी ऐसा अपराध न किया गया हो, जिसके लिए राज्य मृत्यु दंड या आजीवन कारावास देता है, जैसे हत्या, देशद्रोह, घातक आक्रमण आदि, तो वह किशोर अपराधी माना जाएगा।

अपराध की दर
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आकड़ों के मुताबिक वर्ष 2014 में कुल 38,455, वर्ष 2015 में 33,433 और वर्ष 2016 में 35,849 मामले किशोर अपराध के अंतर्गत पंजीकृत किए गए, जो कि बहुत शोचनीय है, क्योंकि बच्चे देश और परिवार की नींव और उज्जवल भविष्य होते हैं। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ की एक महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार किशोरों की संख्या चौबीस करोड़ से अधिक है। यह आंकड़ा देश की जनसंख्या का एक चौथाई हिस्सा है। एक रिपोर्ट के अनुसार बच्चों में गुस्से की प्रवृत्ति उनकी उम्र के अनुसार बदलती जाती है। वर्ष 2014 में ‘इंडियन जर्नल साइकोलॉजिकल मेडिसिन’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार लड़कों में लड़कियों के मुकाबले अधिक गुस्सा देखने को मिलता है। इस अध्ययन में शामिल लोगों में जिस समूह की उम्र सोलह से उन्नीस वर्ष के बीच थी, उनमें ज्यादा गुस्सा देखने को मिला, जबकि जिस समूह की उम्र बीस से छब्बीस वर्ष के बीच थी उनमें थोड़ा कम गुस्सा था। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि किशोर उम्र के बच्चों में युवा अवस्था के मुकाबले अधिक गुस्सा देखने को मिलता है। इसी तरह लड़कों में लड़कियों के मुकाबले अधिक गुस्सा देखने को मिलता है। हालांकि, इसी शोध के अनुसार बारह से सत्रह वर्ष आयु वर्ग की लड़कियों में करीब उन्नीस प्रतिशत लड़कियां अपने स्कूल में किसी न किसी तरह के झगड़े में शामिल मिली हैं। यह अध्ययन भारत के छह प्रमुख स्थानों के कुल 5467 किशोर और युवाओं पर की गई थी। इस अध्ययन में दिल्ली, बंगलुरु, जम्मू, इंदौर, केरल, राजस्थान और सिक्किम के किशोर और युवा शामिल थे।
नियंत्रण की जरूरत

वैसे हमारे देश के बहुत से कानून के विशेषज्ञों का मानना है कि देश में वर्तमान कानून और बाल सुधार गृह के खस्ताहाल आपराधिक प्रवृत्ति के बच्चों की स्थिति में सुधार करने और नियंत्रित करने के लिए अपर्याप्त है। हमें इसमें तत्काल बदलाव लाने की जरूरत है। साथ ही आज देश में किशोरावस्था में अपराध के सामान्य प्रवृत्ति के मामले और गंभीर प्रवृत्ति के मामलों में बार-बार लिप्त होने वाले बच्चों में अंतर करना आवश्यक है। बार-बार गंभीर प्रवृत्ति के अपराधों के लिए अब बच्चों को भी वयस्कों की तरह दंडित किए जाने की मांग देश में उठाने लगी है। हालांकि हमारे देश में किशोर अपराधों का अलग न्यायाविधान है। उनके न्यायाधीश और अन्य न्यायाधिकारी बाल-मनोविज्ञान के जानकार होते हैं। वहां किशोर अपराधियों को दंड नहीं दिया जाता, बल्कि उनके जीवनवृत्त (केस हिस्ट्री) के आधार पर उनका तथा उनके वातावरण का अध्ययन करके वातावरण में स्थित असंतोषजनक, फलत: अपराधों को जन्म देने वाले, तत्त्वों में सुधार करके बच्चों सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न किया जाता है। अपराधी बच्चों के प्रति सहानुभूति, प्रेम, दया और संवेदना का व्यवहार किया जाता है। इसी उद्देश्य से भारत में भी राज्यों में बाल न्यायालयों और बाल सुधारगृहों की स्थापना की गई है, ताकि देश के भविष्य को गलत राह से सही राह पर लाकर किशोर द्वारा किए जाने वाले अपराधों को नियंत्रित किया जा सके। साथ ही अब समय आ गया है कि विभिन्न देशों की तरह भारत में भी किशोर अपराधियों को सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर ठोस और कारगर प्रयास धरातल पर किए जाए हालांकि सरकार के मौजूदा प्रावधानों से अब किशोर अपराधों की पुनरावृत्ति में थोड़ी कमी आई है, फिर भी अभी इन उपायों में काफी खामियां हैं, जिन्हें तत्काल दूर करना आवश्यक है। कोई बालक अपराध की ओर नहीं जाए, इसके लिए आवश्यक है कि देश में गरीब बच्चों के लिए बड़े पैमाने पर सरकारी स्तर और सामाजिक स्तर पर समान अवसर उपलब्ध करवाए जाएं। बच्चों को स्वस्थ मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराए जाएं, पोर्नोग्राफी, अश्लील साहित्य, अश्लीलता पेश करने वाले नाटकों, विज्ञापनों और बच्चों को अपराध के लिए प्रेरित करने वाले दोषपूर्ण चलचित्रों पर तत्काल रोक लगाई जाए। बिगड़े हुए बच्चे को सुधारने में माता-पिता की मदद करने हेतु बाल सलाहकार केंद्र गठित किए जाएं तथा उससे संबंधित कर्मचारियों को उचित प्रशिक्षण दिया जाए। किशोर अपराध की रोकथाम के लिए माता-पिता, परिजन, सरकारी एजेंसियों, शैक्षिक संस्थाओं, पुलिस, न्यायपालिका, सामाजिक कार्यकताओं तथा स्वैच्छिक संगठनों को आपसी तालमेल करके बच्चे को सुधारने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए। माता-पिता, परिजनों और समाज को बच्चों को तनाव मुक्त माहौल प्रदान करना चाहिए। सभी को सामूहिक प्रयास करके बच्चों को सुधारना चाहिए न कि गलत शिक्षा देकर उनको बिगाड़ना चाहिए।
अपराध की वजहें
किशोर अपराध एक इरादतन अपराध नहीं, बल्कि बहुत गंभीर सामाजिक और पारिवारिक समस्या है, जिसके अधिकतर कारण भी समाज और परिवार में ही विद्यमान होते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बच्चों की इस हिंसक प्रवृत्ति के पीछे क्या वजह है। हमको समझना होगा कि कोई भी बच्चा जन्मजात अपराधी नहीं होता, बल्कि परिस्थितियां उसे ऐसा बना देती हैं। किसी भी बालक के व्यक्तित्व को रूप देने में घर के अंदर और बाहर का सामाजिक-सांस्कृतिक, पारिवारिक वातावरण बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी वातावरण और हालात के चलते कुछ किशोर अपराध से जुड़ जाते हैं। इसके कुछ कारण जाहिर हैं। ’माता-पिता में आपसी मनमुटाव और लड़ाई-झगड़े के चलते तनावपूर्ण होते रिश्ते, एकल परिवार, मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, इंटरनेट, सरलता से उपलब्ध पोर्नोग्राफी बच्चों को गलत दिशा में जाने के लिए प्रेरित करती है। इसके अलावा बच्चों को अन्य तनाव भरे पारिवारिक रिश्ते, अपराधी भाई-बहन और परिजनों का होना, माता-पिता द्वारा तिरस्कार, परिवार की खस्ता माली हालात, मनोवैज्ञानिक कारण, सामुदायिक कारण, सिनेमा और अश्लील साहित्य, नशीली दवाइयों का सेवन, असामाजिक साथियों की मित्रमंडली, आग्नेयास्त्रों की आसान उपलब्धता, पारिवारिक हिंसा, बाल यौन शोषण और मीडिया की भूमिका आदि भी अपराध करने के लिए प्रेरित करने के बहुत बड़े कारण है।’ हालांकि हमारे देश भारत में किशोर अपराध के लिए गरीबी सबसे बड़ा कारण है, जो बच्चों को पेट भरने के लिए आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए मजबूर करती है। इसके अलावा देश में आजकल समाज, साहित्य, सिनेमा के जो हालात हैं, वे किशोरों के मस्तिष्क में सकारात्मक के स्थान पर नकारात्मक प्रभाव अधिक डालते हैं। इसके चलते वे अपराध करने के प्रति आकर्षित होते हैं।’ वैसे तो इसके अलावा भी अन्य तथ्य हैं, जिनका गहन अध्ययन और विश्लेषण हम सभी को करने की आवश्यकता है। इससे इस बेहद ज्वंलत समस्या का हम निदान कर सकें।

