पहले कहे कि तय नहीं कि चुनाव लड़ेंगे या नहीं लड़ेंगे, लेकिन रट वही कि चौदह को ‘सुशासन बाबू’ जा रहे हैं। विपक्षी प्रवक्ता सुशासन बाबू को ‘बीमार, अक्षम, लाचार’ आदि बताते नहीं अघाते, लेकिन एक दिन यही कथित ‘बीमार लाचार’ सुशासन बाबू अचानक घोषणा कर देते हैं कि हर महिला को छोटे-मोटे घरेलू व्यवसाय में मदद के लिए दस हजार रुपए देंगे और सफल होने पर दो लाख और देंगे। अचानक ‘साइकिल का जादू’ याद आने लगता है। प्रतिक्रिया में विपक्षी नेता दस हजार की जगह तीस हजार देने का एलान कर देते हैं। इसके बाद ‘इतना कहां से दोगे… कहां से दोगे’ होने लगता है। कई संवाददाता ‘दस हजारी’ औरतों के वचन सुनाने लगते हैं कि हां, दस हजार मिले हैं… हम तो सुशासन बाबू को वोट देंगे।
संवाददाता बताते रहे कि विपक्ष द्वारा बताई गई ‘सत्ता विरोधी लहर’ नहीं नजर आती। अगर वह है, तो लोगों की नाराजगी नजर नहीं आती। फिर दिल्ली-पटना के ‘डबल इंजन’ की सक्रियता, नेताओं की जन सभाएं, लाखों कार्यकर्ताओं का ‘बूथ प्रबंधन’, बहुत से केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों-विधायकों आदि का गली-मुहल्ले जाकर प्रचार करना। उसके बरक्स विपक्ष का ‘आराम तलब’ प्रचार और अपनी असफलता का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ने की आदत ने ऐसा नतीजा दिया कि मतदान की शाम दस में से मतदान पश्चात नौ सर्वेक्षण बताने लगे कि सुशासन बाबू फिर आ रहे हैं!
और जिस दिन परिणाम आए, उस दिन यह साफ हो गया कि बिहार में ‘डबल इंजन’ की सरकार आ रही है और जब सब नतीजे आ गए तो जीतने वालों को भी झटका लगा, क्योंकि एक ओर उनको 243 में से 202 सीट और जीत के लिए आश्वस्त विपक्ष की स्थिति बुरी हो गई। साथ ही ‘एकला चलो’ वाले का ‘किंग मेकर’ बनने की जगह ‘शून्य सीट’ पाना।
एक चर्चक ने कहा कि विपक्ष को तो नेताओं ने हराया। रही-सही कसर ‘हार’ की मनमानी व्याख्याओं ने कर दी। हारने वाले वाले अब तक रो रहे हैं कि उन्हें चुनाव आयोग द्वारा की गई ‘चुनाव चोरी’, ‘दस हजार’ की रिश्वत और ‘गोदी मीडिया’ ने मिलकर हराया और इन्हें ‘जिताया’!
कई पत्रकार, कई कथित विश्लेषक भी बताते रहे कि हम चुनाव में शहर-शहर घूमे हैं। विपक्ष के पास न पूरे ‘बूथ अधिकारी’ थे, न पर्याप्त प्रचारक थे, न कोई पक्की रणनीति थी, आत्मविश्वास था। कुछ कहते थे कि लोग बदलाव चाहते हैं। वे सोचते रहे कि बिहार में गरीबी है, बेरोजगारी है, पलायन है। लोग ‘हिंदू-मुसलिम’ करने वालों को, ‘मनुवादियों’ को पसंद नहीं करते। लेकिन चला दूसरों का फार्मूला। कुछ कहते थे कि उनमें सत्ता की भूख है। वे चुनाव दम लगाकर लड़ते हैं। एक-एक बूथ एक-एक वोटर की गिनती रखते हैं। जहां कमजोरी हो, उसे ठीक करते हैं। पिछली हार से सीखकर आगे बढ़ते हैं और लचीले हैं।
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जीत-हार के कारणों पर विचार करते कई विश्लेषकों द्वारा अपने ‘नित्य निंदनीय’ की चुनाव लड़ने की रणनीति की तारीफ सुनकर हमें आश्चर्य हुआ। एक ही ‘वैचारिक स्कूल’ के दो नामी पत्रकारों की ‘भिड़ंत’ से साबित हुआ कि ‘जीतने वालों’ ने चुनाव कैसे जीता। एक को यह चुनाव ‘चोरी’ नजर आया तो दूसरे ने बताया कि यह ‘चोरी’ नहीं ‘अर्जित’ था। वह स्वयं बिहार के गांव-शहर घूमा है और उसने पाया कि जीतने वालों के बड़े से बड़े नेता, सांसद, केंद्रीय मंत्री किस तरह लोगों के बीच परचा बांटते, अब तक के किए काम का प्रचार करते और नए तेज विकास के लिए जनता से वोट देने का आग्रह करते नजर आए। खुद गृहमंत्री ने एक जिले में एक रात डेरा डालकर एक स्वतंत्र पत्रकार से जानकारी हासिल की और प्रचार-अभियान में आई कमियों को दुरुस्त किया तथा वहां की सीटों पर जीत हासिल की। दोनों पक्ष की कार्यशैली में फर्क था।
इस बीच, जीतने वालों ने अपने मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और मंत्रियों को शपथ तक दिला दी और जीत के सबसे बड़े रचनाकार ने शपथ समारोह में अपना गमछा फहरा दिया। इससे पहले धन्यवाद भाषण में यह कह कर कि ‘गंगा बिहार से होकर बंगाल जाती है’, बंगाल को हिला दिया। फिर तमिलनाडु में यह कह कर कि ‘बिहार की हवा उनसे पहले तमिलनाडु पहुंच गई’, तमिलनाडु की राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी और एक संकेत भी दे दिया कि पुरातन पार्टी में फिर से दो फाड़ हो सकता है।
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट के कुछ पूर्व जजों, प्रशासकों व सेनाधिकारियों आदि ने चुनाव आयोग के खिलाफ चलाए जाने वाले अभियान पर आपत्ति करते हुए कहा कि कुछ लोग आयोग और संस्थाओं को ही कमजोर करने पर तुले हैं, यह ठीक नहीं है। दूसरी ओर, विपक्ष के नेता ‘एसआइआर’ के विरोध में एक ‘जन आक्रोश रैली’ निकालने जा रहे हैं और कुछ आयोग वालों को प्रत्यक्ष तौर पर निशाना बनाने की बातें कहने लगे हैं।
