बिहार में चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद गुरुवार को नई सरकार का गठन हो गया। पटना के गांधी मैदान में नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की दसवीं बार शपथ ली। इसी के साथ उन्होंने ज्यादा समय तक सत्ता में रहने वाले शीर्ष दस मुख्यमंत्रियों की सूची में जगह बना ली। इसमें दोराय नहीं कि लंबे समय तक सत्ता में रहते हुए नीतीश कुमार ने कई तरह के उतार-चढ़ाव देखे। मगर उनके गठबंधन को इस बार जितना बड़ा जनादेश मिला है, उसके मद्देनजर शायद उतनी ही बड़ी चुनौतियां भी सामने हैं।
अपने पिछले कार्यकाल के दौरान नीतीश कुमार ने सुशासन सुनिश्चित करने के दावे करने से लेकर महिलाओं के सशक्तीकरण के लक्ष्य से कई कदम उठाए। चुनाव में मिले समर्थन से ऐसा लगता भी है कि उनकी विश्वसनीयता कायम रही। मगर अब नई सरकार के सामने उन वादों को पूरा करने की चुनौती होगी जो इस बार के चुनावों के दौरान जनता से किए गए।
पहली बार ‘कृपा’ से मुख्यमंत्री बने थे नीतीश कुमार, महज 7 दिन में ही गिर गई थी सरकार
खासतौर पर नीतीश कुमार को कानून-व्यवस्था की स्थिति में गुणात्मक सुधार लाना होगा, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में आपराधिक घटनाओं में काफी तेजी आई है और इसके लिए उनके नेतृत्व पर लगातार सवाल उठे। बिहार में इस बार जो प्रमुख चुनावी मुद्दे रहे, उसके मुताबिक वहां अब आर्थिक और सामाजिक विकास को तेज करने की जरूरत है। चुनाव के दौरान राजग ने अपने संकल्प-पत्र को लेकर जो दावे और वादे किए थे, उसे पूरा करने के लिए अब सरकार को कई मोर्चे पर ठोस नतीजे देने वाले काम करने होंगे।
नए रोजगारों के सृजन और लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देने से ही बिहार की नई विकास यात्रा शुरू हो सकती है। इस दिशा में बिहार सरकार अगर ईमानदार इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ती है और रोजगार की नई संभावनाएं खड़ी होती हैं, तो राज्य को पलायन के दंश से मुक्ति मिल सकती है।
नीतीश कुमार ने अपने पहले के कार्यकाल में शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा काम करने का दावा जरूर किया है, पर अब भी इसमें बड़े सुधार की दरकार है। बिहार पिछड़े राज्यों की श्रेणी से कैसे बाहर निकले, इस पर भी उन्हें मंथन करना होगा।
