अफगानिस्तान के उत्तरी बगलान प्रांत में सात भारतीय इंजीनियरों के अपहरण की घटना ने एक बार फिर यही रेखांकित किया है कि वहां हालात कितने विकट हैं। रविवार को अगवा किए गए लोगों में भारतीयों के अलावा एक अफगान वाहन चालक भी है। ये लोग मिनी बस से एक सरकारी बिजलीघर जा रहे थे। खबरों के मुताबिक कुछ बंदूकधारियों ने बगलान प्रांत की राजधानी पुल-ए-खुमरी के बाग-ए-शमल गांव के पास से इंजीनियरों को अगवा किया। अगवा किए गए लोग आरपीजी समूह की कंपनी केईसी के कर्मचारी हैं, जो अफगानिस्तान में बड़ी ढांचागत परियोजना ‘द अफगानिस्तान बेशना शेरकट (डीएबीएस)’ के लिए काम करती है। डीएबीएस वहां के बिजलीघरों को संचालित करती है। केईसी कंपनी दो सौ छब्बीस करोड़ के बिजली सब स्टेशन प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। केईसी के साथ अफगानिस्तान की डीएबीएस की ढांचागत परियोजना में डेढ़ सौ से ज्यादा इंजीनियर काम कर रहे हैं। वे भी इस वाकये से खौफजदा होंगे। अगवा किए गए लोगों की जल्द से जल्द सुरक्षित रिहाई जरूरी है ताकि दूसरे लोगों में भी अपनी सुरक्षा को लेकर छाई चिंता दूर हो। अफगानिस्तान में भारत बरसों से विकास और पुनर्निर्माण के काम में हाथ बंटा रहा है और उसकी इस भूमिका की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी सराहना करती रही है। अमेरिका तो कई बार यह भी कह चुका है कि भारत को अफगानिस्तान में सहायता-कार्यों में अपनी भूमिका बढ़ानी चाहिए, वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल में हुई अनौपचारिक शिखर वार्ता में भारत के साथ मिल कर अफगानिस्तान में एक साझी परियोजना शुरू करने की सहमति बनी।
जाहिर है, भविष्य में अफगानिस्तान में भारत के काम का दायरा और बढ़ने के ही संकेत हैं। लेकिन युद्ध-जर्जर अफगानिस्तान के विकास तथा पुनर्निर्माण में सहभागी होना भारत के आसान नहीं रहा है। भारत से वहां गए हुनरमंदों और कामगारों पर कई बार हमले हुए, कइयों के अपहरण भी हुए, हत्या की भी घटनाएं हुर्इं। रविवार को जो हुआ वह इसी सिलसिले की ताजा कड़ी है। अपहरण की जिम्मेदारी अभी तक घोषित तौर पर किसी संगठन ने नहीं ली है, पर आम अनुमान है कि इसके पीछे तालिबान का हाथ होगा। इसी के साथ कुछ और भी कयास लगाए जा रहे हैं। जैसे, तालिबानियों का खयाल है कि जिन इलाकों पर उनका नियंत्रण है वहां बिजली नहीं जा रही, और शायद इस बात का गुस्सा ही अपहरण की वजह बना हो। दूसरा अनुमान यह है कि जब से संसदीय और जिला परिषदों के चुनाव अक्टूबर में कराने की घोषणा हुई है, आतंकवादी हमले की घटनाएं बढ़ गई हैं, और इस अपहरण को भी इसी सिलसिले से जोड़ कर देखा जाना चाहिए।
तीसरा अनुमान यह है कि हमले के पीछे इरादा विकास तथा पुनर्निर्माण के कामों से भारत को विरत करने का रहा होगा। फिर एक यह अनुमान यह भी है कि अपहरण के पीछे फिरौती की मंशा रही होगी। बहरहाल, कारण कुछ भी हो, यह वाकया काफी चिंताजनक है। भारत ने अतीत में हुई ऐसी हर घटना के बाद अपना यह संकल्प दोहराया है कि वह अफगानिस्तान के लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने वाली गतिविधियों से पीछे नहीं हटेगा। यह संकल्प सराहनीय है, पर वहां काम करने के लिए गए लोगों की सुरक्षा भी जरूरी है। भारत से काम के लिए गए लोगों में सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों के लोग शामिल हैं। अगर ये खुद को वहां सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे, तो भारत किनके बल पर अफगानिस्तान में अपनी भूमिका जारी रखेगा!

