चार दिन पहले कानपुर में एक अखबार ने लिखा, भैरो (श्मशान) घाट में 24 घंटे में 476 शवों की अंत्येष्टि हुई। अगले दिन कानपुर के जिलाधिकारी ने कहा कि सिर्फ तीन मौतें हुई हैं। जनता मीडिया की बात मानती आई है और जानती आई है कि प्रशासन हमेशा मौतों को छिपाता है।
हो सकता है कि अखबार से कोई चूक हो गई हो लेकिन यह भी सच है कि लगभग हर शहर में अंत्येष्टि स्थलों में होने वाली शवों की गिनती और सरकारी गिनती में फर्क बना ही रहता है। इस बीच कोरोना से हो रही मौतें छिपाने की बात देश के दूसरे अखबार और न्यूयॉर्क टाइम्स और गार्जियन जैसे विदेशी अखबार भी कर रहे हैं। गार्जियन के कोविड से मरने वालों की एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जिन्होंने अपना टेस्ट कभी कराया ही नहीं और उनकी मौत हो गई। ऐसी मौतों को कोविड की मौत के साथ शायद कभी नहीं जोड़ा जाएगा।
अखबार ने अपनी बात उदाहरण के साथ कही है। राजग्राम में दवा के दुकानदार नूरुल अमीन को कोविड के लक्षणों की जानकारी थी। लेकिन जब वह बीमार पड़ा तो वह खुद को सामान्य खांसी का भुलावा देता रहा। अंततः उसकी मौत हुई। गांव की एक टीचर का कहना है कि ऐसी मौतों की संख्या दस है।
ब्रिटिश अखबार ने गांवों और शहरी गरीबों की गंदी बस्तियों का जिक्र करते हुए कहा है कि इन स्थानों पर जागरूकता नहीं। ऐसे में कितने लोग जांच कराते हैं कुछ पता ही नहीं। एक यह सत्य भी है कि मौजूदा वक्त में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो चाह कर भी अपना कोविड टेस्ट करा ही नहीं पा रहे हैं। प्राइवेट लैब्स ने जांच करना बंद कर रखा है। और, सरकारी केंद्रों पर अनाप-शनाप भीड़ उमड़ रही है जहां किसी कोविड पीड़ित या बुखार पीड़ित का इस चटक धूप में घंटों लाइन लगना संभव नहीं। ऐसे लोग भी जब दम तोड़ते हैं तो उनको भी कोविड मौतों की श्रेणी में कैसे डाला जाएगा।
कमोबेश ऐसी ही बातें न्यूयार्क टाइम्स ने भी लिखी हैं। उसने मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भ्रमर चटर्जी से बात की। महामारियों का यह विशेषज्ञ कहता है कि हिन्दुस्तान में आंकड़ों का हत्याकांड चल रहा है। भारतीय मूल के चटर्जी हिन्दुस्तान में कोरोना काल में चल रही गतिविधियों पर बारीक नजर रखते हैं। उनके मुताबिक मरने वालों की असली संख्या सरकार की बताई गिनती से दोगुनी और यहां तक कि पांच गुनी भी हो सकती है।
इस अमेरिकी पेपर ने अहमदाबाद के शवदाह ग्रह में काम करने वाले शख्स सुरेश से भी बातचीत की। सुरेश ने कहा कि मुर्दों की इतनी लंबी लाइन उसने कभी नहीं देखी। वह मृतक के परिजनों को अंत्येष्टि का कच्चा प्रमाणपत्र भी देता है। किसी भी प्रमाणपत्र में मौत का साफ कारण यानी बीमारी का नाम नहीं होता। सबमें एक ही बात लिखी होती हैः मौत का कारण बीमारी। सुरेश खुद बीमारी शब्द लिखता है। अनाम बीमारी।
अखबार ने मिर्जापुर, लखनऊ और भोपाल से भी ऐसी ही जानकारी दी है। ऐसा ही एक किस्सा अहमदाबाद का है। रूपल ठक्कर कोविड पॉज़िटिव थी। शल्बी अस्पताल में भर्ती की गईं। 16 अप्रैल को ऑक्सीजन लेवल गिरा और वे बचाई न जा सकीं। अस्पताल ने सार्टिफिकेट में लिखाः अचानक हृदयगति रुकने से मौत।
