India-US Relation: अमेरिका की ओर से भारत पर पचास फीसद शुल्क लगाए जाने के बाद जिस तरह से बातचीत चल रही थी, उम्मीद की जा रही थी कि दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को अंजाम तक पहुंचाने से द्विपक्षीय संबंधों में जमी बर्फ पिघल जाएगी। मगर, इस समझौते को लेकर अमेरिका जिस तरह की उदासीनता दिखा रहा है, उससे उसकी नीति और नीयत दोनों संदेह के घेरे में है।
अमेरिका के वाणिज्य मंत्री का यह कहना विचित्र और तर्कहीन है कि व्यापार वार्ता इसलिए सिरे नहीं चढ़ सकी, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन नहीं किया। भारत ने इस पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने पिछले वर्ष आठ अवसरों पर फोन से बातचीत की और इस दौरान द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।
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ऐसे में तस्वीर साफ है कि अमेरिका व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने में अपनी नाकामी का ठीकरा भारत पर फोड़ने का प्रयास कर रहा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका सोची-समझी रणनीति के तहत भारत पर दबाव बनाना चाहता है, ताकि वह व्यापार समझौते में मनमाने तरीके से अपनी शर्ताें को आगे बढ़ा सके।
दरअसल, पिछले साल तेरह फरवरी को वाइट हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बैठक के दौरान द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया था। दोनों पक्षों के बीच इसको लेकर कई दौर की वार्ता हो चुकी है। मगर अमेरिकी पक्ष परस्पर हितों की बजाय अपने हितों पर ज्यादा जोर देता रहा है। हालांकि भारत यह स्पष्ट कर चुका है कि राष्ट्रहित से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा।
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इसमें दोराय नहीं है कि अमेरिकी की ओर से भारत पर पचास फीसद शुल्क लगाने की घोषणा भी दबाव की रणनीति का ही हिस्सा था, जो दोनों देशों के रिश्तों में शिथिलता का कारण बना। अब अमेरिका के वाणिज्य मंत्री की ओर से प्रस्तावित व्यापार समझौते के लंबित होने के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराने का प्रयास यह दर्शाता है कि अमेरिका जानबूझकर इसे ठंडे बस्ते में डालना चाहता है।
अमेरिका का यह रुख इसलिए भी सामने आया है, क्योंकि भारत परस्पर हितों की अपनी नीति पर पूरी तरह कायम है। रणनीतिक दबाव बढ़ाने का एक और प्रयास हाल में देखने को मिला, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नए विधेयक को मंजूरी दी, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले भारत समेत अन्य देशों पर पांच सौ फीसद शुल्क लगाने का प्रस्ताव किया गया है। अगर इस विधेयक को संसद की मंजूरी मिल जाती है, तो इसका भारत पर खासा असर पड़ सकता है।
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मगर यह बात भी सच है कि भारत अब अपनी वस्तुओं के निर्यात लिए दुनिया के दूसरे देशों में वैकल्पिक बाजार तलाशने का पूरी शिद्दत से प्रयास कर रहा, जो सफल भी हो रहा है। भारत ने पिछले करीब पांच माह में कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। निकट भविष्य में अमेरिकी शुल्क के प्रभाव को कम करने में ये समझौते महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
शुल्क के अलावा, भारत-अमेरिका संबंध कई अन्य मुद्दों पर भी तनावपूर्ण हैं, जिनमें पिछले साल मई में ट्रंप की ओर से भारत-पाकिस्तान संघर्ष को समाप्त करने का दावा किया जाना और वाशिंगटन की नई आव्रजन नीति शामिल हैं। ऐसे में अमेरिका को यह समझाना होगा कि दबाव की रणनीति के बजाय सहयोग की नीति में ही दोनों देशों के हित निहित हैं।
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