सिर्फ पच्चीस लोग। और उनमें अधिकांश नब्बे से सौ वर्ष की आयु के बीच। कुछ माह पूर्व यह संख्या बत्तीस थी। उनमें से एक गौतम बजाज पिछली यात्रा में कह गए, ‘अगली बार जब आप आएंगे, तब दस और कम हो जाएगा।’ लेकिन आयु ने उनके आत्मविश्वास, स्मरण, समाज परिवर्तन की लालसा और स्वावलंबन को तनिक भी प्रभावित नहीं किया है। यह है विनोबा भावे द्वारा महाराष्ट्र के पवनार में स्थापित पवनार आश्रम का संक्षिप्त परिचय।
एक समय यह भूदान आंदोलन का केंद्र था। इसके तहत विनोबा ने भूस्वामियों से लगभग चौवालीस लाख हेक्टेयर जमीन भूमिहीनों के लिए दान में प्राप्त किया था। इस मुहिम ने पूरे देश को आंदोलित किया था। यह रचनात्मक आंदोलन एक अपवाद की तरह है। सभी आश्रमवासियों के पास अमूल्य अनुभव है। वे विनोबा के साथ देश के कोने-कोने की यात्रा में शामिल हुए। इस क्रम में संवाद, विमर्श, समर्थन- प्रतिकार से पूर्ण यात्रा के दौरान लोगों की सामाजिक-आर्थिक सोच, समानता, विकेंद्रीकरण जैसे प्रश्न उभरकर आते रहे। दुर्भाग्य है कि किसी विश्वविद्यालय या संस्थान ने इस अनुभव के भंडार को लिपिबद्ध करने की आवश्यकता नहीं समझी। पवनार सिर्फ इतिहास नहीं है। यह एक प्रयोगभूमि है।
इसकी प्रासंगिकता के एक से अधिक कारण हैं। भूदान ने दिखाया है कि अत्यंत जटिल प्रश्नों को सामाजिक पहल से समाधान के करीब लाया जा सकता है। साम्यवादियों ने तब विनोबा पर ‘वर्ग संघर्ष’ को कमजोर करने के लिए कार्य करने का आरोप मढ़ा था। पर वे हल्के साबित हुए। भारत की मानसिकता गैर-बराबरी को नकारती है। इसलिए जब भी कोई सामाजिक सरोकार केंद्रित पहल हुई, उसे अपार समर्थन मिला। बंगाल के ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महाराष्ट्र के महादेव गोविंद राणाडे जैसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने सामाजिक प्रगतिशीलता के सूचकांक को आगे बढ़ाया है। वे सभी लोकप्रिय चेहरे थे, पर प्रचलित राजनीति से दूर रहना उनका स्वभाव था। जब साहित्यकार, समाजशास्त्री, समाज सुधारक और आध्यात्मिक पुरुष इस स्वभाव के साथ कदम आग बढ़ाते हैं, तब उनका प्रभाव कई गुना अधिक होता है। तब वे जन सरोकार को परिभाषित कर पाते हैं। उनकी स्वायत्तता ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। पवनार उसका जीवंत संदेश देता है।
सादगी, सहजता, स्वावलंबन की बात और व्यवहार भारत के कोने-कोने में विद्यमान है। पवनार उन्हीं में एक है। जब नव उदारवादी संस्कृति ने इस हद तक हमारे मस्तिष्क को कैद कर लिया है कि इसके आलोचक भी इसी के दायरे में प्रस्थापित जीवन मूल्यों से चलते हैं, तब ऐसे सूक्ष्म सामाजिक-आर्थिक प्रयोगशालाओं की प्रासंगिकता बढ़ जाती है। आधुनिकता के लिए भोगवादी बनना नवउदारवाद का लक्ष्य होता है। और यही समकालीन सभी संकटों का कारण बनता जा रहा है। परिवार से लेकर वैश्विक स्तर, संस्कृति से लेकर जलवायु तक भस्मासुर की तरह उभर रही समस्याओं का कारण नवउदारवादी दर्शन है। पवनार के लोग इन्हीं जीवन मूल्यों के संशोधन के प्रतीक के रूप में हैं। विश्वविद्यालयों में शोध करने वालों के लिए यह एक उपजाऊ जमीन, जहां वे नई समझ और सामाजिक पहल की चेतना विकसित कर सकते हैं।
आश्रम में स्कूली बच्चे और लोग पर्यटक की तरह आते और चले जाते हैं। इसकी सीमित उपयोगिता है। पवनार-विमर्श अपने आप में एक सार्थक पहल होगी। नब्बे पार करने के बाद उनकी आवाज लड़खड़ाई नहीं है। सोच में कहीं यथास्थितिवाद की झलक तक नहीं है। आगे का भारत उनके आचरण और वार्ता में मूल विषय रहता है। यह ऐसा आयु वर्ग होता है, जब मनुष्य अपने तन-मन पर केंद्रित हो जाता है। पर पवनार का दृश्य ही अलग है। लोगों पर भारत का तन-मन हावी है। पच्चीस लोग, जिनमें दो पुरुष और तेईस महिलाएं अलग अलग प्रांतों और भाषाओं के हैं, वे दशकों विनोबा के साथ रहे थे। आश्रम की पत्रिका ‘मैत्री’ अध्यात्म से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर केंद्रित है। आश्रम की दिनचर्या में अध्यात्म का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रतिदिन विष्णु-सहस्रनाम का पाठ उनमें से एक है।
अध्यात्म के बिना कोई व्यक्ति, विचार या आंदोलन लंबे समय तक अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान नहीं रह सकता है। भारतीय जीवन का यह एक प्रामाणिक खोज समझा जा सकता है। जिस किसी ने इसे किनारे किया है, वह तत्त्ववादी भी आखिर कर्मकांडी बनकर रह गया है। पवनार के लोग आज भी भारतोन्नति के लक्ष्य के प्रति निष्ठावान हैं। यात्रा के क्रम में विनोबा के सहायक बाल विजय जी से वार्ता हुई थी। अब वे सौ वर्ष के हो चुके और वाणी में स्पष्टता नहीं रह गई। उनके अनुभवों को पूरी तरह साझा नहीं कर पाना संभवत: विफलता ही मानी जाएगी। पिछली यात्रा में मेरे मन में यह बचकाना सवाल उपजा, जिसे मैंने गौतम बजाज जी के सामने रखा कि इस आयु वर्ग में प्रवेश करने के बाद आपको चिंता है आश्रम कैसे चलेगा, कौन चलाएगा? उत्तर परिपक्वता और पीढ़ियों पर विश्वास का प्रतीक था। वे कह गए, ‘इस पर हमने कभी सोचा नहीं। ईश्वर के कारण आज चल रहा है। वह जो चाहेगा, वही होगा। हम अपना काम कर रहे हैं।’ इसी को भगवद्गीता में कर्मयोग कहा गया है।
ये बड़े आलीशान चमक-दमक से आभूषित भवनों में रहने वाले और बड़े-बड़े दावे करने वाले लोग नहीं हैं। सूक्ष्म स्तर पर बेनाम होकर एक कोने में धरोहर संजोए पथिक हैं, जिन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि पीछे कितनी भीड़ चल रही है और कितना दान आ रहा है। भीड़ को गिनने और दान का स्तर बढ़ाने में ही सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन उलझकर रह जाता है। पवनार इस उलझन से दूर रहने का संकेत और प्रेरणा भी है। गुणात्मकता के लिए न भीड़ चाहिए न धन आधारित योजना। सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों और ‘एनजीओ’ में फर्क होता है। एनजीओ तात्कालिकता का समाधान ढूंढ़ते हैं। वे भौतिक संसाधनों पर निर्भर रहते हैं। सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन गुणवत्ता के द्वारा चेतना जागृत करते हैं। प्रयोग सूक्ष्म स्तर पर होता है, परिणाम व्यापक होता है। पवनार सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का एक ऐसा ही धरोहर है।
