Rahul Gandhi Politics: आजादी के आंदोलन के दौरान देश के मुसलमानों के मन में अविश्वास और असुरक्षा का भाव जगाने के लिए साल 1937 में मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस को ‘हिंदू पार्टी’ बताया था। इन्हीं आरोपों और दावों के तहत मुस्लिम लीग ने अखंड भारत के बंटवारे और पाकिस्तान के गठन को अंजाम दिया था। वो कांग्रेस जिसे जिन्ना ने हिंदू कहा था, उस पर ही आजादी के साढ़े सात दशकों बाद सत्तारूढ़ बीजेपी ‘हिंदू विरोधी पार्टी’ होने का आरोप लगाती है, और अयोध्या का राम मंदिर हमेशा से इसके केंद्र में रहा है।

राम और राम मंदिर को लेकर कांग्रेस एक बार फिर चर्चा में आ गई है, जिसके केंद्र में इस बार नेता विपक्ष राहुल गांधी हैं। राहुल गांधी के हाल के फैसलों और बयानों के चलते एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं, कि क्या राहुल गांधी के दौर की कांग्रेस राम के नाम से दूरी बना रही है? सवाल यह भी है कि क्या इस दूरी के बावजूद कांग्रेस बीजेपी से राजनीतिक मुकाबले में सफलता हासिल कर पाएगी या नहीं।

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अयोध्या में संसद की रक्षा समिति के सदस्य

मीडिया से बातचीत में उन्होंने बताया कि रक्षा मंत्रालय की समिति का आधिकारिक दौरा कोच्चि से वाराणसी तक ही निर्धारित था। इसके बाद समिति के सदस्य निजी यात्रा पर प्रयागराज और अयोध्या पहुंचे। राधा मोहन सिंह ने स्पष्ट किया कि अयोध्या आने वालों में केवल चार सदस्य शामिल हैं, जिनमें स्वयं राधा मोहन सिंह, जगदीप, राजीव भारद्वाज और समाजवादी पार्टी के सांसद वीरेंद्र सिंह शामिल हैं। समिति के सदस्य राहुल गांधी के अयोध्या न आने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह उनका व्यक्तिगत विषय है कि वे कहां जाते हैं और कहां नहीं, सभी सदस्य स्वतंत्र हैं और किसी पर कोई बाध्यता नहीं है।

राहुल गांधी को लेकर उठे सवाल

रक्षा समिति अयोध्या पहुंची तो सवाल राहुल गांधी को लेकर एक बार फिर उठे कि आखिर राहुल गांधी ही अयोध्या क्यों नहीं गए? अहम बात यह भी है कि कुछ दिन पहले जब समिति का ये प्रोग्राम डिसाइड हुआ था, तब सवाल पूछा गया था कि क्या राहुल गांधी जाएंगे? इस सवाल के जवाब में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया ने कहा था कि राहुल गांधी जरूर राम मंदिर जाएंगे लेकिन अब राहुल गांधी नहीं गए तो यह मामला गरम हो गया।

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कांग्रेस ने बताया था दुष्प्रचार और भ्रामक

कांग्रेस पार्टी की तरफ से सू्त्रों द्वारा कहा गया कि राहुल गांधी का तो राम मंदिर जाने का कोई प्लान था ही नहीं… इसलिए ‘वे मंदिर नहीं जा रहे’ जैसे बयान गलत और राजनीतिक मकसद से दिए जा रहे हैं। अब एक सवाल यह है कि यह कन्फ्यूजन किसने फैलाया, क्योंकि पहली बार बयान तो कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया की तरफ से ही आया था। बाराबंकी से कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया ने 13 जनवरी को कहा था कि राहुल जल्द ही अयोध्या के राम मंदिर जाएंगे और रामलला के दर्शन करेंगे।

इतना ही नहीं, तनुज पुनिया ने कहा कि जब राम मंदिर का उद्घाटन हुआ था, तो उस समय राहुल गांधी ने खुद कहा था कि मंदिर का निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए वे अधूरे मंदिर में पूजा के लिए नहीं जाएंगे। हालांकि, अब जब तारीख निकल गई तो सवाल कांग्रेस फिर से सवालों के घेरे में आ गई है। जब राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम हुआ था तो कांग्रेस के अध्यक्ष से लेकर राहुल गांधी और वरिष्ठ नेताओं को निमंत्रण भेजा गया था लेकिन कांग्रेस ने उस दौरान आधिकारिक तौर पर अयोध्या न जाने का दावा किया था। इसके चलते कांग्रेस पर बीजेपी ने राम और हिंदू आस्था के अपमान का आरोप भी लगाया था।

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राम का नाम तक नहीं ले रहे राहुल?

संसद ने मनरेगा का नाम बदलकर नए प्रावधानों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरी के लिए नई योजना लागू की है, जिसका नाम ‘वीबी जी राम जी’ है। योजना का नाम बदलने को लेकर कांग्रेस पूरे देश में विरोध प्रदर्शन कर रही है, लेकिन सवाल तब उठते हैं, जब राहुल उस योजना का नाम तक नहीं ले पाते, जिसके खिलाफ वो विरोध कर रहे हैं। सवाल यह भी है कि क्या योजना का नाम ले नहीं पाए, या फिर जानबूझकर नहीं लिया। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है।

राहुल गांधी कार्यक्रम में मौजूद लोगों से पूछते हैं… ‘नाम क्या है, मैं इन लोगों का नाम तक नहीं जानता… जी ग्राम जी, क्या है? ग्राम जी, पता नहीं क्या… मैं नाम ही नहीं जानता…’ राहुल गांधी जब लोगों से योजना का नाम पूछ रहे थे, जब भी राहुल ने जी राम जी नहीं बोला, बल्कि गलत बोला। कुल मिलाकर, राहुल ने राम नहीं बोला, तो नहीं बोला। इसको लेकर कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर तमाम बीजेपी नेताओं ने राहुल पर सवाल उठाए, क्या सच में राहुल को नाम नहीं पता था, या एक सोची समझी रणनीति के तहत राहुल नाम नहीं ले रहे थे, क्योंकि वो राम का नाम तक नहीं लेना चाहते हैं।

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राहुल ने राम नाम से बना ली दूरी?

यहीं से सवाल उठता है, कि क्या राहुल गांधी राम नाम से दूरी बना रहे हैं? अगर ऐसा है, तो इसका मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि संभवतः राहुल बहुसंख्यकों को नाराज कर रहे हैं। साल 2015 से 2018 के दौरान गुजरात से लेकर कर्नाटक मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान तक के विधानसभा चुनावों के दौरान मंदिरों का खूब दौरा किया था। राहुल पूजा अर्चना करते थे, जबकि उनकी तस्वीरें आती थीं लेकिन 2019 के बाद से अचानक राहुल के ये दौरे खत्म से हो गए और वो सिलसिला आज भी जारी है।

साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की हार की समीक्षा को लेकर जब रिपोर्ट बनी थी, तो उस एंटनी कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था कि, पार्टी जनता की नजर में प्रो मुस्लिम हो गई थी। 11 साल बाद जब राहुल गांधी का रवैया बहुसंख्यक आबादी को लेकर नजर आता है, तो सवाल यह उठता है, कि क्या कांग्रे ने उस एंटनी कमेटी की रिपोर्ट को कूड़ेदान में डाल दिया था।

क्या अल्पसंख्यक वोटर्स पर ज्यादा निर्भरता

राजनीतिक विश्लेषक लगातार यह दावा करते रहे हैं, कि राम मंदिर से लेकर बहुसंख्यक वर्ग के धार्मिक मुद्दों को जिस तरह से कांग्रेस पार्टी नजरंदाज कर रही है। उसकी वजह यह है कि पार्टी अपने अल्पसंख्यक वर्ग के वोट बैंक को एकजुट रखना चाहती है, लेकिन सवाल यह है कि केवल अल्पसंख्यक वर्ग के वोट बैंक के दम पर क्या राहुल गांधी की कांग्रेस, बीजेपी जैसी इलेक्शन मशीनरी वाली पार्टी से मुकाबला कैसे कर पाएगी?

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