चंदर त्रिखा 

वैचारिक धरातल अलग और संवेदना का धरातल बिल्कुल अलग- यह बात गालिब के बाद इस महाद्वीप के सर्वाधिक चर्चित शायर इकबाल पर सटीक बैठती है। यह समझ पाना मुश्किल है कि 1903-04 में ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ सरीखा लोकप्रिय गीत देने वाला शायर 1930 में उसी ‘हिंदोस्तां’ के बीच एक नया मुसलिम राज्य बनाने का प्रस्तावक कैसे बन गया! मगर इकबाल की जीवन-शैली, सृजनात्मकता और चिंतन के समझने का प्रयास करेंगे तो जवाब मिलते जाएंगे।  इन दिनों इकबाल को लेकर दो शिविर बन गए हैं। दोनों के तेवर तीखे हैं। एक इकबाल का पक्षधर है, दूसरा उनके नाम को नेस्तनाबूद करने पर आमादा है। एक तीसरा पक्ष भी है, जो इकबाल की शख्सियत और कृतित्व को उनकी एक प्रबुद्ध महिला मित्र डॉ. आतिया फैजी के गहरे प्रभावों के सांचे में ढालता है। इस वक्त स्थिति यह है कि हमारे कुछ बुद्धिजीवी इकबाल की सृजनशीलता पर कट्टर मुसलिम वैचारिकता का ठप्पा चस्पां करने के लिए बेचैन हैं। इकबाल और उनकी समकालीन प्रबुद्ध मुसलिम लेखक डॉ. आतिया फैजी के बीच पे्रम संबंधों को लेकर अब कुछ नए खुलासे सामने आने लगे हैं, जो समकालीन भारतीय समाज की विसंगतियों को उजागर करते हैं।

वर्ष 1905 में यूरोप में इकबाल और आतिया फैजी की पहली मुलाकात हुई थी। आतिया उन दिनों लंदन में टीचर्स-ट्रेनिंग कॉलेज में पढ़ रही थीं और उनके कुछ लेख भी उन दिनों पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके थे। इकबाल उन लेखों से बेहद प्रभावित हुए और वह विशेष रूप में आतिया से मिलने कैंब्रिज गए और बाद में उनके साथ जर्मनी के हाईडलबर्ग में भी रहे। सियालकोट से कैंब्रिज की इस यात्रा और आतिया के साथ निकट संबंधों के प्रभाव में इकबाल ने अपने भीतर चिंतन के धरातल पर भारी सामाजिक बदलाव भी महसूस किए। 1908 में जब इकबाल भारत लौटे, तो शुरू में उन पर अपनी पत्नी करीम बीबी से अलगाव का जुनून सवार हुआ। आतिया को लिखे गए एक पत्र में इकबाल ने लिखा था, ‘मैंने अब्बा को भी लिखा है कि उन्हें मेरी शादी अपने ही स्तर पर तय करने का कोई हक नहीं था। मैंने यह भी साफ कह दिया है कि मैं करीम बीबी की पूरी-पूरी मदद जारी रखूंगा, मगर मैं उसके साथ अब रह नहीं पाऊंगा।’  उन दिनों फर्ज और चाहत के बीच विभाजित इकबाल ने एक पत्र में लिखा था कि ‘एक इंसान के रूप में हमें अपनी खुशियां चुनने का पूरा-पूरा हक होना चाहिए।’ लेकिन इकबाल अपनी मर्जी की जिंदगी जी नहीं पाए। वह करीम बीबी से तो अलग रहने लगे, लेकिन चाहते हुए भी आतिया से निकाह का प्रस्ताव रख नहीं पाए। इकबाल और आतिया के बीच पत्र-व्यवहार निरंतर चलता रहा। बाद में इकबाल के पे्रम पत्र ‘अल्लामा इकबाल के 101 शाहकार खतूत’ पाकिस्तान की प्रसिद्ध पत्रिका ‘रावी’ ने एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किए।
अपने समय के महान दार्शनिक और क्रांतिकारी शायर माने जाने वाले इकबाल की जिंदगी के विरोधाभास पहले भी चर्चा का केंद्र रहे थे और अब उनकी निजी जिंदगी की परतें भी उधेड़ी जाने लगीं हैं। कुछ वर्ष पहले इकबाल की निजी जिंदगी पर ‘अल्लामा इकबाल- एक महबूबा, तीन बीवियां, चार शादियां’ नाम से डॉ. खालिद सुहेल की एक पुस्तक भी छपी थी।
आतिया ने भी अपनी डायरियों (अब प्रकाशित) में इकबाल का जिक्र सिर्फ एक मित्र नहीं, बल्कि एक ‘आशिक’ के रूप में किया। डायरी के एक पृष्ठ पर आतिया ने यह भी स्वीकार किया कि उनके ‘आपसी रिश्ते एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके थे, जहां पर दोस्ती और पे्रम के बीच अंतर स्पष्ट करना संभव नहीं रहता।’
इकबाल के जीवनी लेखकों के अनुसार दरअसल, उन दिनों वे न केवल अपनी निजी जिंदगी से परेशान थे, बल्कि अपने यहां के सामाजिक, सांस्कृतिक और रूढ़िवादी परिवेश के विरुद्ध भी गहरे रोष से भरे हुए थे।

उन्हीं दिनों मानसिक उद्विग्नता से उबरने के लिए इकबाल ने सरदार बेगम नामक महिला से निकाल कर लिया। मगर निकाह के तत्काल बाद उन्हें कुछ ऐसे अनाम खत मिले, जिनमें सरदार बेगम के निजी चरित्र पर उंगलियां उठाई गई थी। इकबाल पर उन खतों का गहरा असर हुआ और उन्होंने सरदार बेगम से तलाक का फैसला कर लिया। उन्हीं दिनों उन्हें लुधियाना के एक प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. सुभान अली की बेटी मुखतार बेगम से विवाह का प्रस्ताव मिला। लेकिन इकबाल को मुखतार बेगम की कथित सुंदरता के बारे में तारीफें निराधार निकलीं। इकबाल के लिए यह भी एक सदमा था। इकबाल की शायरी में हर उम्र को ढूंढ़ा जा सकता है, मस्जिद और शिवालों को ढूंढ़ा देखा जा सकता है। उन्होंने प्रकृति के सौंदर्य को भी अपनी नज्मों में जगह दी। पहाड़ों, झरनों, नदियों, लहलहाते फूलों की डालियों और जिंदगी के हर उस रंग को अपने कलाम में शामिल किया, जो इंसानी जिंदगी को मुतासिर करता है।  उनकी वतन से मोहब्बत और उसकी फिक्र को इन मिसरों से समझा जा सकता है-  ‘वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है/ तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में/ न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्तां वालो/ तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।’

या फिर ‘गुलामी में न काम आती हैं तदबीरें न तकदीरें/ जो हो जौक-ए-यकीं पैदा, तो कट जाती हैं जंजीरें।’ ‘तराना-ए-हिंदी’ के जन्म की भी एक रोचक कहानी है। बात दरअसल उन दिनों की है, जब लाहौर जैसे शहर में युवाओं के मनोरंजन के लिए यंग्समैन क्रिश्चियन ऐसोसिएशन हुआ करती थी और आमतौर पर बुद्धिजीवी उसी में समय बिताने के लिए जाते थे। एक बार लाला हरदयाल से क्लब के सचिव की कुछ कहासुनी हो गई, जिससे नाराज होकर लाला हरदयाल ने यंगमैंस इंडिया ऐसोसिएशन क्लब की स्थापना की। उस समय लाला हरदयाल गर्वनमेंट कॉलेज लाहौर में एमए के छात्र थे, जिसमें अल्लामा इकबाल दर्शन पढ़ाते थे। लाला हरदयाल के उनसे संबंध काफी अच्छे थे। उन्होंने क्लब के उद्घाटन के मौके पर अल्लामा इकबाल को अध्यक्ष के रूप में निमंत्रण दिया जिसे अल्लामा इकबाल ने सहर्ष कबूल किया। किसी समारोह के उद्घाटन के इतिहास में यह पहला मौका था जब कार्यक्रम के अध्यक्ष ने भाषण देने के बजाय कोई तराना सुनाया हो।

यह तराना पहली बार मौलाना शरर की पत्रिका ‘इत्तेहाद’ में 16 अगस्त, 1904 को प्रकाशित हुआ। यह सबसे पहले ‘हमारा देश’ शीर्षक से और फिर ‘हिंदोस्तां हमारा’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। 15 अगस्त, 19467 को जब देश आजाद हुआ, तो रात के ठीक बारह बजे संसद भवन समारोह में इकबाल का यह तराना ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ भी समूह में गाया गया। आजादी की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इसकी धुन तैयार की। 1950 के दशक में सितारवादक पंडित रविशंकर ने इसे स्वरबद्ध किया। 21 अप्रैल, 1938 को अल्लामा इकबाल ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी मौत के बाद दिल्ली की जौहर पत्रिका के इकबाल विशेषांक में महात्मा गांधी का एक पत्र छपा था, जिसमें उन्होंने लिखा था, ‘डॉ इकबाल मरहूम के बारे में क्या लिखूं, लेकिन मैं इतना तो कह सकता हूं कि जब उनकी मशहूर नज्म ‘हिंदोस्तां हमारा’ पढ़ी तो मेरा दिल भर आया और मैंने बड़ौदा जेल में सैकड़ों बार इस नज्म को गाया होगा।’ १