अच्छा लगता है मुझे जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि 2047 तक भारत पूरी तरह विकसित देश बन जाएगा। बहुत अच्छा लगता है इसलिए कि हर भारतीय का यही सपना है और मेरा भी है, लेकिन जब लोग मरते हैं गंदे पानी की वजह से हमारे सबसे स्वच्छ शहर में, तो यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि हमारे इस सपने को साकार होने में सिर्फ बीस साल और लगेंगे। इंदौर में जो हुआ, किसी हाल में न होता अगर अर्ध-विकसित देशों की श्रेणी में भारत पहुंच गया होता। महीनों से शिकायतें दर्ज हो रही थीं कि पानी के एक पाइप को बदलने की जरूरत है, लेकिन जैसा अक्सर होता है इस बात पर, उन लोगों ने ध्यान नहीं दिया जिनकी जिम्मेदारी थी समस्या का तुरंत हल ढूंढना।

आपने भी शायद देखा होगा वह वीडियो, जिसमें एक पत्रकार मंत्रीजी से पूछता है जहरीला पानी पीने से लोगों के मरने के बारे में और मंत्री की प्रतिक्रिया। गुस्से में कैलाश विजयवर्गीय पत्रकार को कहते हैं कि ऐसे सवालों के जवाब उनसे नहीं पूछे जाने चाहिए। पत्रकार ने साहस दिखा कर मंत्रीजी को कहा कि इस तरह के शब्द एक वरिष्ठ मंत्री के मुंह से नहीं निकलने चाहिए, लेकिन मंत्री ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा। जब कुछ दिन बाद एक एसडीएम ने अपने आदेश में मंत्रीजी के उस शब्द का जिक्र किया, तो उसको निलंबित कर दिया गया। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय वही हैं जिनके बेटे ने कुछ साल पहले एक सरकारी अधिकारी पर बल्ला उठा कर हमला करने की कोशिश की थी। गिरफ्तार तो हुए थे मंत्रीजी के बेटे, लेकिन विशेष अदालत ने उनको रिहा कर दिया था इस आधार पर कि पुलिस आरोप सिद्ध करने में असफल रही थी।

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इंदौर के जहरीले पानी के लिए कुछ छोटे-मोटे अधिकारी बर्खास्त किए गए हैं, लेकिन मंत्री को कुछ नहीं होगा। बावजूद इसके कि वे शहरी कार्य मंत्री हैं। जब तक इस तरह की गलत परंपराएं रहेंगी अपने देश में, यकीन के साथ कहा जा सकता है कि भारत अगले चालीस वर्षों तक भी विकसित देश नहीं बन सकता है। इंदौर में जो हुआ कम से कम सुर्खियों में रहा कुछ दिनों तक। इस तरह की अनेक घटनाएं होती हैं, जिनकी बात तक नहीं होती है मीडिया में। इसलिए कि ऐसे हादसे होते हैं उन बीस फीसद भारतीयों के साथ जो गरीब हैं और जिनके जीवन उतने ही बेहाल हैं जितना अति-गरीब अफ्रीकी देशों में रहने वालों का होता है।

शर्मनाक सच्चाई है यह, लेकिन इसको छुपाने से अपना देश बेहतर नहीं होने वाला है। परिवर्तन तब आएगा, जब हम अपने शासकों को याद दिलाते रहेंगे बार-बार कि उनका ध्यान जाना चाहिए उन शहरी बस्तियों की तरफ और उन अति-पिछड़े गांवों की तरफ जहां रहते हैं भारत के गरीब। मुंबई में रहती हूं, तो रोज दिखते हैं मुझे ऐसे लोग जो या तो फुटपाथों पर अपना पूरा जीवन गुजारते हैं या ऐसी गंदी बस्तियों में, जहां न साफ पानी होता है, न साफ वायु, न अच्छे स्कूल और न स्वास्थ्य सेवाएं। मुंबई जैसे महानगर में किराए इतने अधिक हैं कि बीच शहर में अगर एक ‘खोली’ मिल जाए, तो मासिक किराया तीस हजार रुपए से कम नहीं होता है। नतीजा यह कि पांच सितारा होटलों में नौकरी करने वाले मुलाजिम भी झुग्गी बस्तियों में रहने पर मजबूर हैं।

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माना कि देश में गरीबों की संख्या काफी हद तक कम हुई है, लेकिन अभी भी गरीबी और गंदगी की समस्या इतनी ज्यादा है कि इंदौर जैसी घटनाएं होती रहेंगी। महानगरों में हर दूसरे-तीसरे दिन खबर मिलती है कि किसी सीवर को साफ करते समय लोगों की मृत्यु हो गई है। मगर आज तक ऐसी किसी घटना के बाद सुनने में नहीं आया है कि नगरपालिका ने सुरक्षित उपकरण उन लोगों के लिए अनिवार्य कर दिए हों जो हमारे सीवर साफ करने के लिए मजबूर हैं।

अब पूछिए कि हालात सुधरते क्यों नहीं हैं, तो मेरा जवाब यही होगा कि जब तक ऊपर तक अधिकारियों और नेताओं को दंडित नहीं किया जाएगा, तब तक परिवर्तन नहीं आने वाला है। विकसित देशों में मंत्री जेल भेजे जाते हैं जब उनकी लापरवाही के कारण लोग मरते हैं। हमारे देश में ऐसा नहीं होता है इसलिए कि हमारे प्रशासनिक तरीके अभी तक बिल्कुल वैसे हैं जैसे हुआ करते थे ब्रिटिश राज में। अभी तक प्रशासनिक सुधारों की कोशिश सिर्फ यह हुई है कि पासपोर्ट लेना आसान हो गया है पहले से। बिजली के बिल भरने आसान हो गए हैं। अन्य छोटी-मोटी सुविधाओं के लिए हमको आला अधिकारियों के सामने भीख नहीं मांगनी पड़ती है। मुझे याद हैं आज भी वे दिन जब रसोई गैस का सिलेंडर तभी मिलता था, जब किसी सांसद तक पहुंच होती थी। सांसदों के कोटा होते थे जो वे अपने दोस्तों और परिवारवालों में बांटते थे जैसे बहुत बड़ा अहसान उन पर कर रहे हों। अपने घर में टेलीफोन लगवाना इससे भी ज्यादा मुश्किल हुआ करता था।

इन चीजों में फर्क आया है तकनीकों में आधुनिकता आने के कारण। लेकिन जहां भी आधुनिक तकनीकों से काम नहीं बनता है, वहां वही हाल देखने को मिलता है आज भी जो दशकों पहले था। हमारे मंत्री और आला अधिकारी रहते हैं बिल्कुल वैसे, जैसे रहा करते थे अंग्रेज हुकुमरान। उनके लिए बड़ी-बड़ी कोठियां हैं जिनमें कभी गंदे पानी की समस्या नहीं होती है। बिजली चली जाए, तो जनरेटर होते हैं इनकी कोठियों में। इसलिए बहुत जल्दी भूल जाते हैं कि वे जन प्रतिनिधि हैं, राजा नहीं। इनको ठीक करना हो, तो सबसे पहले इनको सरकारी कोठियों से निकालना होगा ताकि रहने लगे उन बस्तियों में जहां रहते हैं वे लोग जिन्होंने उनको अपनी सेवा के लिए अपना कीमती वोट दिया है। सरकारी आवास देने की प्रथा बंद हो।