संसद में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने संबंधी नारी शक्ति वंदन अधिनियम पिछले मानसून सत्र में पारित हो गया। हालांकि यह कानूनी प्रावधान अगले लोकसभा चुनाव से प्रभावी होगा, पर लंबे समय से रुकी पड़ी इस मांग के पूरा हो जाने से इसलिए महिलाओं में उत्साह है कि राजनीति में उनकी उपस्थिति बढ़ेगी और वे व्यवस्था संबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णयों में सहभागिता कर सकेंगी।

मगर महिलाओं को लेकर खुद राजनेताओं में जैसा संकुचित दृष्टिकोण देखा जाता है, उससे संदेह होता है कि उन्हें वास्तव में कितनी शक्ति और कितना सम्मान मिल पाएगा। चुनावी गहमागहमी में राजनेता अक्सर प्रतिद्वंद्वी नेताओं पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने से भी परहेज नहीं करते। वे भूल जाते हैं कि किसी महिला के बारे में अशोभन टिप्पणी करने से बचना चाहिए। ममता बनर्जी, हेमा मालिनी और कंगना रनौत पर की गई टिप्पणियां इसका ताजा उदाहरण हैं।

इसके पहले भी कई चुनाव अभियानों के दौरान विभिन्न पार्टियों के जिम्मेदार माने जाने वाले नेताओं की तरफ से प्रतिद्वंद्वी पार्टी की महिला उम्मीदवारों और नेताओं पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों और लहजों को याद किया जा सकता है। चुनाव के अलावा, सामान्य अवसरों पर भी, महिला नेताओं के खिलाफ कई बार अशोभन वक्तव्य सुने गए हैं।

लोकतंत्र में राजनेता अपने प्रतिद्वंद्वी पर तीखी टिप्पणियां कर सकते हैं, मगर इसका यह अर्थ नहीं कि लोकतंत्र की मर्यादा को ताक पर रख दिया जाए। राजनीति में सार्वजनिक वक्तव्यों का महत्त्व होता है। अगर कोई बड़ा नेता अपने किसी प्रतिद्वंद्वी के बारे में टिप्पणी करता है, तो निचली कतार के नेता उसे आगे बढ़ाते हैं। इसलिए उनसे न केवल शब्दों के चुनाव, बल्कि लहजे पर लगाम की भी अपेक्षा की जाती है।

राजनीति में भाषा एक बड़ा औजार होता है। अगर उसे ठीक से बरतना न आए, तो कई बार खुद को भी जख्मी कर लेने का खतरा रहता है। किसी महिला के प्रति अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल तो यह भी जाहिर करता है कि टिप्पणी करने वाले का महिला समाज के प्रति दृष्टिकोण क्या है।

संसद में महिला आरक्षण को लेकर चली बहसों के समय की कुछ टिप्पणियों की गूंज आज तक इसीलिए बनी हुई है कि उनसे पूरे महिला समाज के सम्मान पर प्रश्नचिह्न लगा था। राजनीतिक दलों की अगली कतार में सामान्य महिलाओं की उपस्थिति वैसे भी न के बराबर है। ऐसे में महिलाओं के प्रति दुराग्रहपूर्ण टिप्पणियां इस विडंबना को और गहरा करती हैं।

यह भी चिंता का विषय है कि आखिर राजनीति में भाषा की मर्यादा इतनी धुंधली क्यों होती जा रही है कि राजनेता संसद और विधानसभाओं से लेकर सार्वजनिक मंचों तक पर बेलगाम कुछ भी बोलने में संकोच नहीं करते। महिलाओं के प्रति हमारे पुरुष प्रधान समाज का नजरिया किसी से छिपा नहीं है। मगर जिन पर समाज और व्यवस्था की विसंगतियां दूर करने की जिम्मेदारी है, अगर वे भी उसी संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त हों, तो महिला शक्ति और उसके सम्मान की आकांक्षा भला कहां तक पूरी हो पाएगी।

शीर्ष नेतृत्व की संकीर्णता और दुराग्रह छन कर नीचे तक पहुंचते हैं। हर राजनीतिक दल महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने का दम भरता देखा जाता है, सत्ता में आने पर महिला सुरक्षा के दावे करता भी नहीं थकता, मगर जब तक खुद राजनेताओं के मन में महिलाओं के प्रति सम्मान पैदा नहीं होगा, तब तक उन्हें शक्ति दिला पाना संभव नहीं होगा।