समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का नजदीक आना एक बड़ी राजनीतिक घटना है। इसका जहां उत्तर प्रदेश की राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा, वहीं देश का राजनीतिक परिदृश्य भी थोड़ा-बहुत प्रभावित हो सकता है। बस, सवाल यह है कि दोनों पार्टियों ने अभी जिस नजदीकी के संकेत दिए हैं, क्या वह अगले लोकसभा चुनाव में गठबंधन या सीटों के तालमेल में बदल पाएगी? दोनों पार्टियों ने 1993 में विधानसभा चुनाव गठबंधन करके लड़ा था, और तब उत्तर प्रदेश की सत्ता में अपनी वापसी के लिए आश्वस्त भाजपा के मंसूबों पर पानी फेर दिया था। सपा-बसपा गठबंधन की जीत हुई और मुलायम सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी। लेकिन जून 1995 में गठबंधन टूट गया। बसपा के समर्थन वापस ले लेने से मुलायम सिंह सरकार गिर गई। यह अलगाव गेस्टहाउस कांड के कारण दुश्मनी में बदल गया। तब से बाईस साल गुजर गए, मायावती ने औरों से जब-तब हाथ मिलाया मगर सपा उनके लिए प्रतिद्वंद्वी ही नहीं, दुश्मन भी बनी रही। अब बसपा और सपा में मेलमिलाप होता दिख रहा है, तो इसके दो प्रमुख कारण हैं। एक यह कि अब सपा की कमान मुलायम सिंह के नहीं, बल्कि अखिलेश यादव के हाथ में है।
दूसरे, 2014 के लोकसभा चुनाव और फिर पिछले विधानसभा चुनाव ने दोनों पार्टियों को यह अच्छी तरह अहसास करा दिया है कि वे अकेले भाजपा का मुकाबला नहीं कर पाएंगी। लोकसभा चुनाव में तो बसपा का खाता तक नहीं खुला था। विधानसभा चुनाव में मायावती को लग रहा था कि वे अकेले भाजपा से निपट लेंगी, पर उनकी पार्टी तीसरे नंबर पर आ गई। इस पृष्ठभूमि में, जाहिर है सपा और बसपा में बढ़ती नजदीकी अपना वजूद बचाने की कवायद है। रविवार की सुबह मायावती ने एलान किया कि गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों में भाजपा के खिलाफ सबसे मजबूत उम्मीदवार का बसपा समर्थन करेगी। इशारा साफ तौर पर सपा उम्मीदवार के समर्थन की तरफ था। लेकिन शाम होते-होते उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि राज्यसभा के लिए सपा को अपने अतिरिक्त वोट बसपा उम्मीदवार को दिलाने होंगे; जबकि बसपा विधान परिषद के लिए सपा उम्मीदवार का समर्थन करेगी। जाहिर है, मामला फिलहाल इस हाथ ले उस हाथ दे का है। गठबंधन की अटकलों का खुद मायावती ने खंडन किया है, पर गठबंधन की संभावना को खारिज भी नहीं किया है। यानी उन्होंने अपने पत्ते खुले रखे हैं। दरअसल, बहुत कुछ गोरखपुर और फूलपुर के नतीजों पर निर्भर करेगा। गोरखपुर लोकसभा सीट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे से खाली हुई है, जबकि फूलपुर लोकसभा सीट उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के कारण।
सपा और बसपा का हाथ मिलाना उत्तर प्रदेश की राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग के लिहाज से बहुत अहम माना जा रहा है और इन उपचुनावों में इसका पहला परीक्षण होगा। मायावती बहुत बार कह चुकी हैं कि वे गेस्टहाउस कांड कभी नहीं भूलेंगी। लंबे समय से वे सपा को शत्रु के रूप में चित्रित करती रही हैं। ऐसे में क्या वे बसपा के सारे वोट सपा की झोली में डलवा पाएंगी? इस सवाल का जवाब तो उपचुनावों के नतीजे ही देंगे। लेकिन अगर गोरखपुर और फूलपुर, दोनों जगह निराशा हाथ लगी, तब भी सपा और बसपा के बीच फिर से दोस्ती, यहां तक कि गठबंधन की संभावना भी खत्म नहीं हो जाएगी, क्योंकि भाजपा की प्रचंड चुनावी सफलताओं ने उन्हें ऐसी जगह ला छोड़ा है। तमाम अटकलों के बीच जो बात निर्णायक रूप से मायने रखती है वह यह है कि क्या दोनों पार्टियां सीटों के बंटवारे का बेहद कठिन सवाल सुलझा पाएंगी!
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