पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस और वामपंथी दल एक बार फिर दुविधा में हैं कि उन्हें साथ चुनाव लड़ना चाहिए या नहीं। राज्य में लंबे समय से टीएमसी और भाजपा के बीच सीधी टक्कर का माहौल बना हुआ है, जिसमें कांग्रेस और सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम दल लगातार कमजोर होते गए हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन को लेकर विवाद और टीएमसी से जुड़ी चुनावी रणनीतिकार कंपनी आई-पैक पर ईडी की कार्रवाई के बाद भी संकेत यही हैं कि मुख्य मुकाबला फिर टीएमसी और भाजपा के बीच ही रहेगा।
ऐसे में कांग्रेस और वाम दलों के सामने सवाल है कि गठबंधन उन्हें फायदा देगा या और नुकसान। 2021 में दोनों ने साथ चुनाव लड़ा था, लेकिन नतीजा बेहद निराशाजनक रहा था—कांग्रेस और वाम दोनों ही एक भी सीट नहीं जीत पाए थे और गठबंधन को सिर्फ एक सीट मिली थी, जो उनके सहयोगी इंडियन सेकुलर फ्रंट ने जीती थी। आजादी के बाद यह पहला मौका था जब वामपंथी दल बंगाल विधानसभा से पूरी तरह बाहर हो गए थे।
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इसी अनुभव के चलते कांग्रेस की बंगाल इकाई में मतभेद साफ दिख रहे हैं। राज्य कांग्रेस अध्यक्ष सुभंकर सरकार समेत एक धड़ा मानता है कि लंबे समय तक गठबंधन पर निर्भर रहने से पार्टी का संगठन कमजोर हुआ है और अब उसे भविष्य को ध्यान में रखते हुए अकेले चुनाव लड़ना चाहिए, भले ही यह रास्ता कठिन हो।
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि पिछले दो दशकों में कांग्रेस कई इलाकों में अपना झंडा और चिन्ह तक नहीं पहुंचा पाई, जिससे उसका आधार सिमटता गया। दूसरी ओर, वामपंथी दल भी कांग्रेस को अपने लिए बोझ मानते हैं और मानते हैं कि 2016 के बाद उनका बड़ा वोट भाजपा की ओर खिसक गया, जिसकी एक वजह कांग्रेस के साथ गठबंधन भी रहा।
इसके साथ केरल का सवाल भी है, जहां कांग्रेस और सीपीआई (एम) एक-दूसरे के कट्टर विरोधी हैं और बंगाल में हाथ मिलाने से केरल में भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलने की आशंका है। हालांकि कांग्रेस के कुछ नेताओं का यह भी मानना है कि बंगाल में दोतरफा मुकाबले में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए वाम दलों के साथ जाना मजबूरी हो सकती है। बावजूद इसके, सब जानते हैं कि अंतिम फैसला राज्य इकाइयों का नहीं, बल्कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का होगा, जो गठबंधन के पक्ष में भी जा सकता है।
