महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव में महायुति गठबंधन राज्य में अपने मजबूत वोट बैंक की बदौलत पैठ बना चुकी है। इस चुनाव के बाद अब भाजपा में यह सवाल उठ रहे कि क्या उन्हें अब अजित पवार नेतृत्व वाली नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को साथ लेकर चलता जरूरी है।
बता दें कि महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव में अजित पवार सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन का साथ छोड़ अपने चाचा शरद पवार गुट के साथ चले गए थे। इस चुनाव में अजित न सिर्फ महायुति के खिलाफ लड़े बल्कि उन्होंने भाजपा के कुछ नेताओं पर भी हमला बोला, जिससे भाजपा के वरिष्ठ नेता नाराज बताए जा रहे हैं।
जमीनी स्तर पर विस्तार करने का विचार
हालांकि बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में भाजपा को मेयर पद संभालने के लिए एकनाथ शिंदे गुट वाली शिवसेना के समर्थन की जरूरत है। पार्टी के कुछ नेताओं का मत है कि अब पार्टी का प्रयासों का ध्यान जमीनी स्तर पर विस्तार करने और लगभग 26% वोट शेयर (लोकसभा और विधानसभा चुनावों में) के अलावा 10-15% अधिक वोट हासिल करने पर होना चाहिए।
भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र ने बताया, “आगामी चुनावों में भाजपा, एनसीपी के साथ चुनाव से पहले कोई समझौता नहीं करेगी। शिवसेना के साथ गठबंधन जारी रखना है या नहीं, यह फैसला अगले 3.5 सालों में दोनों पक्षों के संबंधों पर निर्भर करेगा।” पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी का अंतिम लक्ष्य 51% वोट शेयर में से अधिक वोट हासिल करना है।
पार्टी का एक धड़ा अलग होना चाहता
हालांकि राज्य भाजपा का एक धड़ा एनसीपी के साथ अलग होकर पार्टी के संगठनात्मक विस्तार पर ध्यान देने के लिए राजी है। वहीं दिल्ली एनसीपी और एनसीपी (एसपी) के विलय के बाद राजनीतिक संबंध को खुले रखना चाहती है। राज्य भाजपा का एक बड़ा वर्ग महाराष्ट्र के खंडित राजनीतिक परिदृश्य की जटिलता का हवाला देते हुए इस बात से सहमत है।
राज्य के एक भाजपा नेता ने कहा, “गठबंधन की राजनीति से शासन नहीं किया जा सकता और अगर शरद पवार की एनसीपी गुट अजित पवार के साथ सुलह हो जाता है और भाजपा के साथ भी संबंध सुधार लेती है तो इसका स्वागत होना चाहिए। शरद पवार की पार्टी के पास लोकसभा में 8 सांसद हैं। अगर हम उनका समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो भाजपा की एकनाथ शिंदे पर निर्भरता कम हो जाएगी।”
शिंदे गुट से भी समस्या?
एक अन्य भाजपा नेता ने कहा कि पार्टी एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ गठबंधन में, एनसीपी की तुलना में ज्यादा सहज है। हालांकि जब से सरकार सत्ता में आई तो शिंदे को मुख्यमंत्री पद से उतरना पड़ा और उपमुख्यमंत्री पद ग्रहण करना पड़ा और इसे लेकर दोनों पार्टियों के बीच अक्सर टकराव होते रहे हैं। स्थानीय निकाय चुनावों के नजदीक आने के साथ ही यह तनाव और बढ़ गया, और भाजपा ने इसे ही पार्टी के अधिक स्वतंत्र होने के प्रयास का कारण बताया।
भाजपा नेता ने कहा, “चूंकि शिवसेना वैचारिक रूप से भाजपा के हिंदुत्व के साथ जुड़ी हुई है, इसलिए हमें उनसे कोई समस्या नहीं दिखती। लेकिन बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि अगले चुनाव कई दलों के बीच होंगे या महायुति बनाम महा विकास अघाड़ी के आधार पर होंगे।”
एनसीपी का क्या है पक्ष?
एनसीपी भी फिलहाल किसी बड़े बदलाव को लेकर चिंतित नहीं दिख रही। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा कि उनकी पार्टी, एनसीपी (एसपी) के साथ विलय करने पर बात कर सकती है। पर राज्य और केंद्र में वह एनडीए का हिस्सा रहेगी। नगर निगम चुनावों से पहले एनसीपी और भाजपा के बीच तीखी बयानबाजी के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “यह मुद्दा अब खत्म हो चुका है। चुनाव के दौरान कभी-कभी ऐसी बातें हो जाती हैं। हम भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति का हिस्सा हैं और रहेंगे।” बता दें कि उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने अपने सहयोगी पर पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ नगर निकायों में भ्रटाचार का आरोप लगाया, जबकि भाजपा ने उन्हें सिंचाई घोटाले की याद दिलाई थी।
शरद पवार के करीबी एक वरिष्ठ एनसीपी नेता ने कहा, सैद्धांतिक रूप से, एनसीपी और एनसीपी (एसपी) एक थे और एक ही हैं। बंटवारा एक राजनीतिक समझौता है। दूसरा, एनसीपी और एनसीपी (एसपी) दोनों जानते हैं कि उन्हें अपना वोट बैंक बनाए रखने के लिए अंबेडकर, शाहू और फुले की धर्मनिरपेक्ष राजनीति का अनुसरण करना होगा, जिसमें मुस्लिम, दलित और मराठा शामिल हैं। धर्मनिरपेक्ष वोटों के विभाजन को सुनिश्चित करने के लिए भाजपा के लिए भी हमें अलग रखना फायदेमंद होगा। फिर भी, कांग्रेस के विपरीत, एनसीपी या एनसीपी (एसपी) की कोई कठोर वैचारिक पहचान नहीं है। इससे उन्हें भाजपा समेत किसी भी राजनीतिक ध्रुव की ओर या उससे दूर जाने के मामले में लचीला रुख अपनाने में मदद मिलती है।” आगे पढ़िए ‘मुझे एक खास पार्टी को वोट देने के लिए दूसरे जिले ले जाया गया…’, महाराष्ट्र की महिला ने पुलिस में की शिकायत
