भाजपा कहिन कि कांग्रेस में जनतंत्र नहीं। कांग्रेस कहिन कि भाजपा में जनतंत्र नहीं। अपने जनतंत्र का यही विचित्र तंत्र है कि है भी, नहीं भी! नया वर्ष आ रहा था, लेकिन संवाददाता खांस रहे थे। कोई अक्षरधाम पर खांस रहा था, कोई धौला कुआं पर हांफ रहा था। एक चैनल ने स्क्रीन पर आठ खिड़कियां खोल दी थीं और सभी में सारा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र धुंधला नजर आ रहा था। फिर एक शाम ‘नेशन फर्स्ट’ चैनल का एंकर परंपरागत भक्तिभाव को त्यागकर ‘अरावली’ को बचाने निकल पड़ा। कई दिन तक वह सरकार को निशाने पर लेता रहा… जब मुद्दा जम गया, तब छोड़ा।
फिर आई इंदौर में सरकारी महकमे से प्रदत्त प्रदूषित पानी पीकर बच्चों और लोगों की मौत की खबरें और देखते-देखते अधिकतर चैनल मध्य प्रदेश सरकार और मंत्री को कठघरे में खड़ा करते रहे। अपने राष्ट्रवादी एंकर ने तो मंत्री को तुरंत हटाने की मांग तक कर डाली। एक ने तो मंत्री को ‘अपराधी’ तक बताया।
कई चैनल फिल्म ‘धुरंधर’ की ‘बल्ले बल्ले’ करते रहे कि फिल्म ने कुछ ही दिनों में एक हजार करोड़ से अधिक की कमाई कर सारे कीर्तिमान तोड़ दिए… वह ‘शोले’ के बाद सबसे बड़ी फिल्म है, उसमें ‘राजनीतिक यथार्थ’ और ‘कला’ का अद्भुत संगम है..! तो भी ‘धुरंधर’ की हर बहस कला बरक्स ‘प्रोपेगेंडा’ के बीच फंसती रही।
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एक कथन कि यह ‘मुसलिम विरोधी’ प्रोपेगेंडा है, तो दूसरा कथन कि यह मुसलिमों के खिलाफ एक ‘सांस्कृतिक परियोजना’ है। लेकिन एक ने कहा कि जिसे आम जनता हाथोहाथ ले रही हो, जिसे मुसलिम भी पसंद कर रहे हों, उसे कोई ‘सांस्कृतिक परियोजना’ कहे, तो ऐसे में क्या कहा जाए?
इस बीच एक से एक ‘विभाजनकारी’ कहानी बांग्लादेश देता रहा। आए दिन किसी हिंदू की भीड़ के हाथों हत्या की खबरें हिलाती रहती हैं। चैनलों की बहसों में कई नेता इन हत्याओं पर इस तर्क के साथ जवाब देते रहते हैं कि जो बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहा है, वही भारत में मुसलमानों पर हो रहा है।
एक उकसावेबाज बोला कि भारत सरकार वहां के हिंदुओं को बचाने के लिए कोई ‘आपरेशन सिंदूर’ क्यों नहीं करती! फिर एक दिन लखनऊ के ताजा उद्घाटित ‘प्रेरणा स्थल’ से गमलों की चोरी की खबर ने राष्ट्रमंडल खेलों के दिनों की याद दिला दी। तब गमला चोरों का दिल्ली में प्राकट्य हुआ था।
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ऐसे ही एक दिन दिग्विजय जी पर शायद भूत सवार हो गया और उनके मुखारविंद से कुछ वचन फूट निकले कि संघ की कार्यपद्धति अच्छी… मैं संघ की विचारधारा का विरोधी हूं! लेकिन संघ की ‘कार्य पद्धति’ उसके विचार से ही तो निकली है, तब काहे का विरोध सर जी!
इसी बीच एक इस्लामी विद्वान शमाइल नदवी कई चैनलों पर अवतरित हुए। इसका श्रेय उस बहस को जाता है, जिसमें ‘ईश्वर’ के अस्तित्व को लेकर ‘नदवी बरक्स-जावेद अख्तर’ बहस कराई।
उधर मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने वाले हुमायूं कबीर हर शुक्रवार को अपना मुंह खोलते हैं और जवाब में कल तक के मंदिर विरोधी ‘मंदिर मंदिर’ जपने लगते है कि सिलीगुड़ी में ‘महाकाल मंदिर’ बनाएंगे और कि ‘दुर्गा आंगन’ सरकारी कोष से बनाएंगे। इसे देख हुमायूं ने पूछा कि मंदिर के लिए सरकारी धन क्यों?
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फिर एक शाम एक चैनल ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों का दल ‘एसआइआर’ को लेकर चुनाव आयोग से मिला, लेकिन बाहर आकर तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने संवाददाता सम्मेलन में ‘बातचीत’ के बारे में कम और चुनाव आयोग द्वारा ‘अंगुली दिखाने’ के बारे में ज्यादा बताया।
बहसों में चर्चक कहे कि बंगाल का आगामी चुनाव ‘घुसपैठियों’ के मुद्दे पर लड़ा जाना है। तृणमूल कांग्रेस कहती है कि ‘घुसपैठियों’ के लिए केंद्र जिम्मेदार है, तो गृहमंत्री ने स्पष्ट किया कि बंगाल सरकार तारबंदी के लिए जमीन नहीं देती, इसलिए जहां तारबंदी नहीं है, वहीं से घुसपैठिए घुसते हैं।
इतने पर भी ममता दीदी ने ‘दुर्याेधन’ और ‘दुशासन’ को ललकार दिया! लेकिन ‘एसआइआर’ ने नई मतदाता सूची के शुरुआती आंकड़ों के जरिए यह संकेत देकर, कि सभी राज्यों में वोट कटने हैं, उत्तर प्रदेश में तो दो करोड़ से अधिक कटने हैं, तो किसी राज्य में साठ-सत्तर लाख वोटर कटने हैं, सभी दलों के पेट में मरोड़ पैदा कर रखी है।
और चलते-चलते भी शाहरुख खान द्वारा बांग्लादेश के क्रिकेटर मुस्तफिजुर रहमान को 9.20 करोड़ रुपए में अपनी टीम ‘केकेआर’ के लिए खरीदकर एक विवाद को अनजाने ही जन्म दे दिया। एक हिंदूवादी नेता ने शाहरुख को ‘गद्दार’ तक कह दिया। एक एंकर ने कहा कि भारत के विदेश मंत्री खालिदा जिया को श्रद्धांजलि देने बांग्लादेश गए, तो क्या वे भी ‘गद्दार’ हो गए! इसी बीच कुछ बाबा कूद पड़े। फिर कुछ मौलाना भी कूद पड़े… नया अखाड़ा खुला..!
