पढ़ाई और परीक्षा के दबाव की वजह से विद्यार्थियों की आत्महत्या की घटनाएं पहले ही चिंता का विषय बनी हुई थीं। मगर हाल के दिनों में स्कूल में अपने साथ हुए बर्ताव से आहत होकर कुछ विद्यार्थियों के आत्महत्या कर लेने की खबरें बेहद परेशान करने वाली हैं। पिछले हफ्ते दिल्ली में दसवीं कक्षा के एक छात्र और मध्य प्रदेश के रीवा में ग्यारहवीं की छात्रा ने खुदकुशी कर ली। उन्होंने अपने आत्महत्या नोट में बताया कि कुछ शिक्षक उन्हें लगातार प्रताड़ित कर रहे थे।

वहीं जयपुर के स्कूल में महज नौ वर्ष की एक बच्ची पर उसके कई सहपाठी लगातार परेशान करने वाली टिप्पणियां कर रहे थे। दिल्ली के छात्र ने स्कूल के काउंसलर से अपना दुख साझा किया था, वहीं जयपुर के स्कूल की बच्ची ने भी शिक्षकों से मदद मांगी थी। मगर शिक्षकों ने इस पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा।

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जबकि शिक्षकों और काउंसलरों की यह प्राथमिक जिम्मेदारी होती है कि वे किसी भी तरह की परेशानी का सामना कर रहे बच्चों की हर स्तर पर मदद करें। विडंबना यह है कि अपनी जिम्मेदारी का अहसास किए बिना कुछ शिक्षक बच्चों के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं कि कई बच्चे तनाव और अवसाद की हालत में चले जाते हैं।

ऐसे नाजुक समय में अगर समय पर बच्चों को मनोवैज्ञानिक सहायता मुहैया नहीं कराई जाती है, तो इसका परिणाम कई बार दुखद होता है। सवाल है कि जो शिक्षक बच्चों की मुश्किलों की पहचान समय पर नहीं कर पाते, मदद करने के बजाय उनके प्रति सख्त व्यवहार करते हैं, उनका प्रशिक्षण किस रूप में हुआ होता है।

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अगर कोई बच्चा स्कूल में हुए व्यवहार की वजह से आखिरकार जीने का हौसला खो देता है, तो ऐसे माहौल के लिए कौन जिम्मेदार है? स्कूलों के साथ-साथ घर-परिवार में भी यह विचार करने की जरूरत है कि बच्चों को किसी भी वजह से उपजे तनाव या दबाव का सामना करने को लेकर कैसे प्रशिक्षित किया जाए।

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स्कूलों में अपने साथ शिक्षकों या अन्य सहपाठियों के बर्ताव की वजह से बच्चों की आत्महत्या की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय हैं। इसके हल के लिए सरकार, समाज और स्कूल प्रबंधनों को तुरंत विचार करना चाहिए। स्कूल परिसर को बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के अनुकूल बनाने के लिए हर जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए।