फिर आया चुनावों का मौसम, सो फिर दिखने लगे गांधी परिवार के वारिस। असम में प्रियंका बहन दिखीं चाय बगान में महिला मजदूरों के साथ मुस्करा कर, पीठ पर लटका कर टोकरी काम करने का नाटक करती हुई। बाद में सोशल मीडिया पर उनके ये शब्द दिखे, ‘पल भर में ही उन्होंने मुझे अपना लिया। तमाम दिक्कतों के बाद भी आपका मन निश्चल है। चाय बगानों की इन महिला श्रमिकों के हाथों की अंगुलियां छूकर मैंने देखी। उनमें गांठें पड़ गई हैं। इनके जीवन में थोड़ी राहत पहुंचा पाना ही मेरी राजनीति का धर्म है’।

श्रीमती वाड्रा का इरादा शायद नहीं रहा होगा अपनी राजनीतिक नासमझी साबित करने का इन शब्दों में, लेकिन अफसोस कि कुछ ऐसा ही हुआ। उनके शब्दों से दो बातें सामने आईं। एक यह कि उनकी संवेदनशीलता सीमित थी इन महिलाओं को ‘थोड़ी राहत’ पहुंचाने तक। उनको यह नहीं बताना कि इक्कीसवीं सदी में चाय बीनने के तरीके ऐसे भी हैं, जिनसे उनकी अंगुलियों में गांठें न पड़ें। जिनसे उनको घंटों कड़ी धूप में काम न करना पड़े सिर्फ दो वक्त की रोटी हासिल करने के लिए। दूसरी बात जो सामने आई वह यह कि उनकी राजनीति अभी तक उनकी दादी के जमाने की राजनीति से आगे नहीं बढ़ी है।

इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा जरूर दिया था, लेकिन गरीबी हटाने के बदले उन्होंने अपने लंबे शासनकाल में सिर्फ गरीबों के साथ हमदर्दी जताई। उनको वे औजार कभी नहीं दिए, जिनसे वे खुद गरीबी की बेड़ियों को तोड़ सकें। ये औजार हैं शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार। प्रियंका की समस्या यह भी है कि उनकी माताजी ने भी इसी किस्म की राजनीति में विश्वास रखा। यानी जनता को गरीब रखा जाए, लेकिन उनको राहत पहुंचाई जाए खैरात बांट कर।

अब चलिए बात करते हैं गांधी परिवार के दूसरे वारिस की। राहुल गांधी भी विदेशों में सैर-सपाटे की आदत त्याग कर इन दिनों देश के गांवों और कस्बों में दिखते हैं गरीबों के साथ हमदर्दी जताते हुए। इसी कोशिश में उन्होंने सोशल मीडिया पर एक विडियो डाला पिछले हफ्ते, जिसमें वे दिखते हैं किसी समुद्र तटीय गांव में गांव के कुछ लड़कों के हाथ पकड़ कर समुद्र में छलांग मारते हुए। क्या ऐसा करने से साबित करना चाहते थे दुनिया के सामने कि बेशक वे इस देश के सबसे आला शाही परिवार में पैदा हुए हों, लेकिन उनमें और इस देश के आम नौजवानों में कोई अंतर नहीं है।

चलिए, ऐसा साबित करना चाहते हैं समुद्र में छलांगें मार कर तो कोई हर्ज नहीं है। समस्या उनकी तब शुरू होती है जब वे भाषण देते हैं या किसी बुद्धिजीवी या पत्रकार के साथ बातें करते हैं। उनकी बातों से मालूम होता है कि दो आम चुनाव हारने के बाद भी वे कुछ नहीं सीखे हैं।

सो, पिछले सप्ताह वे दिखे स्वीकार करते हुए कि इमरजेंसी लगा कर उनकी दादी ने गलती की थी। कहा ‘इस बात को तो मेरी दादी ने भी स्वीकार किया था बाद में। सबसे बड़ा झूठ था यह कहना कि इमरजेंसी में लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास नहीं हुआ था, इसलिए कि कांग्रेस ऐसा कर नहीं सकती है। आगे कहा कि ऐसा सिर्फ आरएसएस के लोग कर सकते हैं हर संस्था में अपने लोगों को बिठा कर। राहुल गांधी की यह बात सुनी तो हैरान रह गई।

क्या उनकी राजनीतिक समझ इतनी कमजोर है कि जानते नहीं हैं कि उनकी दादी ने इमरजेंसी लगाने के बाद पूरी तरह हर लोकतांत्रिक संस्था को कमजोर किया था? क्या जानते नहीं हैं कि अदालतों में उन न्यायाधीशों को नजरंदाज किया जाता था, जो इमरजेंसी का विरोध करने का प्रयास करते थे? क्या जानते नहीं हैं राहुल कि इमरजेंसी के दौरान भारत के नागरिकों के मूल अधिकार भी छीने जाने का समर्थन किया था सर्वोच्च न्यायालय ने?

क्या कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता ने उनको नहीं समझाया है अभी तक कि उनकी दादी ने विपक्ष के तमाम राजनेताओं को जेल में डाल दिया था और संसद से जब इमरजेंसी लगाने की इजाजत ली थी, वह सिर्फ नाटक था, क्योंकि विपक्ष की जगह पूरी तरह खाली थी? माना कि नरेंद्र मोदी के दौर में राजद्रोह के मुकदमे उन पर भी चलाए जाते हैं जो देश का विरोध नहीं, सिर्फ सरकार का करते हैं, लेकिन ऐसा कर सकते हैं, क्योंकि ऐसी चीजें कांग्रेस के लंबे शासनकाल में अक्सर हुआ करती थीं। कांग्रेस के पास सत्तर वर्षों में मौका था अंग्रेजों का बनाया राजद्रोह कानून हटाने का, लेकिन ऐसा कभी हुआ क्यों नहीं?

गांधी परिवार के इन वारिसों को देख कर याद आता है कि मोदी क्यों दो बार पूर्ण बहुमत हासिल करके प्रधानमंत्री बने हैं। माना कि उनके दौर में वे आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना साकार नहीं हुआ है, जो उन्होंने दिखाया था देश के मतदाताओं को 2014 में। माना कि उन्होंने उसी घिसे-पिटे समाजवादी रास्ते पर रखा है भारत को, जिसने इस देश को गरीब रखा है, लेकिन साथ में यह भी मानना जरूरी है कि खैरात बांटने के अलावा उन्होंने कई नई चीजें भी की हैं।

स्वच्छ भारत अभियान द्वारा काफी हद तक ग्रामीण भारत में खुले में शौच करने की गंदी आदत कम हुई है। गैस के चूल्हे पहुंचे हैं दूरदराज गांवों में। इंटरनेट की सुविधा आज दिखती है ऐसी जगहों पर जहां सड़कें भी नहीं हैं। और जल शक्ति मंत्रालय बना है सिर्फ इसलिए कि हर घर में नल से जल उपलब्ध करवाया जाए। ये ऐसी चीजें हैं जिनके बिना भारत विश्व गुरु बनने का सपना तक नहीं देख सकता है। ऐसी योजनाएं बहुत पहले बनी होतीं, तो संभव है कि भारत आज अर्द्ध-विकसित देशों की श्रेणी से निकल चुका होता।