OPINION, MEDITATION
विचार: सूचनाओं के अंबार में ‘शून्य’ के अभाव की ओर बढ़ता मनुष्य

सूचना विस्फोट और एआई तकनीक के साझा प्रभाव से मनुष्य के सामने उपजी चिंताओं पर विचार कर रहे हैं लेखक…

तलपति विजय की तस्वीर के साथ ‘वंदे मातरम्’, सनातन विवाद और राजनीतिक विरोध का प्रतीकात्मक दृश्य।
‘वंदे मातरम्’ से ‘सनातन’ विवाद तक, तलपति विजय की चुप्पी ने क्यों चौंकाया?

भले ही तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री तलपति जोसेफ विजय के शपथ समारोह के शुरू में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ गाया गया…

भारतीय संस्कृति, मंदिर, लोक परंपराओं और आधुनिक शहरी जीवन के बीच ‘स्वैच्छिक अज्ञानता’ को दर्शाता प्रतीकात्मक दृश्य।
भारत की विविधता से दूर होती नई पीढ़ी, अपनी विरासत को जानने की जिज्ञासा क्यों खो रही है?

मैक्समूलर ने 1882 में अपने भाषणों की शृंखला में बताया था कि ‘भारत: हमें क्या सिखा सकता है’, तो एलएम…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गिरते आर्थिक ग्राफ, गैस सिलेंडर और ‘अच्छे दिन’ से ‘संकट की घड़ी’ तक का प्रतीकात्मक दृश्य।
‘अच्छे दिन’ से ‘संकट की घड़ी’ तक? अब जनता से संयम की अपेक्षा, चुनाव के समय क्यों नहीं दी गई थी यही चेतावनी

भारत में अंग्रेज जब राज करते थे, तो उन्होंने भी अपने लिए बनाए थे बड़े-बड़े घर, ताकि उनकी शान हम…

पी. चिदंबरम की तस्वीर के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था, गिरते ग्राफ, रुपये और महंगाई से जुड़ा प्रतीकात्मक दृश्य।
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर पी. चिदंबरम के तीखे सवाल, विदेशी निवेश से महंगाई तक उठाए मुद्दे

प्रधानमंत्री ने जनता से कई उपाय करने को कहा है। चूंकि प्रधानमंत्री को यह नहीं दिखा कि उनके मंत्री अपने…

दुख से आगे कृतज्ञता का उजाला, जीवन को नए अर्थ देती सकारात्मक दृष्टि | दुनिया मेरे आगे

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें संध्या राजपुरोहित के विचार।

पर्यावरण की फिक्र के समांतर दायित्व
प्रदूषण, बाजार और बदलती आदतों के बीच पर्यावरण संकट, जिम्मेदारी सिर्फ आम लोगों की नहीं | विचार

कुशाग्र राजेंद्र अपने इस लेख में बता रहे हैं कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां ज्यादातर बड़े…

मणिपुर तीन साल से हिंसा की आग में झुलस रहा है।
तीन साल बाद भी क्यों नहीं थम रहा मैतेई-कुकी संघर्ष? हिंसा की आग में फिर मणिपुर | संपादकीय

हाल ही में उग्रवादियों ने एक बार फिर हमला कर तीन लोगों की हत्या कर दी। कांगपोकपी जिले में अंधाधुंध…

इन परीक्षाओं में हर वर्ष लगभग 80 लाख अभ्यर्थी शामिल होते हैं, जो कभी-कभी एक करोड़ से अधिक तक पहुंच जाते हैं।
विचार | क्या अब बदल जाएगी भारत की प्रवेश परीक्षा व्यवस्था? NEET 2026 विवाद के बाद बड़ा सवाल

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के पूर्व अध्यक्ष एम. जगदेश कुमार अपने इस लेख में बता रहे हैं नीट जैसी महत्त्वपूर्ण…

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