मनीषा सिंह

आधुनिक हो रहे समाज में अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आ जाती हैं, जहां एक असफल प्रेम अक्सर किसी हिंसक घटना की परिणति के रूप में सामने आता है। खास तौर से सोशल मीडिया के रास्ते होने वाले प्रेम की कई परिणतियां दुखदायी रही हैं। जरूरी है कि प्रेम के उस पहलू को फिर से समझा जाए जो शाश्वत, सहज है और जिसमें मानवीयता के गुण हैं, न कि हिंसा और उत्पात के। पिछले साल के ऐसे दो वाकये हमारे सामने हैं। अमेरिका के मैरीलैंड पहुंची जुहू (मुंबई) की एक युवती तरुणा असवानी को एक साइबर अपराधी उनके इ-मेल की हैकिंग से निकाली गई निजी तस्वीरों और वीडियो के बल पर ब्लैकमेलिंग शुरू की। उसने इन तस्वीरों-वीडियो के बल पर कई घिनौने प्रस्ताव किए थे जिन्हें नहीं मानने पर इन्हें सार्वजनिक करने की धमकी दी थी। अमूमन ऐसे हालात में एक आम लड़की झुक जाती है और अपराधियों की मांग मान लेती है। लेकिन तरुणा ने ऐसा नहीं किया। उसने फेसबुक पर खुलेआम आपबीती लिख डाली और उस साइबर अपराधी का खुलासा कर दिया। फेसबुक पर सार्वजनिक की गई पोस्ट के बाद मुंबई पुलिस भी सक्रिय हो गई और अमेरिकी जासूसों ने भी जांच शुरू कर दी।

यही नहीं, बारह हजार लोगों ने फेसबुक के जरिए तरुणा की सराहना करते हुए साइबर अपराधी को सजा दिलाने की मांग भी कर डाली। लेकिन तरुणा जैसा साहस एक अन्य युवती ए. वीनूप्रिया नहीं दिखा पाई। तमिलनाडु की इक्कीस साल की वीनूप्रिया ने पिछले साल फेसबुक पर अपनी कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें देखी थीं तो सामाजिक अपमान से बचने के लिए उसने आत्महत्या कर ली थी। उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें फेसबुक पर मौजूद उसके दोस्तों-परिचितों ने भी देखी थीं, जिससे वह परेशान थी। ये सारी तस्वीरें कंप्यूटर पर फोटोशॉप आदि तरीकों से विकृत (मॉर्फ्ड) की गई थीं। ऐसा करने वाला शख्स वह था जिसके प्रेम निवेदन को वीनूप्रिया ने स्वीकार नहीं किया था। एक पावरलूम में काम करने वाले सुरेश नामक शख्स ने ही वीनूप्रिया की विकृत तस्वीरें फेसबुक पर डाली थीं जिससे निपटने का कोई और उपाय उसे नहीं सूझा।

ऐसे कई हादसे सामने आ चुके हैं, जिनसे पता चलता है कि प्रेम की साइबर गलियां बेहद खतरनाक हो चुकी हैं। फेसबुक से हुई दोस्ती के बाद हुए मनमुटाव के बाद बदले की भावना से ग्रस्त प्रेमी क्या कुछ नहीं कर गुजर रहे हैं। इस तरह की घटनाओं से खास तौर से सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाली युवा पीढ़ी का मानसिक द्वंद्व सामने आ रहा है जिससे प्रतीत होता है कि उसे प्रेम के वास्तविक अभिप्राय की ही समझ नहीं है। फेसबुक, चैटिंग और डेटिंग की वेबसाइटों पर मौजूद आज की पीढ़ी को लगता है कि अगर उसके जरिए दोस्ती की प्रार्थनाएं स्वीकार कर ली गई हैं तो इसका अभिप्राय प्यार से ही है जबकि अक्सर ऐसा नहीं होता। इस तरह के इंटरनेट के संवाद न तो प्रेम की निशानी हैं और न ही उन पर पैदा हुआ आकर्षण वास्तविक। अगर फेसबुक का यह प्रेम भी आगे चलकर स्वीकार नहीं किया गया और उसमें यह स्पष्ट कर दिया गया कि दोस्ती का जो अर्थ प्रेम के रूप में निकाला गया है, वह गलत है तो इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों में किसी के जीवन का कोई मतलब ही नहीं रह जाए। इसके कई उदाहरण हैं कि ऐसे उथले आकर्षणों से पैदा हुई यह चाह हमारे समाज में बड़े भयानक अंजाम तक पहुंचती रही है। जिसे चाहा, अगर वह हासिल नहीं हुआ तो युवा इस मामले में दो तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। उनकी पहली प्रतिक्रिया खास तौर से लड़कियों के प्रति यह है कि उन्हें किसी भी तरह से क्षति पहुंचाई जाए। चाहे तो उनके चेहरे पर तेजाब डालकर झुलसा दिया जाए या उनका बलात्कार करके उन्हें एक अभिशप्त जीवन जीने के लिए छोड़ दिया जाए। कुछ और नहीं तो सोशल मीडिया पर लड़कियों की विकृत की हुई अश्लील तस्वीरें डाल दी जाएं ताकि वे समाज में किसी को मुंह दिखाने के काबिल न रहें।

ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए हमारे देश में अब कड़े से कड़े कानून हैं, पर ऐसी प्रतिक्रियाएं रोके नहीं रुक रही हैं। बल्कि अब तो बात प्रेम निवेदन ठुकराने वाली स्त्रियों की हत्या या उन्हें छत से नीचे फेंक देने जैसे हादसे भी हो रहे हैं। इसमें कुछ तो दोष हमारी सामाजिक व्यवस्था का भी है। हैरानी इसे लेकर है कि पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण करते हुए हमने वैलेंटाइंस-डे जैसे पर्व तो अपना लिए हैं, पर यह नहीं समझ पा रहे हैं कि प्रेम का असली अर्थ आखिर क्या है? प्रेम यह नहीं है कि चाहे कुछ भी जाए, वांछित व्यक्ति को हासिल करने की कोशिश की जाए और अगर वह हासिल न हो तो नष्ट कर दिया जा ताकि वह किसी और की न हो सके। यह छीनने वाली संस्कृति है, जिसका समर्थन भारतीय परंपरा नहीं करती है। अवश्य ही इस तरह की सोच के पीछे पश्चिमी शैली का रहन-सहन और सोच है जिसमें बच्चों को यह सीख नहीं दी जाती है कि अगर कुछ मिल नहीं रहा है तो उसे छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहिए। बल्कि जाने-अनजाने इसके उलट सबक दिया जा रहा है कि अगर मांगे से नहीं मिले तो छीन लो। पूरी दुनिया को शांति और प्रेम का सबक देने वाले देश में ये प्रतिक्रियाएं आखिर कहां से आ गई हैं ? कहीं इसके पीछे सिनेमा-टीवी के कार्यक्रमों में हुए सामाजिक विचलनों का योगदान तो नहीं है? या फिर उस बाजारवाद के असर से ऐसा बदलाव हुआ है जिसमें पैसा फेंक कर कुछ भी हासिल किया जा सकता है? ऐसे ही दबावों के कारण प्रेम में नाकामी को लेकर युवाओं की प्रतिक्रिया खुद को आत्महंता बनाने या दूसरों को आहत करने की होती है।

समस्या के एक सिरे पर जहां असहनशील युवा हैं तो दूसरे सिरे पर वह समाज है जो सहज प्रेम को लेकर काफी पाबंदियां लगाता है और जाति-गोत्र की दीवारें खड़ी करता है। हमारे देश में ऐसे संगठनों और पंचायतों की कोई कमी नहीं है जो समय-समय पर नैतिक पहरेदारी का काम बड़े उत्साह के साथ करती हैं। जब-जब इनका जोर चलता है, तब-तब ये पार्कों में दिखने वाले प्रेमी जोड़ों के हाथ-पांव तोड़ने और उनका मुंह काला कर गधे पर बिठाने जैसे कारनामे कर डालते हैं। इसके समांतर कुछ ग्रामीण पंचायतें और कस्बाई संगठन जाति-गोत्र के नाम पर ऐसा कठोर रवैया अपनाते हुए दिखाई देते हैं कि कई युवाओं का सहज-स्वाभाविक प्रेम भी बीच रास्ते में दम तोड़ने को विवश हो जाता है। अगर कोई युवा जोड़ा उनकी अहमियत को दरकिनार कर प्रेम और विवाह करने की कोशिश करता है तो उसके कृत्य को परिवार-समाज की प्रतिष्ठा के विरुद्ध माना जाता है।

ऐसे प्रेमियों से समाज कैसे निपटता रहा है, इसकी मिसाल हाल के वर्षों में गढ़ा गया शब्द ऑनर किलिंग है। सवाल सम्मान की रक्षा का होता है इसलिए ज्यादातर ग्रामीण पंचायतें और कस्बाई संगठन आम तौर पर ऐसी सजाओं के पक्षधर होते हैं। पर समस्या सिर्फ गांव-देहात की नहीं है, तमाम खुलेपन और आज के लाइफस्टाइल की जरूरत बन जाने के बावजूद शहरों में भी प्रेम विवाह को बेमतलब की चीज माना जाता है। कायदे से वहां तो साथ पढ़ने और दफ्तर में साथ काम करने वालों के बीच जाति बंधनों से परे प्रेम और प्रेम विवाह वक्त के कायदों के हिसाब से एक जरूरी चीज बन जाने चाहिए थे, लेकिन इसे लेकर वहां भी विरोध बदस्तूर जारी है। इसलिए अब इस पर विचार करना जरूरी हो गया है कि आखिर प्रेम को लेकर किस तरह की शिक्षा या प्रशिक्षण युवाओं और हमारे पूरे समाज को दी जाए। कैसे वह समझ युवाओं से लेकर समाज में विकसित की जाए ताकि प्रेम को इंसान की एक सहज प्रवृत्ति के तौर पर माना और स्वीकारा जाए। प्रेम में नाकामी जैसी कोई चीज नहीं होती क्योंकि अगर आप प्रकृति की एक सुंदर रचना से प्रेम कर रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि आप पूरी प्रकृति से प्रेम कर रहे हैं। यह सूक्ष्म और दीर्घ दृष्टि का फर्क है, जो प्रेम करने वाले हर व्यक्ति को समझना चाहिए।