राज्यपाल का पद संवैधानिक होता है और उनसे अपेक्षा की जाती है कि राज्य की चुनी हुई सरकार की सलाह और सहयोग से वहां लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना करेंगे। मगर पिछले कुछ सालों से जिस तरह कई राज्यों में राज्यपाल और चुनी हुई सरकार के बीच तकरार की स्थितियां उभरती देखी जाती हैं, उसे किसी भी दृष्टि से जनतांत्रिक नहीं कहा जा सकता।
अभी केरल सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई है कि राज्यपाल उसके लोक कल्याण से संबंधित कई विधेयकों को लटकाए हुए हैं। तीन विधेयक दो साल से अधिक समय से उनकी मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। तीन विधेयक इस साल के हैं। विचित्र है कि किसी सरकार को राज्यपाल से अपने विधेयकों की मंजूरी दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगानी पड़ रही है, जबकि विधेयकों की मंजूरी को लेकर संविधान में स्पष्ट प्रावधान हैं।
मगर केरल के राज्यपाल के रवैए से तो यही जाहिर है कि उन्हें संवैधानिक प्रावधानों की फिक्र नहीं। हालांकि केरल सरकार अकेली नहीं है, जिसने इस तरह अदालत का रुख किया है। इसके पहले पंजाब और तमिलनाडु की सरकारें भी अपने-अपने राज्यपाल के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर चुकी हैं। ये तीनों मामले एक हफ्ते के भीतर के हैं।
छिपी बात नहीं है कि जिन राज्यों में केंद्र के विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वहां राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच अक्सर किसी न किसी मुद्दे पर तकरार उभर आती है। दिल्ली इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां आए दिन सरकार और उपराज्यपाल के बीच ठनी रहती है। कुछ समय पहले तक पश्चिम बंगाल में भी राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच जुबानी जंग देखी जाती थी।
अन्य राज्यों में भी, जहां गैर-भाजपा सरकारें हैं, वहां राज्यपाल और सरकार के बीच रिश्ते सामान्य नजर नहीं आते। इसकी वजहें भी साफ हैं। राज्यपाल की नियुक्ति चूंकि केंद्र सरकार करती है, उसकी स्वाभाविक अपेक्षा रहती है कि वह जिसे नियुक्त करे वह उसकी मंशा के अनुरूप काम करे। इस तरह कई राज्यपाल केंद्र सरकार को खुश रखने की गरज से अक्सर विपक्षी दलों की सरकारों के काम में अड़ंगा डालने का प्रयास करते देखे जाते हैं।
यह प्रवृत्ति कुछ अधिक इसलिए भी बढ़ती गई है कि राज्यपाल के पद पर अक्सर सक्रिय राजनीतिक में रहे लोगों को नियुक्त किया जाता है। इस तरह इन लोगों के मन में राजनीति से ऊपर उठ कर काम करने की भावना पैदा ही नहीं हो पाती।
यह अकारण नहीं है कि अनेक राज्यों के राज्यपाल राजनीतिक बयान देते और सरकार के कामकाज की राजनीतिक नजरिए से व्याख्या करते देखे जाते हैं। केरल में राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव नया नहीं है। विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर भी मुख्यमंत्री और उनके बीच टकराव बढ़ गया था।
दरअसल, राज्यपालों से अपेक्षा की जाती है कि वे राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठ कर, संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप काम करें, मगर खुद राजनीतिक होने की वजह से वे राजनीति से बच नहीं पाते। कई मौकों पर सुझाव दिए जा चुके हैं कि राज्यपाल पद का दायित्व राजनीति के बजाय कानून, कला, संस्कृति, समाजसेवा, पर्यावरण आदि क्षेत्रों में काम करने वाले प्रबुद्ध लोगों को सौंपा जाए।
इस तरह सरकार के साथ उनके टकराव की स्थितियां टल सकती हैं, क्योंकि यह मामला केवल इस समय का नहीं है। हर केंद्र सरकार इसी तरह अपने विपक्षी दल की राज्य सरकार को काबू में करने का प्रयास करती देखी जाती है।
