यह लेख आपके पास न्यूयार्क से आ रहा है। मैं जब भी यहां आती हूं, तो दुआ करती हूं कि किसी दिन अपने भारत में भी ऐसा महानगर बने। दुबई बन सकता है अगर न्यूयार्क जैसा, तो मुंबई, दिल्ली, कोलकाता या चेन्नई क्यों नहीं? दुबई को मैंने देखा है उन दिनों से जब यह मछुआरों का छोटा-सा शहर होता था कोई चालीस साल पहले।

आज कल्पना करना मुश्किल है कि कभी यहां सिर्फ एक-दो ऊंची इमारतें हुआ करती थीं और गिनती के एक दो माल। ऐसा नहीं है कि हमारे महानगर बदले नहीं हैं इस दौरान। बदले हैं जरूर, लेकिन इसलिए कि हमारी नगरपालिकाएं इतनी नाकारा हैं कि हमने इन महानगरों में वे सुविधाएं नहीं दी हैं जिनके बिना महानगर असली महानगर नहीं बन सकते हैं।

हमारे शासक हर स्तर पर इतने काहिल हैं कि अगर उनके काम को आपराधिक कुशासन कहा जाए, तो गलत न होगा। जब भी कोई छोटा शहर बड़ा बनता है, तो शासक ध्यान में इस बात को रख कर चलते हैं कि यहां रहने वाले लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करना उनका सबसे बड़ा दायित्व है। उनके लिए बिजली-पानी जैसी सुविधाएं तो हैं ही जरूरी, लेकिन मेरी राय में इससे भी जरूरी है कि उनके रहने के लिए घर बनें जिनका किराया गरीब भी दे सकें। मगर ऐसा न हमारे बड़े शहरों में होता है न छोटे शहरों में।

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गरीब लोग मजबूर हैं फुटपाथों पर अपने बसेरे डालने के लिए। जब ऐसा करते हैं, तो उनके पीछे पुलिस लगी रहती है जो उनको कूड़े की तरह समेट कर इधर से उधर फेंकती रहती है। उनके बच्चों को उठा कर ले जाती है और उनके जीवन को एक बुरे सपने में तब्दील कर देती है बिना यह सोचे कि फुटपाथों पर रहना उनका शौक नहीं उनकी मजबूरी है।

हमारी नगरपालिकाओं में भ्रष्ट अधिकारी इस हद तक हैं कि उनको चिंता रहती है अपने पेट की, शहर के नागरिकों की कम। इसलिए निर्माण की इजाजत देते हैं उनको, जिनके पास रिश्वत देने की ताकत होती है। ऐसा जानते हुए कि नुकसान सिर्फ शहर का नहीं होगा, पूरे देश का होगा। इस बात को वह अनदेखा करते हैं क्योंकि उनको चिंता रहती है सिर्फ इस बात की कि वे खुद कितना कमा सकते हैं किसी अनियोजित निर्माण की इजाजत देकर। इसलिए हमारे सारे शहर विशाल झुग्गी बस्तियों की तरह दिखते हैं, जिनमें कुछ रिहाइशी और व्यावसायिक इलाके चमकते हैं और जिनके बीच दिखते हैं पांच सितारा होटल तथा माल।

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उनकी लापरवाही का सबसे ज्यादा नुकसान होता है शहर के सबसे गरीब, लाचार और बेबस नागरिकों का। मैं जिस दिन न्यूयार्क पहुंची थी मुझे फोन आया मुंबई के एक राजनेता का। उसने सोशल मीडिया पर मेरी एक ट्वीट देखी थी, जिसमें मैंने जिक्र किया था एक औरत का, जिसने अपनी सारी जिंदगी गुजारी है मुंबई के फुटपाथों पर। मैं उसको तब से जानती हूं जब वह छोटी बच्ची थी। फुटपाथ पर पली और बड़ी हुई, फुटपाथ पर उसकी शादी हुई और वहीं उसके बच्चे भी पैदा हुए थे।

पहली दो लड़कियां थीं और वह चाहती थी कि उनका जीवन उसके अपने जीवन से बेहतर हो, तो मेरी मदद से इन दोनों लड़कियों को एक निजी संस्था में डाला जो लावारिस बच्चों के लिए कुछ पारसी लोग चलाते हैं। बच्चियां बड़ी हो गई हैं, पढ़-लिख गई हैं, लेकिन उनकी मां अभी तक वहीं की वहीं है, जहां थी और उसका अब एक तीन साल का बेटा भी है।

जिस दिन मैं न्यूयार्क आ रही थी उसका फोन आया मुझे मुंबई की एक पुलिस चौकी से। उसने रोते हुए बताया कि पुलिसवाले उसको उठा कर लाए हैं और उसके बच्चे को ‘चिल्ड्रन होम’ में डालने की धमकी दे रहे हैं। यह ‘चिल्ड्रंस होम’ सरकारी है और उसमें बच्चों का इतना बुरा हाल है कि तकरीबन जेल जैसा माहौल है जहां तीन साल का बच्चा अगर बच जाए, तो गनीमत है।

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मैंने पुलिसवालों से मंगला को रिहा करने को कहा, तो एक पुलिसवाली मुझे उल्टा डांट कर कहने लगी कि किसी को इजाजत नहीं है फुटपाथ पर रहने की। मैंने जब उसे बताया कि ये लोग चालीस साल से रह रहे हैं उसी फुटपाथ पर, तो उसने कहा कि अब उनको जाना होगा वहां से। मैंने जब पूछा कि कहां जाएं, तो उसने कहा कि इससे उसको कोई मतलब नहीं है।

यानी बेघर होना अपराध है मुंबई में, लेकिन गरीबों के लिए कम किराए वाले घर नहीं होना अपराध नहीं है। जेल भेजे जाते हैं लाचार गरीब लोग और शान से रहते हैं भ्रष्ट अधिकारी। जिस राजनीतिक ने मुझे फोन किया मेरी सोशल मीडिया की पोस्ट पढ़ कर, उसने कहा कि थाने से उसकी बात हुई है और उनका कहना है कि इनको इसलिए हटाया जा रहा है, क्योंकि यह जेब काटने जैसे गलत काम करते हैं और चलते-फिरते लोगों को तंग करते हैं। मैंने उसको आश्वासन दिया कि ये पैसा कमाते हैं फूल बेच कर और छोटे-मोटे काम करके। उनका अपराध सिर्फ बेघर होने का है।

ऐसे लोगों को पुलिस गिरफ्तार करती है, ताकि मुंबई की गुरबत सड़कों पर न दिखे। पिछले पैंतीस सालों से मैं इनके बारे में लिखती आई हूं, लेकिन आज तक किसी भी प्रशासन ने ऐसे रैन बसेरे नहीं बनाए हैं, जिसमें ये लोग शरण ले सकें और किराए ये लोग दे नहीं सकते हैं। न ही अपने गांव वापस जा सकते हैं, क्योंकि वहां का जीवन मुंबई के फुटपाथों के जीवन से बदतर है। जाएं तो जाएं कहां? तकरीबन यही हाल है उन मजदूरों का जो मुंबई और दिल्ली आते हैं दूर देहातों से नौकरी करने। ऐसा कभी न्यूयार्क जैसे में भी होता था, लेकिन सौ साल पहले। हमारे शहर कब न्यूयार्क जैसे बनेंगे?