कुदरत का कहर क्षण भर में ही कैसी तबाही मचा देता है, दो दिन पहले उत्तर भारत के बड़े हिस्से में आया आंधी-तूफान इसका प्रमाण है। अब तक सवा सौ से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबर है। सत्तर से ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश में और चालीस से ज्यादा राजस्थान में मारे गए। पश्चिम बंगाल में आठ, उत्तराखंड में पांच और झारखंड में पांच लोगों के मारे जाने की खबर है। घायलों की संख्या तो हजारों में है। कुछ मौतें आकाशीय बिजली गिरने से हुर्इं। राजस्थान के धौलपुर जिले में तो आंधी की वजह से कई घर आग की चपेट में आ गए। एक सिलेंडर में लगी आग ने कई घरों को लपेट लिया। एक सौ बीस किलोमीटर प्रतिघंटा से भी तेज रफ्तार वाले अंधड़ से हजारों पेड़ और बिजली-खंभे उखड़ गए। सड़कों और रेल पटरियों पर पेड़ गिरने से यातायात पर असर पड़ा। घंटों बिजली गुल रही। बड़ी संख्या में कच्चे घर मलबे में तब्दील हो गए। तूफान से अरबों रुपए की संपत्ति का नुकसान भी हुआ। खेतों में खड़ी फसलें ओलों से तबाह हो गर्इं। कुल मिलाकर राजस्थान से लेकर पश्चिम बंगाल तक तबाही का मंजर दिखा। पर हैरानी की बात यह है कि कुछ दिन पहले मौसम विभाग ने देश में जिन कई स्थानों पर आंधी-बारिश की चेतावनी दी थी, उनमें राजस्थान और उत्तर प्रदेश का नाम नहीं था।
इस बार आकलन में मौसम विभाग पिट गया। मौसम विभाग ने तीस अप्रैल को चेतावनी जारी कर बताया था कि दो और तीन मई को पश्चिम बंगाल और ओड़िशा में गंगा के आसपास के इलाकों और असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और झारखंड में आंधी-तूफान आ सकता है। मौसम विशेषज्ञों ने बताया कि राजस्थान और उत्तर प्रदेश में तबाही का कारण हरियाणा के ऊपर बना चक्रवाती प्रवाह रहा। हालांकि मई के महीने में ऐसा आंधी-तूफान और बारिश का झोंका कम ही आता है। बताया जा रहा है कि जलवायु में तेजी से हो रहे छोटे-बड़े बदलाव मौसम-चक्र को बिगाड़ रहे हैं। इस बार उत्तर भारत में तेज गर्मी पड़ रही है। उत्तरी पाकिस्तान और राजस्थान में तापमान ज्यादा होने की वजह से गरम हवाएं ऊपर की ओर उठ रही हैं और कम दबाव का क्षेत्र बन रहा है।
इसके सात ही भूमध्यसागर और अरब सागर से चलने वाली पछुआ हवाओं से इस कम दबाव वाले क्षेत्र में बादल और चक्रवाती तूफान बन रहे हैं। तूफान का दायरा ढाई सौ वर्ग किलोमीटर तक का है जो हर पचास से साठ किलोमीटर पर कहर बरपा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि ये सारे आकलन आंकड़ों के विश्लेषण पर निर्भर होते हैं। पर सवाल यह है कि अत्याधुनिक संसाधन होने के बावजूद इन आकलनों में ऐसी त्रुटि क्यों रह जाती है जिससे सटीक भविष्यवाणी नहीं हो पाती? इस तरह की प्राकृतिक आपदा की मार ग्रामीण इलाकों में ज्यादा पड़ी है। ज्यादा नुकसान कच्चे घरों को पहुंचा है। ग्रामीण इलाकों में ही कच्चे घरों की दीवारें गिरने और घरों के ढहने की घटनाएं ज्यादा हुई हैं। राज्य सरकारें ऐसी आपदाओं में मारे गए लोगों को मुआवजे देकर पल्ला झाड़ लेती हैं। लेकिन जिन लोगों को नुकसान होता है, जिनके मकान ढह जाते हैं, उनकी मदद के लिए ठोस बंदोबस्त नहीं होते और ऐसे आपदा-पीड़ितों को लंबे समय तक इसका दंश झेलना पड़ता है।

