Climate Change News: आमतौर पर तापमान में थोड़े उतार-चढ़ाव को मौसम के लिहाज से एक सामान्य स्थिति माना जाता है, लेकिन इस वर्ष हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी में जिस तरह की देरी देखी गई, उस पर स्वाभाविक ही पर्यावरणविदों का ध्यान गया है। हालांकि अब पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी और बारिश हुई है और इसकी वजह से देश के मैदानी क्षेत्रों में भी तापमान में गिरावट की संभावना जताई गई है।

मगर इस वर्ष पहाड़ी राज्यों में जिस तरह मौसम के मिजाज में बदलाव देखा गया, बर्फबारी की सामान्य अवधि में देरी हुई, उसका सीधा संकेत यही था कि अब जलवायु परिवर्तन का असर प्रत्यक्ष रूप में सामने आने लगा है।

देरी से हुई बर्फबारी

दरअसल, लंबे इंतजार के बाद शुक्रवार को उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में वर्ष का पहला हिमपात हुआ। इसी तरह हिमाचल प्रदेश के शिमला और कश्मीर में भी उम्मीद के मुकाबले करीब दो महीनों की देरी के बाद पहली बर्फबारी हुई। इसकी वजह से कड़ाके की ठंड अपने ज्यादा असर के साथ वापस लौट आई।

हिमालयी प्रदेशों में आमतौर पर नवंबर-दिसंबर में इस तरह के मौसम की संभावना होती है। इसे एक सामान्य चक्र माना जाता है, जिसके असर से दिल्ली और उत्तर भारत के राज्यों में ठंड बढ़ती है। मगर इस बार अब जाकर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में बर्फबारी हुई है और इसके मद्देनजर भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने दिल्ली सहित उत्तर-पश्चिमी भारत के मैदानी इलाकों के न्यूनतम तापमान में तीन से पांच डिग्री गिरावट होने की संभावना जताई है।

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लौट सकती है कड़ाके की ठंड

जाहिर है, इन क्षेत्रों में एक बार फिर कुछ दिनों के लिए कड़ाके की ठंड लौट सकती है और इसी के मुताबिक लोगों को थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत पड़ेगी। मौसम की अपनी गति होती है और कई कारणों से उसकी अवधि आगे-पीछे हो सकती है।

अगर इसके पीछे वजहें प्राकृतिक हों, तो यह ज्यादा चिंता की बात नहीं होती। मगर इससे इतर इस बार जिस तरह हिमालय के बड़े इलाके में बर्फबारी में दर्ज करने वाली गिरावट या कमी देखी गई, उससे साफ है कि वैश्विक ताप के नतीजे अब अपने व्यापक रूप में सामने आने लगे हैं।

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भारत के लिए क्यों है संकट?

ऐसे अनेक आकलन आ चुके हैं, जिनके मुताबिक सदियों से भारत के जलवायु चक्र का आधार माने जाने वाला हिमालय आज एक चिंताजनक संकट से गुजर रहा है। पिछले कुछ वर्षों से हिमालय क्षेत्र में सर्दी के मौसम में भी औसत से काफी कम बर्फबारी हो रही है। खासतौर पर जिस मौसम में पहाड़ों को बर्फ से आच्छादित देखा जाता था, उस दौरान भी अब असामान्य रूप से बर्फबारी में देरी हो रही है।

यह गौरतलब है कि हिमालय के दायरे में पड़ने वाले क्षेत्रों में कई नदियों का उद्गम स्थल है और इस तरह पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों के बड़े हिस्से में खेती और लोगों की जीविका इन पर निर्भर रही है। मगर मानसून और जैव-विविधता का आधार रहा यह इलाका अब कड़ाके की ठंड में भी बिना बर्फ के सूखा रहने लगा है, जिसका असर पारिस्थितिकी पर पड़ना तय है। अब इसे मौसम में किसी सामान्य उतार-चढ़ाव के बजाय जलवायु परिवर्तन के नतीजे के तौर पर देखा जाने लगा है।

वैश्विक ताप में बढ़ोतरी का एक परिणाम यह भी है कि ठंड के मौसम में अगर थोड़ी-बहुत बर्फबारी हो, तो भी वह पिघल जाती है। ऐसे में हिमखंडों में सिकुड़न भी एक स्वाभाविक नतीजा है और इसका असर पहाड़ों की स्थिरता पर भी पड़ेगा। शायद यही वजह है कि हाल के वर्षों में पहाड़ी इलाकों में आपदाओं का संकट भी गहराता गया है। विकास की आड़ में प्रकृति की सुरक्षा दीवार को तोड़ने की तैयारी, क्या अरावली को खोकर भारत आगे बढ़ पाएगा?