तमिलनाडु का खेल ‘फिल्मी’! बंगाल का खेल ‘इल्मी’! एक पूर्व ‘थलैवा’ का ! दूसरा ‘नए थलैवा’ का! एक ‘थलैवा’ की नई फिल्म ‘रिलीज’! दूसरे थलैवा की सेंसर में अटकी …। तुरंत ‘आंसू पोंछ’ पार्टी का तौलिया आगे कि ‘थलैवा’ तुम संघर्ष करो, हमारा ‘राष्ट्रीय थलैवा’ तुम्हारे साथ है। फिल्म जारी हुई न हुई, लेकिन एक ‘थलैवा’ के समर्थन के बहाने देश को एक ‘राष्ट्रीय थलैवा’ उर्फ ‘राष्ट्रीय नायक’ मिल गया।

एक खुंदकी ने कहा कि जब ये देश ‘राष्ट्रीय थलैवा’ के लिए एक ‘मुकम्मल राष्ट्र’ ही नहीं, तो ‘राष्ट्रीय थलैवा’ कैसे…? और यह ‘राष्ट्रीय थलैवा’ थलैवा हो न हो, लेकिन जिस शान से उनका एक वीडियो जारी हुआ, वह जरूर मजेदार था।

शुरुआत एकदम धांसू थी, एकदम रजनीकांत की ‘एंट्री’ की याद दिलाते हुए अपना ‘राष्ट्रीय थलैवा’ का एक हेलिकाप्टर के घूमते पंखों और शोर के बीच मुस्कुराते हुए धीमी गति से गुजरना, उसको किसी बड़े ‘सुपर स्टार’ से कम नहीं दिखाता था…।

निंदक फिर भी लगे रहे और कहते रहे कि यह कैसा राष्ट्रीय नायक है, जो अब तक एक के बाद कई चुनाव हार या हरा चुका है।

अरे भई, ये क्या बात हुई! आप ही के एक नेता ने लाइन दी थी कि ‘हार नहीं मानूंगा रार नई ठानूंगा…’ अब अपने ‘राष्ट्रीय थलैवा’ हार-हार कर भी अपनी ‘हार’ नहीं मान रहे और हर दिन नई से नई ‘रार’ ठाने रहते हैं, तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है न!

मगर जिस तरह से मुंबई तथा अन्य शहरों के निगमों के चुनाव की खबरें चैनलों में आई, उनसे लगा मानो पूरे महाराष्ट्र का चुनाव हो रहा हो। तर्क सिर्फ ‘पैसे’ का था कि ‘बृहन्मुंबई नगर निगम’ का बजट किसी छोटे-मोटे राज्य के बजट के बराबर है और इसीलिए सारी लड़ाई एक ‘संपन्न महानगर’ के ‘कामकाज’ पर नियंत्रण की है।

चुनाव अभियान में एक गठबंधन कहता रहा कि वो मुंबई की मराठी पहचान को बचाने के लिए लड़ रहा है, तो दूसरा कहता रहा कि हमें मुंबई को हांगकांग से भी आगे का नगर बनाना है… कि इसी बीच एक गठबंधन ने आरोप लगाया कि मतदान के दौरान मतदाता की अंगुली पर लगाई जाने वाली ‘स्याही’ मिटाई जा सकती है, तो चुनाव आयोग की ओर से जवाब आया कि यह संभव नहीं और जब सोलह तारीख को परिणाम आने लगे और महायुति आगे निकलने लगी, तब आयोग से खबर आई कि आगे से चुनाव में इस ‘स्याही’ का उपयोग नहीं होगा।

मगर, उस ‘हरी फाइल’ में क्या था? इस सवाल ने उस विपक्षी दल की तेज-तर्रार नेता का पीछा नहीं छोड़ा। जब मामला सुप्रीम कोर्ट में आया, तो पक्ष-विपक्ष की जिरह के बाद सुप्रीम कोर्ट की ‘टिप्पणी’ बड़ी खबर की तरह मंडराती रही। एक चैनल ने तो इसे विपक्षी दल पर एक ‘करारा तमाचा’ कहा, क्योंकि अदालत ने कहा कि उस दिन कोलकाता में जो कुछ हुआ, वह ठीक नहीं था। सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप अनुचित था। बहसों में फिर भी ‘विपक्षी प्रवक्ता’ सरकारी कामकाज में इस ‘हस्तक्षेप’ को भी ‘दल के हित में’ बचाव करते रहे।

इस सबके बावजूद हिंदुत्व के पक्ष-विपक्षी एक-दूसरे पर गोले दागते रहे। एक गैर हिंदुत्ववादी ने फरमाया कि राम ‘समाजवादी’ थे, तो दूसरे बोले, ये ‘बहक’ गए हैं… ऐसे ही गत सप्ताह जितनी खबर हिंदुत्व की ‘स्वत:स्फूर्त ब्रिगेड’ ने बनाई, उतनी ‘आधिकारिक हिंदुत्ववादियों’ ने नहीं बनाई।

इसी तरह एक स्वामीजी ने फरमा दिया कि ‘संघ’ न होता, तो हिंदू न बचते…।

इसी बीच जैसे ही एक प्रवक्ता ने कहा कि मुंबई का मेयर कोई हिजाब वाली भी बन सकती है, वैसे ही चुनाव सांप्रदायिक रंग ले उठा। एक कहिन कि मुंबई का महापौर ‘मराठी’ होगा, तो दूसरे ने कहा, फिर मुंबई का मेयर ‘मराठी-हिंदू’ होगा…।

इस बीच दो वार्ताएं याद करने लायक दिखीं। एक थी एंकर द्वारा ‘हिंदुत्ववादी चिंतक’ के साथ ‘हिंदुत्व’ में आते अक्षर ‘त्व’ पर बातचीत और दूसरी थी ‘एआइ ब्लू मशीन’ से की गई बातचीत। ‘हिंदुत्व’ पर एक बहस कोलकाता से शुरू हुई जहां ‘सेकुलर ब्रिगेड’ ने ‘हिंदुत्व’ को अपने तरीके से ‘नीचे’ किया, तो जवाब में ‘हिंदुत्ववादियों’ ने ‘हिंदुत्व’ के पक्ष को ‘ऊपर’ किया। तर्क वही रहे, जवाब भी वही रहे, फर्क रहा तो यह कि बहस एक वैचारिक स्तर पर बनी रही… रोज की ‘तू-तू मैं-मैं’ नहीं बदली… और ‘एआइ’ की बहस में इस ‘मशीन’ ने भी माना कि वह मनुष्य की तरह ‘संवेदना’ नहीं रखती। उसे ‘दुख दर्द’ नहीं होता… वह वही करती है, जो उसे ‘सिखा’ दिया जाता है। इस बहस में एंकर जीतता हुआ दिखा और ‘एआइ मशीन’ हारती दिखाई दी।

फिर एक दिन ‘आप’ के एक सांसद ने ‘दस मिनट में सामान पहुंचाने वाले कर्मियों’ का चोला पहन कर उनसे हमदर्दी दिखाई और उनकी ‘मांगों’ को सबके सामने रखा।

जब अगले दिन सरकार ने घर सामान पहुंचाने वाले कर्मियों के कल्याण के लिए, कंपनियों द्वारा ‘दस मिनट में ‘सामान पहुंचाने’ की गारंटी’ हटाने की बात कही, तो ‘आप नेता’ ने इसके लिए सरकार का तुरंत ‘धन्यवाद’ कर श्रेय ले लिया।

गत शुक्रवार चुनाव परिणामों ने साफ कर दिया कि ‘नरम ठाकरे’ के साथ ‘गरम ठाकरे’ के आने का नुकसान हुआ। सभी विश्लेषक कहे कि ‘गरम ठाकरे’ की लाइन जनता ने नहीं सुनी। दंड ‘नरम ठाकरे’ को झेलना पड़ा…। सच! ‘ये है मुंबई मेरी जान’!