प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन का दो दिन का दौरा दोनों देशों के रिश्तों के इतिहास में एक बड़ा वाकया था, खासकर इसलिए कि पिछले साल तिहत्तर दिन चले डोकलाम गतिरोध के कारण महीनों तक लगातार तनातनी का माहौल रहा था। यात्रा का मकसद इस खटास को दूर करना था। दरअसल, इसकी कवायद और पहले से शुरू हो गई थी, जिसे भारत के विदेश सचिव और विदेशमंत्री के चीन दौरे तथा दोनों तरफ के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक से बल मिला था। डोकलाम गतिरोध दूर हो जाने के बाद चीन से रिश्ते सामान्य बनाने की पहल न करना कूटनीतिक जड़ता ही होती। फिर, तनातनी जारी रहने की सूरत में दक्षिण एशिया के पड़ोसी देशों में भारत को नाहक एक प्रतिद्वंद्विता का तनाव झेलना पड़ा है, क्योंकि चाहे श्रीलंका हो या बांग्लादेश या नेपाल या फिर मालदीव, चीन ने पिछले कुछ बरसों में इन देशों में अपनी पैठ तेजी से बढ़ाई है। लेकिन क्या चीन भी संबंध सुधार के लिए उतना ही उत्सुक था? राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तो यही जताया। उन्होंने दो बार प्रोटोकॉल तोड़ कर प्रधानमंत्री मोदी की अगवानी की। बेजिंग से बाहर दूसरे शहर में आकर स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच बातचीत निर्धारित समय से ज्यादा चली। साथ-साथ संग्रहालय देखा, वहां भी निर्धारित वक्त से ज्यादा रहे। साथ-साथ चहलकदमी की। साथ-साथ नाव की सैर की। अवसरोचित टिप्पणियों से ही नहीं, भंगिमाओं और व्यवहार से भी सौजन्य और संबंध सुधार का संदेश दिया गया।

शिखर वार्ता अनौपचारिक थी। और जैसा कि पहले से तय था, कोई साझा बयान जारी नहीं हुआ, न कोई समझौते हुए। दरअसल, यह बस आपस में आई खटास दूर करने की कोशिश थी। मोदी ने अगले साल भारत में इसी तरह की शिखर वार्ता आयोजित करने की पेशकश की और उसके लिए शी को निमंत्रित किया। यह फिलहाल साफ नहीं है कि शी ने इस पेशकश को मंजूर किया है या नहीं। बहरहाल, मोदी के इस दौरे की तुलना 1988 में हुए राजीव गांधी के चीन दौरे से की जा रही है। भारत-चीन युद्ध के छब्बीस साल बाद बेजिंग गए राजीव गांधी की देंग श्याओ पेंग से मुलाकात काफी अहम साबित हुई थी, जो कि दोनों के बीच हुए कारोबारी समझौतों में भी दिखी। मोदी का दौरा कहीं ज्यादा अनौपचारिक रहा। ज्यादा चिंता इस बात की रही कि डोकलाम जैसे प्रकरण की पुनरावृत्ति न हो। सीमा पर शांति बनाए रखने और गलफहमी या कोई अप्रिय स्थिति पैदा होने पर उसे बातचीत से सुलझाने और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनात दोनों तरफ के सैनिकों के बीच आपसी भरोसा बढ़ाने पर सहमति बनी है।

जहां तक सीमा विवाद का सवाल है, इसे सुलझाने के लिए दोनों तरफ के विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता प्रक्रिया और इस सिलसिले में अरसा पहले तय हुए सैद्धांतिक ढांचे पर एक बार फिर विश्वास जता कर चुप्पी साध ली गई। न अरुणाचल का जिक्र आया, न व्यापारिक असंतुलन का, न एनएसजी का, न जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को आतंकवादियों की अंतरराष्ट्रीय सूची में डालने का। शी की बेहद महत्त्वाकांक्षी योजना बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव पर भी चर्चा होने के कोई संकेत नहीं दिए गए, जिस योजना के तहत चीन एक आर्थिक गलियारे का निर्माण पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कर रहा है। क्या असहमति वाले खास मुद्दे जानबूझ कर किनारे कर दिए गए, ताकि वुहान के आयोजन की चमक फीकी न पड़े?