मोदी सरकार के अहम वादों में एक यह भी था कि वह आतंकवाद के खिलाफ सख्ती से पेश आएगी। मंगलवार को की गई सैन्य कार्रवाई से ऐसा ही संदेश गया है। चार जून को मणिपुर के चंदेल जिले में सेना के काफिले पर घात लगा कर किए गए उग्रवादियों के हमले ने सेना समेत पूरे देश को स्तब्ध कर दिया।

पांच दिनों के भीतर इसका जैसा करारा जवाब दिया गया उससे जहां सरकार की तत्परता जाहिर होती है वहीं सेना का भी हौसला बढ़ा होगा। लेकिन ऐसा लगता है कि इस मामले को लेकर सियासी बढ़त हासिल करने की संभावना तलाशी जा रही है। इसे कूटनीतिक दूरंदेशी नहीं कहा जा सकता। केंद्रीय राज्यमंत्री राज्यवर्धन राठौड़ ने कहा कि यह सैन्य कार्रवाई उन सभी पड़ोसी देशों के लिए चेतावनी है जो आतंकवादियों को पनाह देते हैं।

इस मौके पर उन्होंने पाकिस्तान का नाम भी लिया। इस पर पाकिस्तान की तीखी प्रतिक्रिया आई, उसके आंतरिक सुरक्षा मंत्री ने कहा कि पाकिस्तान को म्यांमा समझने की भूल भारत न करे। भारत आतंकवाद की बाबत पाकिस्तान को हमेशा चेताता आया है। इस मसले को वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठाता रहा है। लेकिन राठौड़ ने जो कुछ कहा और कई अन्य केंद्रीय मंत्रियों की बातों में भी जिस तरह उसकी प्रतिध्वनि सुनाई दी, वैसी भाषा कांग्रेस की सरकारों के दौरान तो क्या, वाजपेयी सरकार के समय भी किसी मंत्री ने नहीं बोली थी।

ताजा कार्रवाई को लेकर यह धारणा बनी या बनाई गई कि म्यांमा शासन की परवाह न करते हुए उसकी सीमा में स्थित पूर्वोत्तर के उग्रवादियों के दो शिविर भारतीय सेना ने तबाह कर दिए, और करीब सत्तर उग्रवादियों को मार डाला। पहली बात तो यह कि म्यांमा ने इस बात से इनकार किया है कि ये शिविर उसकी सीमा में थे, उसका कहना है कि भारतीय सेना ने अपनी ही सीमा में कार्रवाई की है।

दोनों शिविरों की जगह जो भी रही हो, तथ्य यह है कि म्यांमा के राष्ट्रपति के कार्यालय में कार्यरत मंत्री आंग मिन ने हाल में उग्रवाद के खिलाफ सहयोग के लिए भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को पत्र लिखा था। मिन के ही न्योते पर डोभाल यंगून जाने वाले हैं। अतीत में कई बार म्यांमा की सीमा में छिपे पूर्वोत्तर के उग्रवादियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की गई थी, पर हर बार उसमें म्यांमा की रजामंदी रही। मसलन, नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आॅफ नगालिम के दो धड़ों में बंटने से एक बरस पहले, 1987 में सीमापार सैन्य कार्रवाई ‘ब्लूबर्ड’ नाम से की गई थी। इसी तरह की एक फौजी कार्रवाई 1995 में ‘गोल्डन बर्ड’ नाम से की गई। इस सब में म्यांमा की तत्कालीन सरकारों का सहयोग रहा।

वाजपेयी सरकार के समय भूटान में पूर्वोत्तर के उग्रवादियों के अड््डे खत्म किए गए। इसमें भूटान के शासन ने सक्रिय मदद की थी। बांग्लादेश में उल्फा को पनाह मिलने की बात जगजाहिर थी। पर भारत ने कभी बांग्लादेश की सीमा में घुस कर उल्फा पर धावा नहीं बोला। उल्फा के बांग्लादेश में जा छिपने का क्रम तभी बंद हुआ जब वहां अवामी लीग सत्ता में आई और शेख हसीना ने इस मोर्चे पर तत्परता दिखाई। ताजा सैन्य कार्रवाई अपूर्व नहीं है, म्यांमा की सहमति से की गई कार्रवाइयों के सिलसिले की ही ताजा कड़ी है।

इसे इस तरह से पेश नहीं किया जाना चाहिए कि भारत ने म्यांमा की संप्रभुता को नजरअंदाज किया। ऐसा करना म्यांमा के सहयोगी रुख को देखते हुए तथ्यात्मक रूप से गलत होगा, कूटनीतिक अपरिपक्वता तो इसमें है ही। लेकिन सियासी फायदे के चक्कर में ऐसे बयान दिए गए, जिनसे पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में तनाव भले पैदा हो, कुछ हासिल नहीं होगा।

 

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