पिछले कुछ समय में जिस तरह से बड़े बैंक घोटाले सामने आए हैं, उनसे अर्थतंत्र को गहरा धक्का पहुंचा है। सबसे ज्यादा कोई नुकसान हुआ तो यह कि बैंकों की साख पेंदे में चली गई। अपनी गाढ़ी कमाई बैंकों के पास सुरक्षित रख चैन की नींद सोने वालों का बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हुआ। बैंकों पर लोगों का भरोसा कैसे बहाल हो, यह सरकार और बैंक प्रबंधनों के समक्ष बड़ी चुनौती है। हाल में सरकारी बैंकों में सुधार के लिए भारतीय बैंक संघ (आइबीए) ने योजना बनाई है। बैंकों में सुधार के एजंडे को लागू करने के लिए फिलहाल जिन मानदंडों पर विचार किया जा रहा है, उनमें बैंकों की ग्राहकों के प्रति जवाबदेही, कर्ज वितरण और वसूली और बैंकों का डिजिटलीकरण खास हैं। बैंकों का भविष्य चूंकि साख और तकनीक पर टिका है, लिहाजा डिजिटलीकरण की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता। यह वक्त का तकाजा है।
बैंकों की सबसे बड़ी समस्या एनपीए यानी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां हैं। सरकारी बैंकों का साढ़े नौ लाख करोड़ रुपया डूब गया है। यह रकम बट्टे-खाते में डाल दी गई है। अब इसकी वसूली नहीं हो सकती। एनपीए की वजह से कुछ बैंक तो डूबने के कगार पर आ गए थे। एनपीए की समस्या आज की नहीं है, लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान एनपीए का ग्राफ जिस तेजी बढ़ा, वह गहरी चिंता का विषय है। इस साल के शुरू में पंजाब नेशनल बैंक में तेरह हजार करोड़ रु. का घोटाला सामने आया। इसके बाद घोटाले खुलने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने देश को हिला दिया। पिछले साल दिसंबर तक अकेले पंजाब नेशनल बैंक का एनपीए का आंकड़ा साढ़े सत्तावन हजार करोड़ रुपए से ऊपर निकल चुका था। एनपीए उन कर्जदारों की वजह से बढ़ रहा है जो कर्ज चुकाने की हैसियत में होने के बावजूद जानबूझ कर कर्ज नहीं चुका रहे हैं। हालांकि पीएनबी घोटाले के बाद बैंकों की नींद टूटी है और बैंक प्रबंधन थोड़े सतर्क हुए हैं। पीएनबी ने उन मोटे कर्जदारों की सूची जारी की है, जो जानबूझकर कर्ज नहीं लौटा रहे हैं।
बैंकों की हालत सुधारने के लिए सरकार ने पिछले साल दो लाख करोड़ रुपए बैंकिंग प्रणाली में डालने का फैसला किया था। इसे तात्कालिक राहत का कदम ही कहा जा सकता है; स्थायी समाधान आज भी नजर नहीं आ रहा। राहत भी किसकी कीमत पर दी गई? जाहिर है, करदाताओं की कीमत पर। बैंकों को घोटालों से कैसे बचाया जाए और कर्जदारों से वसूली कैसे हो, ये दो बड़े सवाल सरकार और बैंक प्रबंधनों के सामने चुनौती बन कर खड़े हैं। पीएनबी घोटाला सामने आने के बाद सरकार ने एक बड़ा कदम यह उठाया कि पचास करोड़ से ज्यादा के एनपीए के मामले सीबीआइ देखेगी। इससे कुछ उम्मीद तो बंधी है कि बैंकों के साथ धोखाधड़ी करने पर अब नकेल कसी जा सकेगी। सीबीआइ ने चार दर्जन बैंक घोटालों की जांच की है। सीबीआई इसके आधार पर एजंसी रिजर्व बैंक को कुछ ठोस सुझाव देने की तैयारी में है ताकि बैंकों के निगरानी तंत्र को दुरुस्त किया जा सके। बैंकों के बिना आर्थिक गतिविधियों की कल्पना नहीं की जा सकती। लिहाजा यह अपरिहार्य है कि बैंकिंग प्रणाली को लेकर पैदा हुई चिंताएं दूर की जाएं।

