मिलने-जुलने का संदर्भ आमतौर पर इस तरह देखा जाता है कि हम अपने घर-परिवार से लेकर मित्रों-परिचितों और अन्य लोगों से भेंट-मुलाकात, बातचीत और विचार-विमर्श करते हैं और उससे समाज का एक ऐसा दायरा बनाते हैं, जो हमारे अपने लिए भी जीवन-तत्त्व का वाहक बनता है। मगर हमारे भीतर क्या कोई ऐसा कमरा है, जहां हम अपने आपसे मिलते हैं? आज के समय में यह प्रश्न थोड़ा अनुपयुक्त-सा लगता है, क्योंकि हमारे चारों ओर इतने लोग हैं- दोस्त, परिवार, दफ्तर, भीड़, समुदाय और अब तो मोबाइल की स्क्रीन पर हर समय कोई-न-कोई किसी रूप में उपस्थित रहता है।

मगर इस सारी उपस्थिति के बीच क्या हमने कभी यह देखा है कि हम अपने भीतर कहां रहते हैं? किस जगह लौटते हैं, जब शब्द थक जाते हैं, जब शोर भारी हो जाता है, जब हम किसी को कुछ समझा नहीं पाते और किसी से कुछ सुन नहीं पाते? उस जगह का नाम ही शायद हमारे भीतर का अकेला कमरा है।

ऐसा लगता है कि हम सबके भीतर एक ऐसा स्थान होता है, जहां कोई भूमिका नहीं होती। न बेटा, न पिता, न मित्र, न नेता, न अधिकारी, न लेखक, न उच्च, न निम्न। बस केवल हम होते हैं, मानो धरती के नीचे बहती शांत, गहरी और सच्ची जलधारा। वहां कोई शोर नहीं होता, जिससे हम ध्यान भटका सकें। वहां कोई प्रशंसा नहीं होती, जो हमारी थकान पर फूल रख दे। कोई रोशनी नहीं होती, जो रास्ता दिखा दे। वहां हम ही होते हैं, अपने सबसे सच्चे रूप में। शायद इसी कारण हम उस कमरे को लंबे समय से टालते आ रहे हैं।

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यह कमरा हममें से बहुतों के जीवन में धीरे-धीरे बंद होता जा रहा है। या फिर इस तरह भर गया है कि भीतर प्रवेश की जगह ही नहीं बची। हमने अपने जीवन को इतनी भागदौड़, इतने संकेतों, उत्तरदायित्वों और इतनी अपेक्षाओं में बांध लिया है कि हम अपने भीतर की शांति से दूर होते चले गए हैं। आज हममें से बहुत लोग दूसरों के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन अपने लिए नहीं। कभी-कभी सुबह की चाय के साथ या रात को सोने से पहले एक क्षण आता है जब मन हल्का-सा ठहरता है, लेकिन उसी क्षण हम फोन उठा लेते हैं, खुद से बचने के लिए, क्योंकि अपने भीतर लौटना कठिन है।

दरअसल, हमारे भीतर का अकेला कमरा डर का स्थान नहीं, पुनर्मिलन का स्थान है। वहीं हम सीखते हैं कि जीवन केवल लक्ष्य नहीं, अंतरयात्रा भी है। वहीं समझ में आता है कि दुख कोई कमी नहीं, मन का तापमान है और खुशी कोई उपलब्धि नहीं, मन की खुली खिड़की है। वहीं यह भी ज्ञात होता है कि हम दुनिया में चाहे जैसा दिखें, हम भीतर से बहुत साधारण, बहुत मानवीय, बहुत नाजुक हैं। इस नाजुक होने को स्वीकार करना ही सबसे बड़ी शक्ति है। समाज हमें लगातार कहता है कि दिखाओ, बनो, साबित करो, आगे बढ़ो, बोलो, लेकिन हमारे भीतर का कमरा धीरे से कहता है- रुको, सुनो, समझो, स्वीकार करो।

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यह स्वीकार करो कि हम पूर्ण नहीं हैं, हम थकते हैं, हम टूटते हैं, हम खो जाते हैं, हम गलत होते हैं। और यही वह क्षण है जहां मन पर पड़ी धूल हटती है और हम अपने आप से मिलते हैं। भले हमारी दुनिया तेज हो जाए, रफ्तार बढ़ जाए, उपलब्धियां मिल जाएं, नाम और प्रशंसा बढ़ जाए, लेकिन हम अपने भीतर नहीं लौटते, तो जीवन कहीं न कहीं अधूरा रह ही जाता है, क्योंकि पूर्णता उपलब्धि से नहीं, अपने भीतर के संबंध से पूरी होती है।

यह कमरा कोई पहाड़ की गुफा नहीं, न किसी तीर्थ का स्थान, न कोई दायर्शनिक प्रयोगशाला। यह बस एक क्षण है, एक श्वास, एक मौन। जो हम खुद को देते हैं। इस मौन में हम फिर से अपने भीतर रहने वाले मनुष्य को देखते हैं। वही मनुष्य, जो प्रेम कर सकता है, दुख को समझ सकता है, माफ कर सकता है, लौट सकता है। यही लौटना किसी भी विकास, प्रगति, सफलता से कहीं बड़ा, कहीं सच्चा होता है।

आज योजनाबद्ध होते जीवन के प्रत्येक चरण में मन को समझने की कोई योजना नहीं होती। हम मन को या तो नजरअंदाज कर देते हैं या उसे समझाने की कोशिश करते रहते हैं, बिना उसे सुने। अक्सर ऐसा होता है कि जब हम शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक रूप से थक जाते हैं। तब मन खुद ही इस कमरे का दरवाजा खोल देता है। मौन में रखा हुआ मन हमसे पूछता नहीं, बस याद दिलाता है कि ‘तुम्हें इतना भी अकेला नहीं होना चाहिए कि तुम खुद से दूर हो जाओ।’

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हमारे भीतर का कमरा वह जगह है, जहां दुख भी अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देता है। वहां दुख न बड़ा होता है, न छोटा। दुख बस दुख होता है।और जब कोई मनुष्य दुख को दुख की तरह देख लेता है, बिना कहानी बनाए, बिना दोष दिए, बिना भागे हुए, तो दुख धीरे-धीरे ऐसा शांत जल बन जाता है, जिससे मन फिर से जगा हुआ महसूस करता है।

अपने जीवन में समय हमें यह सिखा देता है कि रिश्तों का स्थायित्व हमारे पास नहीं होता, लेकिन अपने भीतर लौटना हमेशा हमारे पास होता है। यही कारण है कि जो व्यक्ति अपने भीतर के कमरे को पहचान लेता है, वह अकेला रहकर भी अकेला नहीं होता। यह अकेलापन नहीं, अंतर की संगति है। इसी संगति में मन, अपने ही भीतर, आखिरकार घर पा लेता है।