महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों के लिए 15 जनवरी को वोट डाले गए। 16 जनवरी को वोटों की गिनती होगी। 29 नगर निगमों में कुल 3.48 करोड़ मतदाता और 2,869 वार्ड हैं, जिसमे 15,931 उम्मीदवार मैदान में हैं। हालांकि पूरी चुनावी प्रक्रिया के बीच राज्य चुनाव आयोग (SEC) विपक्षी दलों के निशाने पर रहे। वोटिंग तो काफी हद तक शांतिपूर्ण रही, लेकिन चुनाव आयोग को कई फैसलों की वजह से आलोचना झेलनी पड़ी है। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर खराब कम्युनिकेशन, प्रशासनिक मनमानी और पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया है।

सुर्खियों में रहा स्याही विवाद

वोटिंग के दिन कई शिकायतें आईं। इसमें ऑनलाइन पर्ची जेनरेट करने के बावजूद वोटरों को वोट देने से रोकना और बीजेपी के गणेश नाइक जैसे सीनियर नेताओं का उन बूथों पर वोटर लिस्ट में अपना नाम न मिलना शामिल है, जहां वे सालों से वोट देते आ रहे थे। हालांकि गणेश नाइक एक मंत्री भी हैं। ऐसे में अधिकारियों के दखल के बाद वह वोट देने में कामयाब रहे। लेकिन सभी वोटर्स की इतनी पहुंच नहीं है।

राज ठाकरे ने लगाया बड़ा आरोप

वहीं एक शिकायत आई कि वोटिंग के बाद लगाई गई पक्की स्याही आसानी से मिट रही थी। MNS प्रमुख राज ठाकरे ने आरोप लगाया, “मौजूदा सिस्टम सिर्फ विरोधियों को खत्म करने और सत्ताधारी पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहा है। जब हमने पहले डबल वोटिंग का मुद्दा उठाया था, तो प्रशासन ने शुरू में इसे खारिज कर दिया था, लेकिन अब उसने डबल वोटरों की लिस्ट पब्लिश की है। यह पूरी प्रक्रिया एक धोखा है।”

राज ठाकरे ने यह भी दावा किया कि चुनाव प्रणाली को सरकार के पक्ष में फिक्स किया गया था। उन्होंने कहा, “आज यह बिल्कुल अलग दिख रहा है। स्याही की जगह पेन लाए गए हैं और उनसे लगाई गई स्याही मिट रही है। ये एक स्वस्थ लोकतंत्र के संकेत नहीं हैं। इस तरह के धोखे वाले चुनाव कराना और इस तरह सत्ता हासिल करना जीत नहीं कही जा सकती। सत्ता के दुरुपयोग की भी एक सीमा होनी चाहिए।”

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एकनाथ शिंदे ने दिया जवाब

वहीं इस विवाद पर जवाब देते हुए उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि उन्होंने राज्य चुनाव आयोग के कमिश्नर सुरेश काकानी से बात की। शिंदे ने कहा, “कमिश्नर ने मुझे बताया कि यह स्याही कई सालों से इस्तेमाल हो रही है। पहले स्याही बोतल से लगाई जाती थी। अब इसे सीधे मार्कर से उंगलियों पर लगाया जाता है। कुछ टीवी चैनलों ने एक्सपेरिमेंट किए और पाया कि स्याही तुरंत नहीं मिटती है। चुनाव आयोग ने यह सुनिश्चित करने का ध्यान रखा है कि कोई फर्जी वोटिंग न हो। चुनाव प्रक्रिया बहुत पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए।”

उम्मीदवारों के हलफनामों को अपलोड करने में देरी का मामला भी उठा

चुनाव आयोग पर उम्मीदवारों के हलफनामों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने में देरी का आरोप भी लगा। इलेक्शन कमीशन ऑफ़ इंडिया द्वारा कराए गए चुनावों के उलट, SEC और नगर निगम की वेबसाइटों पर एफिडेविट अपलोड करने में साफ तौर पर देरी हुई। आपराधिक मामलों, संपत्ति, देनदारियों और एजुकेशनल क्वालिफिकेशन की जानकारी वाले एफिडेविट नॉमिनेशन बंद होने के कई दिनों बाद अपलोड किए गए और कुछ मामलों में तो वोटिंग के दिन के करीब अपलोड हुए। ऐसे में राजनीतिक पार्टियों ने सवाल उठाया कि जब उम्मीदवारों को सख्त समय सीमा के अंदर एफिडेविट जमा करने थे, तो कमीशन ने सार्वजनिक जानकारी देने के लिए वैसी ही सख्त समय सीमा का पालन क्यों नहीं किया?

विवादों में रहा आखिरी 48 घंटों में घर-घर जाकर प्रचार

पोलिंग से पहले आखिरी 48 घंटों में घर-घर जाकर प्रचार करने की चुनाव आयोग की इजाजत से राजनीतिक हंगामा मच गया। इससे राज्य भर में पैसे बांटने की खबरें आने लगी। हालांकि चुनाव आयोग ने ऐलान किया था कि 13 जनवरी को शाम 5.30 बजे पब्लिक कैंपेनिंग खत्म हो जाएगी, लेकिन उसने उम्मीदवारों को उस डेडलाइन के बाद भी घर-घर जाकर मिलने की इजाजत दे दी। (यह भी पढ़ें- 1931 से लेकर अब तक कौन-कौन बना BMC का मेयर, यहां देखें पूरी लिस्ट)

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा, “अब तक सभी चुनावों में आधिकारिक कैंपेनिंग खत्म होने के बाद एक गैप होता था। परंपरा के अनुसार वोटिंग से एक दिन पहले कोई कैंपेनिंग नहीं होती थी। इस परंपरा को तोड़ दिया गया है। चुनाव आयोग सरकार की मर्जी के हिसाब से काम कर रहा है। अगर पर्चे नहीं बांटे जा सकते, तो क्या पैसे बांटे जा सकते हैं? यह इजाज़त अब क्यों दी जा रही है?”

राज्य चुनाव आयुक्त दिनेश वाघमारे ने इस फैसले का बचाव करते हुए फरवरी 2012 के चुनाव आयोग के एक आदेश का हवाला दिया, जो पब्लिक कैंपेन खत्म होने के बाद घर-घर जाकर प्रचार करने की इजाज़त देता है। वसई, डोंबिवली, ठाणे, चेंबूर, पनवेल, अकोला, नागपुर, पुणे और पिंपरी चिंचवड़ से पैसे बांटने और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच झड़पों के आरोप लगाने वाली रिपोर्ट और वीडियो भी सामने आए।

PADU मशीनों की हुई शुरुआत

चुनाव आयोग को बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) द्वारा मुंबई में गिनती के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली प्रिंटिंग ऑक्सिलरी डिस्प्ले यूनिट (PADU) मशीनों की शुरुआत को लेकर भी आलोचना का सामना करना पड़ा। विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया कि इस फैसले की जानकारी पोलिंग से कुछ दिन पहले और बिना ठीक से सलाह-मशविरा किए दी गई। हालांकि गिनती कराने की ज़िम्मेदारी BMC की है, लेकिन चुनाव आयोग की आलोचना इसलिए हुई कि वह राज्य में चुनावों के लिए सुपरवाइजरी अथॉरिटी होने के बावजूद मशीनों के बारे में जानकारी ठीक से नहीं फैला पाई।

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वोटों की अलग-अलग गिनती भी बना मुद्दा

एक और विवादित कदम मुंबई में वोटों की अलग-अलग गिनती की इजाजत देने का फैसला था। सिविक अधिकारियों ने कहा कि हर रिटर्निंग ऑफिसर के तहत एक बार में दो वार्डों के वोटों की गिनती की जाएगी, जो लगभग 20 निर्वाचन क्षेत्रों की देखरेख करता है। दो वार्डों की गिनती पूरी होने के बाद, अधिकारी अगले सेट पर जाएंगे। हालांकि BMC ने तर्क दिया कि इससे मैनपावर को एक जगह लगाकर गिनती आसान होगी, लेकिन विपक्षी पार्टियों ने इस बदलाव की ज़रूरत पर सवाल उठाया। कांग्रेस विधायक असलम शेख ने पूछा, “अचानक सिस्टम बदलने का क्या मतलब है, जो सालों से इस्तेमाल हो रहा है?”

चुनाव आयोग को निर्विरोध चुनाव को लेकर भी आलोचना का सामना करना पड़ा। लगभग 69 उम्मीदवार, जिनमें ज़्यादातर सत्ताधारी गठबंधन के थे, वह निर्विरोध चुने गए। ये पिछले चुनावों की तुलना में सात गुना ज़्यादा है। हालांकि चुनाव आयोग ने बाद में कहा कि वह इन वार्डों में विजेताओं की घोषणा करने से पहले नगर निगमों से रिपोर्ट मांगेगा, लेकिन विपक्षी पार्टियों का तर्क है कि अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।

आचार संहिता के उल्लंघन के मामले आए सामने

विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग पर आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया। चुनाव प्रचार के दौरान सांप्रदायिक बयानबाजी के बावजूद आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की। उसने तर्क दिया कि कोई खास शिकायत नहीं मिली है। इससे पहले दिनेश वाघमारे ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया था, “अगर यह मीडिया में छपा है और हमारे संज्ञान में लाया गया है, तो आचार संहिता के नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।”