पिछले कुछ समय से इंटरनेट की असीमित दुनिया में पसरी वैसी सामग्री को लेकर एक व्यापक चिंता पैदा हुई है, जो बच्चों और किशोरों के व्यक्तित्व पर नकारात्मक असर डालती है, उनके सोचने-समझने की दिशा को बुरी तरह प्रभावित करती है। इसके मद्देनजर दुनिया के कई देशों ने अपने स्तर पर ऐसे नियम-कायदे भी बनाए हैं, जिनके जरिए सोशल मीडिया और इस तरह के अन्य इंटरनेट मंचों तक बच्चों और किशोरों की पहुंच को सीमित किया गया। भारत में भी इस मसले पर चिंता के स्वर उभरे हैं कि व्यापक उपयोगिता के समांतर इंटरनेट की निर्बाध दुनिया में मौजूद आपत्तिजनक सामग्री को लेकर एक ठोस नियमन हो, ताकि नाबालिगों को उसके नकारात्मक असर से बचाया जा सके।
इसके अलावा, अगर कोई व्यक्ति अपने सोशल मीडिया खाते या वीडियो चैनल पर किसी तरह की आपत्तिजनक सामग्री तैयार करके जारी करता है, तो उसे रोकने को लेकर नियम-कायदे की भी कमी है। यही वजह है कि किशोरों या नाबालिगों सहित इंटरनेट की सुविधा रखने वाला हर व्यक्ति अलग-अलग मंचों पर उपलब्ध अश्लील या आपत्तिजनक सामग्री तक भी आसान पहुंच रखता है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि इस संबंध में एक स्वायत्त नियामक संस्था के गठन की जरूरत है, जो इस पर लगाम लगा सके। एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने सुझाव के तौर पर यह भी कहा कि इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील या वयस्क प्रकृति की सामग्री को बच्चों से दूर रखने के लिए आधार नंबर से उम्र की पुष्टि करने पर विचार किया जाना चाहिए। इसमें कोई दोराय नहीं कि नई तकनीक और प्रौद्योगिकी के तेजी से विस्तार के दौर में आसपास की दुनिया और व्यवस्थागत ढांचे में भी व्यापक बदलाव आ रहे हैं। रोजगार से लेकर पढ़ाई-लिखाई और मनोरंजन जैसी जरूरतों के लिए इंटरनेट पर निर्भरता का दायरा बहुत ज्यादा बढ़ा है।
मुश्किल यह है कि जिस साइबर संसार ने जीवन को आसान बनाया है और अध्ययन तथा शोध से संबंधित मामलों में अपनी उपयोगिता साबित की है, उसी में ऐसी सामग्री का असीमित भंडार भी है, जिसे समाज के लिए नुकसानदेह माना जाता है। ओटीटी मंचों, यूट्यूब या फिर सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो भरे पड़े हैं, जिन्हें आपत्तिजनक और अश्लील सामग्री की श्रेणी में रखा जा सकता है और जो बच्चों के लिए नुकसानदेह हैं।
आस्ट्रेलिया और डेनमार्क जैसे देशों ने सोशल मीडिया तक अपने यहां के नाबालिगों की पहुंच को सीमित करने के लिए नियम-कायदे बनाए हैं, तो इसके पीछे यही चिंता है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की यह राय गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर उम्र की जांच के लिए आधार नंबर का उपयोग किया जा सकता है। मगर एक पहलू यह भी है कि आधार नंबर की संवेदनशीलता और उसके जोखिम के मद्देनजर उसे सभी जगहों पर न देने की सलाह दी जाती है।
ऐसे में अगर साइबर संसार का कोई मंच उम्र की पुष्टि के लिए किसी व्यक्ति का आधार और उससे जुड़े ब्योरे लेता है, तो यह कैसे सुनिश्चित होगा कि उसका किसी भी तरह से दुरुपयोग न हो। जाहिर है, इंटरनेट की व्यापक दुनिया के कुछ नुकसानों को देखते हुए नियमन के लिए एक ढांचा खड़ा करने पर विचार किया जा सकता है, लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत होगी कि इसके नाम पर लोकतंत्र तथा अभिव्यक्ति के अधिकार को चोट न पहुंचे और वह लोगों की स्वस्थ, आलोचनात्मक और जनतांत्रिक चेतना को बाधित न करे।
