ताज़ा खबर
 

रविवारीय स्तम्भ

कविता, विचार और विचारधारा

नई कविता और उसके बाद की कविता में भी दो तरह की रचनाएं आर्इं। एक वे, जिनमें नए जीवन की आहट और विडंबना की...

चर्चा- वाद-ग्रस्तता के खतरे

आधुनिक हिंदी कविता में इसके बड़े और प्रामाणिक उदाहरण राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त हैं, जिन्होंने ‘साकेत’ जैसे प्रबंध काव्यों में ऐसी स्वाभाविकताओं तक से...

बाखबर- हुए तुम दोस्त जिसके

बिल्ली के भागों छींका टूटता है। भाजपा को कुछ नहीं करना पड़ता। वह इस अवसर को अपने पक्ष में मोड़ने और गुजरात के विमर्श...

पुरखों की सांस्कृतिक पूंजी

हमारे पुरखों ने तो पानी को तभी ईश्वर मान लिया था, जबसे इस संसार सागर को समझना-बूझना शुरू किया।

वक्त की नब्ज- बर्बरता की हद

अफरोजुल की हत्या राजसमंद में इतनी बेरहमी से की गई थी कि वीडियो देखना मुश्किल था।

दूसरी नजर: भाजपा शासन के बाईस साल बाद गुजरात

1995 से एक के बाद एक भाजपा की सरकारों के बारे में है कि उन्होंने गुजरात की जनता के लिए क्या किया।

बारादरी- आत्महंता हो रहे हैं साहित्यकार

प्रतिष्ठित कथाकार चित्रा मुद्गल का मानना है कि गुटबंदी ने साहित्यकारों को आत्महंता बना दिया है। कुछ आलोचकों ने मान रखा है कि अगर...

बाखबर- गुजरात वाया उत्तर प्रदेश

एक चैनल स्प्लिट स्क्रीन कर एक ओर मोदी की रैली दिखाता है, जिसमें महिलाएं ज्यादा संख्या में दिखती हैं, तो दूसरी ओर हार्दिक की...

तीरंदाज- नागरिक बनाम मतदाता नागरिक

बातचीत के दौरन यह साफ उभर कर आया कि मतदाता अपना फायदा पहले देख रहे थे, चाहे उससे अन्य नागरिकों का नुकसान क्यों न...

वक्त की नब्ज- नौकरशाही यानी गले में पत्थर

नौकरी मिलते ही जिंदगी बन जाती है। घर, गाड़ी, बिजली, पानी सब मिल जाता है अपने सरकारी अधिकारियों को और जहां प्रधानमंत्री को हर...

दूसरी नजर: गुजरात के भूमिपुत्र

प्नधानमंत्री में अपने चुनाव प्रचार का आरंभ यह कहते हुए किया कि वे ‘गुजरात के बेटे’ हैं, और चेतावनी दी कि कोई भी गुजरात...

बाखबर- रौद्र वीभत्स भयानक

कल को कोई खबर बनाएगा तो वह स्टूडियो में दुनाली लेकर आएगा और एंकर उसको ससम्मान पास में बिठाएंगे कि वही न्यूज मेकर है!...

प्रसंगवश- घर बाहर के बीच

घर के साथ नौकरी का जैसा दबाव महिलाओं पर होता है, पुरुष न तो वैसा दबाव झेलते हैं और न ही नियोक्ता से लेकर...

वक्त की नब्ज- खौफ का साया

दो दिन पहले हाफिज सईद को लाहौर की एक अदालत ने रिहा किया इस आधार पर कि उसके खिलाफ ठोस सबूत पेश नहीं हुए...

दूसरी नजर- वे गरीबों को एजेंडे पर ले आर्इं

हर प्रधानमंत्री की सफलताएं और विफलताएं होती हैं। दोनों का आकलन समय-विशेष की पृष्ठभूमि में और उस संदर्भ में होता है जिनमें वे घटित...

पश्चिम की तरफ देखने की प्रवृत्ति

राजनीतिक गुलामी से तो हम सत्तर साल पहले मुक्त हो गए, पर सांस्कृतिक गुलामी की निरंतरता बनी हुई है।

चर्चा- भारतीय साहित्य विश्व साहित्य क्यों नहीं

माना कि बांग्ला, कन्नड़, मलयाली, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं में अच्छा साहित्य रचा गया, मगर प्रश्न यह है कि वह विश्व स्तर पर स्थापित...

बाखबर- इतिहास की मूंछें

चित्तौड़गढ़ के जौहर कुंड वाली जगह में बहुत सारी क्षत्राणियां खड़ी हैं। एक रिपोर्टर पूछती है: आप आज तलवार लेकर क्यों निकली हैं?