रविवारीय स्तम्भ

चर्चा: सपना और सच्चाई

यों तो रोजगार की समस्या अनेक विषयों के साथ हो सकती है, पर जिन कुछ विषयों के साथ अधिक है उनमें संस्कृत भी एक...

जनसत्ता चर्चा: संस्कृत से युगांतर संभव

पिछले कुछ समय से एक बार फिर संस्कृत भाषा को प्रतिष्ठा दिलाने पर जोर है। संसद में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक पारित होने से...

बाखबर: एक महायुद्ध लड़ते हुए

सबसे जोखिम भरे दृश्य पूर्ण बंदी के ऐन बाद दिखे। भयातुर खरीदारों की भीड़ों ने जरूरी ‘डिस्टेंसिंग’ की परवाह नहीं की। पूर्ण बंदी से...

वक्त की नब्ज: समस्या और समाधान

गरीब दिहाड़ी मजदूरों के लिए अगर प्रबंध नहीं कर पाई है सरकार घर वापस जाने की, तो तब क्या कर सकेगी जब इस बीमारी...

तीरंदाज: एक टुकड़ा धूप

उसके सवाल ने मुझे एक पल के लिए अवाक कर दिया। मैं सोच में पड़ गया। चारों ओर से घिरे होने की वजह से...

दूसरी नजर: डरते-डरते जो भी किया, उसका स्वागत

यह खेदजनक है कि 30 जनवरी को जब कोरोना के पहले मामले की पुष्टि हुई थी, तब से तैयारी नहीं करना मोदी सरकार की...

बाखबर: महाजनों की मस्ती, जनता की जान सस्ती

अंत में आए प्रधानमंत्री! देश को समझाया कि कोरोना से जीतने के लिए उनको जनता से दो-तीन चीजें चाहिए : एक संयम और दूसरा...

मु्द्दा: विशेषज्ञों की विशेषज्ञता!

स्वच्छंदतावादी और छायावादी कवियों में कोई अंतर नहीं है। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा इस धारा के प्रमुख कवि...

वक्त की नब्ज: भय के इस माहौल में

प्रधानमंत्री का अगला कदम यही होना चाहिए कि वे राज्य सरकारों के स्वास्थ्य मंत्रियों को दिल्ली बुला कर उनके साथ सलाह-मशविरा करें कि कम...

रविवारी: …फिर पानी दे मौला

रहीम ने बहुत पहले आगाह कर दिया था- बिन पानी सब सून। कुदरती संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के दौर में कवि का दोहा, उसकी...

दूसरी नजर: कोविड 19 से मुकाबला और उसके आगे

मेरा फर्ज है प्रधानमंत्री का समर्थन करना और मैं ऐसा करूंगा। असल में, उन्होंने लोगों से दुश्मन का मुकाबला नैतिक हथियारों से करने को...

चर्चा: राहत की उम्मीद में छोटे उद्योग

भारत जैसे विशाल देश में लोगों की आय बढ़ा कर ही उनकी जेबों में पैसा पहुंचाया जा सकता है। ऐसे में रोजगार पैदा करने...

चर्चा: महिला उद्यमिता की राह

सामाजिक संरचना पितृसत्तात्मक है जो पारिवारिक बंदिशों का कारण बनती है, जिससे महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिल पाती है और उनके प्रबंध कौशल...

तीरंदाज: समय के संदर्भ

पिछले कुछ सालों में ‘वाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ की शागिर्दगी जिस तरह से बढ़ी है, उससे तर्कहीन मेधा का विकास साफ नजर आता है। हम मानें...

बाखबर: कोरोना के मौसम में कविता

कोरोना का कहर इस कदर रहा कि दिल्ली के दंगों और सीएए पर राज्यसभा में हुई बहस तक अगले दिन खबरों में न रही!...

वक्त की नब्ज: चुनौती के बरक्स

जब कोई महामारी का सामना करना पड़ता है तो अक्सर विफल रहती हैं हमारी स्वास्थ्य सेवाएं। याद कीजिए मुजफ्फरपुर के उन बच्चों के अस्पताल...

दूसरी नजर: बैंकिंग नहीं, डकैती

लोगों और संसद को इस बात की मांग करनी चाहिए कि कर्जखोरों के नाम (खासतौर से बड़े कर्जखोर) उजागर किए जाएं और जिन लोगों...

मुद्दा: विषमता के खतरे

क्या कुछ लोगों की समृद्धि वितरणमूलक न्याय को समाज में स्थापित कर सकती है? क्या कुछ लोगों का विकास देश को विकसित राष्ट्र और...

ये पढ़ा क्या?
X